Kerala Election : क्या केरल बनेगा 'दक्षिण का बंगाल'?, राजीव चंद्रशेखर के नेतृत्व में खिला 'कमल'
India News Live, Digital Desk: केरल की राजनीति में दशकों से चला आ रहा 'लेफ्ट बनाम कांग्रेस' का समीकरण अब बदलता नजर आ रहा है। वामपंथ और कांग्रेस का अभेद्य गढ़ माने जाने वाले इस राज्य में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने वह कर दिखाया है, जिसकी कल्पना कुछ समय पहले तक नामुमकिन थी। कांग्रेस नेता शशि थरूर के "जीरो सीट वाली पार्टी" के कटाक्ष का जवाब देते हुए बीजेपी ने पहली बार केरल विधानसभा की तीन सीटों पर जीत का परचम लहरा दिया है। यह न केवल सीटों की जीत है, बल्कि केरल में एक नए राजनीतिक युग की आहट भी है।
इन तीन दिग्गजों ने रचा इतिहास
2021 में एक भी सीट न जीत पाने वाली भाजपा ने इस बार अपनी रणनीति बदली और तीन सीटों पर शानदार कामयाबी हासिल की:
राजीव चंद्रशेखर (नेमोम सीट): पूर्व केंद्रीय मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने विकास मॉडल को फ्रंट पर रखा और जीत दर्ज की।
वी. मुरलीधरन (काझाकुट्टम): कद्दावर नेता मुरलीधरन ने भी अपनी सीट पर जीत का परचम लहराया।
बी. बी. गोपालकुमार (चथन्नूर): गोपालकुमार ने भी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण जीत हासिल की।
बंगाल चैप्टर की पुनरावृत्ति? (The Bengal Model)
राजनीतिक विश्लेषक इसे 'बंगाल चैप्टर' के रूप में देख रहे हैं। याद दिला दें कि 2016 में बंगाल में भाजपा के पास महज 3 सीटें थीं, जो 2021 में 77 और अब 2026 में दो-तिहाई बहुमत में बदल गईं। बंगाल की तरह केरल भी कभी लेफ्ट का मजबूत किला था। पी. विजयन की सरकार के 10 साल बाद सत्ता से बाहर होते ही देश में अब कहीं भी वामपंथी सरकार नहीं बची है। लेफ्ट के इस पराभव की स्थिति में भाजपा खुद को एक सशक्त विकल्प के रूप में पेश कर रही है।
आंकड़ों में भाजपा की 'सियासी उर्वरता'
भाजपा की जीत महज तुक्का नहीं, बल्कि स्थिर वोट बैंक का नतीजा है:
स्थिर वोट शेयर: 2021 में भाजपा का वोट शेयर 11.3% था, जो इस बार मामूली बढ़त के साथ 11.42% रहा। यूडीएफ (UDF) की लहर के बावजूद भाजपा ने अपना वोट बैंक बचाए रखा।
बढ़ता ग्राफ: पिछले निकाय चुनावों में पार्टी को 14.6% और 2024 लोकसभा चुनाव में 16.68% वोट मिले थे, जो यह दर्शाता है कि केरल की जमीन भाजपा के लिए तैयार हो चुकी है।
राजीव चंद्रशेखर: केरल में विकास का नया चेहरा
भाजपा ने चुनाव से पहले राजीव चंद्रशेखर को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर एक बड़ा दांव खेला था। उन्होंने 'केरल मॉडल' के बजाय 'बीजेपी के विकास मॉडल' को जनता के बीच रखा। नतीजों से साफ है कि केरल के युवाओं और प्रबुद्ध वर्ग को उनकी विकासपरक राजनीति समझ आई है। आने वाले समय में केरल की जंग 'द्विध्रुवीय' (कांग्रेस बनाम भाजपा) होने की संभावना बढ़ गई है।