Yashomati Maiya: 'राधा क्यों गोरी...' भजन लिखने वाले जिस गीतकार को पिता मानती थीं लता मंगेशकर, उन्होंने ही दिया था राज कपूर को यह अमर टाइटल
बॉलीवुड के महान शोमैन राज कपूर अपनी फिल्मों में बेहतरीन कहानी के साथ-साथ रूह को छू लेने वाले संगीत के लिए जाने जाते थे। 'प्रेम रोग', 'राम तेरी गंगा मैली' और 'हिना' जैसी फिल्मों की तरह ही साल 1978 में आई उनकी फिल्म 'सत्यम शिवम् सुंदरम' का संगीत भी आज 48 साल बाद भी उतना ही तरोताजा और आत्मा को सुकून देने वाला लगता है। इस फिल्म का एक कालजयी भजन ‘यशोमती मैया से बोले नंदलाला, राधा क्यों गोरी मैं क्यों काला’ आज भी भारतीय घरों में बच्चों की लोरी से लेकर सुबह की प्रार्थना का अहम हिस्सा है। स्वर कोकिला लता मंगेशकर की दिव्य आवाज से सजे इस गीत के बोल जिस महान विभूति ने लिखे थे, उनके साथ लता जी का रिश्ता पेशेवर न होकर बेहद आत्मीय और पवित्र था। लता मंगेशकर उन्हें साक्षात अपने पिता का दर्जा देती थीं। आइए जानते हैं इस महान गीतकार और फिल्म के संगीत से जुड़ी कुछ अनसुनी बातें।
फिल्म का वो खूबसूरत सीन और लता जी की आवाज का जादू
राज कपूर के निर्देशन में बनी 'सत्यम शिवम् सुंदरम' में शशि कपूर और जीनत अमान मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म की शुरुआत में अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे ने जीनत अमान के बचपन का किरदार निभाया था। फिल्म के शुरुआती दृश्यों में उन्हें भोर के समय अपने पिता के साथ मंदिर में बेहद सादगी से ‘यशोमती मैया से बोले नंदलाला’ गाते हुए दिखाया गया था। इस गीत में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का मधुर संगीत और लता मंगेशकर की मखमली आवाज ने ऐसा जादू बिखेरा कि यह गाना हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया।
पंडित नरेंद्र शर्मा: जिन्हें लता मंगेशकर मानती थीं अपना पिता
इस अद्भुत और भक्तिमय गीत के बोल महान कवि और साहित्यकार पंडित नरेंद्र शर्मा ने लिखे थे। पंडित नरेंद्र शर्मा सिर्फ एक गीतकार नहीं थे, बल्कि वे हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े स्तंभ थे। लता मंगेशकर और पंडित जी के बीच बेहद गहरा और भावुक रिश्ता था। लता जी कई बार भावुक होकर कहती थीं कि पंडित नरेंद्र शर्मा उनके आध्यात्मिक और मार्गदर्शक पिता की तरह थे। पंडित जी भी लता जी को अपनी बेटी की तरह स्नेह देते थे और उन्हें जीवन व कला से जुड़ी कई अमूल्य सीख दी थीं, जिन्हें लता जी जीवनभर याद रखती थीं।
राज कपूर को 'सत्यम शिवम् सुंदरम' का टाइटल भी पंडित जी ने ही दिया
बहुत कम लोग जानते हैं कि राज कपूर अपनी इस महत्वाकांक्षी फिल्म के नाम को लेकर काफी समय तक असमंजस में थे। यह पंडित नरेंद्र शर्मा ही थे, जिन्होंने भारतीय दर्शन के मूल मंत्र से प्रेरित होकर राज कपूर को अपनी इस फिल्म का नाम 'सत्यम शिवम् सुंदरम' (जो सत्य है, वही शिव है और जो शिव है, वही सुंदर है) रखने का सुझाव दिया था। राज कपूर को यह नाम इतना पसंद आया कि उन्होंने न सिर्फ इसे फिल्म का टाइटल बनाया, बल्कि पूरी कहानी को इसी के इर्द-गिर्द बुना।
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और पंडित जी ने रचा इतिहास, जीते थे अवॉर्ड्स
राज कपूर ने इस फिल्म के संगीत को अमर बनाने की पूरी जिम्मेदारी संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को सौंपी थी। फिल्म में कुल 9 गाने थे, जिन्होंने रिलीज होते ही इतिहास रच दिया था।
पंडित नरेंद्र शर्मा के गीत: पंडित जी ने फिल्म के लिए तीन बेहद खास गाने लिखे थे—पहला टाइटल ट्रैक 'सत्यम शिवम सुंदरम', दूसरा 'यशोमती मैया से बोले नंदलाला' और तीसरा 'श्री राधा मोहन श्याम शोभन'। फिल्म के मुख्य टाइटल सॉन्ग के लिए पंडित जी को उनकी बेहतरीन लिखावट के लिए कई पुरस्कारों से नवाजा गया।
आनंद बक्शी के गीत: फिल्म के अन्य सुपरहिट गाने जैसे 'भोर भए पनघट पर', 'चंचल शीतल निर्मल कोमल' और 'वो औरत है तू महबूबा' जैसे लोकप्रिय गीतों को मशहूर गीतकार आनंद बक्शी ने अपनी कलम से सजाया था।
संगीत प्रेमियों और क्रिटिक्स की सराहना के चलते संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इस फिल्म के लिए उस साल का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी अपने नाम किया था। गानों की इस अभूतपूर्व सफलता और बेहतरीन कहानी के दम पर फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर छप्परफाड़ कमाई की थी और राज कपूर के करियर की सबसे बड़ी कल्ट फिल्मों में शामिल हुई।