'जनाजा यानी सटीक निशाना!' क्या खामेनेई की अंतिम विदाई पर हमला करेगा इजरायल? ट्रंप की करीबी के बयान से मचा हड़कंप
पश्चिम एशिया में जारी भारी तनाव के बीच ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को लेकर एक नया और बेहद गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। बीती 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के एक संयुक्त मिसाइल हमले में मारे गए खामेनेई का शव पिछले 4 महीनों से कोल्ड स्टोरेज में रखा हुआ है। अब जब क्षेत्र में युद्ध की स्थिति कुछ शांत हुई है, तब आगामी 9 जुलाई को उनके ऐतिहासिक अंतिम संस्कार की तैयारियां की जा रही हैं। इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेहद करीबी और कट्टर समर्थक लौरा लूमर के एक भड़काऊ बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आग लगा दी है। लौरा ने इजरायल और अमेरिकी सेना को सुझाव दिया है कि करोड़ों की इस भीड़ पर बम बरसाने का यह सबसे सही और सटीक मौका है।
'तैयार टारगेट और मजेदार काम': सोशल मीडिया पर लौरा लूमर का विवादित पोस्ट
लौरा लूमर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक के बाद एक कई पोस्ट करके ईरान के प्रति अपनी तीखी नफरत का खुलकर प्रदर्शन किया। उन्होंने 9 जुलाई को होने वाले खामेनेई के जनाजे को निशाना बनाने की वकालत करते हुए लिखा, "खामेनेई का अंतिम संस्कार? इसे कहते हैं निशाना लगाने के लिए एक तैयार बड़ा माहौल।"
जब एक सोशल मीडिया यूजर ने उनसे हैरान होकर पूछा कि क्या वह सच में एक अंतिम संस्कार के कार्यक्रम पर बमबारी करने की बात कह रही हैं, तो लूमर ने बिना किसी झिझक के जवाब दिया, "मैं अमेरिका या आईडीएफ (इजरायली रक्षा बल) को जिहादियों पर बमबारी करते देखने के मौके को कभी ना नहीं कहूंगी। आईडीएफ के पास यह सबसे मजेदार काम करने का तरीका है।" उनके इस बयान की वैश्विक स्तर पर मानवाधिकार संगठनों द्वारा कड़ी निंदा की जा रही है।
कौन हैं लौरा लूमर? ट्रंप के साम्राज्य में कितनी है इनकी धमक?
लौरा लूमर अमेरिका में दक्षिणपंथी विचारधारा की एक बेहद आक्रामक और प्रभावशाली चेहरा हैं। उन्हें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सबसे वफादार और कट्टर समर्थकों में गिना जाता है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) में भी एक बेहद अहम और प्रभावी भूमिका निभाई है।
लौरा शुरू से ही ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के कड़े सैन्य अभियानों की सबसे बड़ी पैरोकार रही हैं। उन्होंने अमेरिकी संसद में उन नेताओं की भी जमकर क्लास लगाई थी जो पश्चिम एशिया में शांति समझौते की बात कर रहे थे। वह मानती हैं कि पूरे मिडिल ईस्ट पर सिर्फ अमेरिका और इजरायल का ही एकतरफा वर्चस्व होना चाहिए। इसके अलावा, वह अमेरिकी राजनीति में ट्रंप की धुर विरोधी इल्हान उमर पर भी लगातार तीखे हमले करने के लिए जानी जाती हैं।
4 महीने से अंतिम संस्कार का इंतजार, 5 दिनों तक चलेंगी रस्में
28 फरवरी को हुए भीषण मिसाइल हमले में खामेनेई अपने परिवार के कई सदस्यों और शीर्ष कमांडरों के साथ मारे गए थे। ईरानी प्रशासन को इस बात का गहरा डर था कि अगर युद्ध के बीच उनका अंतिम संस्कार किया गया, तो अमेरिका और इजरायल इस मौके का फायदा उठाकर करोड़ों की भीड़ को अपना निशाना बना सकते हैं। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच युद्ध विराम और शांति समझौते के बाद ही इस कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई है।
'ईरान इंटरनेशनल' की एक ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, कोल्ड स्टोरेज में सुरक्षित रखे गए खामेनेई के पार्थिव शरीर को अंतिम विदाई देने की प्रक्रिया करीब 5 दिनों तक चलेगी।
सबसे पहले राजधानी तेहरान में एक विशाल अंतिम यात्रा निकाली जाएगी।
इसके बाद 3 दिनों तक उनके शव को तेहरान के मुख्य नमाज परिसर में आम जनता के दर्शन के लिए रखा जाएगा।
फिर उनके पार्थिव शरीर को सीमा पार इराक के पवित्र शिया शहर नजफ ले जाया जाएगा।
इराक से शव को वापस ईरान के धार्मिक शहर कोम लाया जाएगा और सभी इस्लामिक रस्में पूरी होने के बाद उनके जन्मस्थान मशहद में स्थित 'इमाम रजा दरगाह' में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक (दफन) किया जाएगा।
करोड़ों की भीड़ और पुराना खौफ: ईरान के सामने सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा
इस भव्य अंतिम संस्कार में ईरानी सुरक्षा एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा व्यवस्था और अभूतपूर्व भीड़ को संभालने की है। सरकारी अनुमानों के मुताबिक, इस जनाजे में देश-विदेश से करोड़ों लोगों के शामिल होने की उम्मीद है।
ईरान का इतिहास गवाह है कि जब देश के पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खुमैनी (1989) और साल 2020 में जनरल कासिम सुलेमानी का अंतिम संस्कार हुआ था, तब बेकाबू भीड़ और भीषण भगदड़ के कारण सैकड़ों लोग कुचलकर मार गए थे। ऐसे में आंतरिक सुरक्षा के साथ-साथ बाहरी खतरों से इस आयोजन को बचाना ईरान के लिए इतिहास की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है।
क्या वाकई युद्ध विराम के बीच हमला करेगा इजरायल?
लौरा लूमर के भड़काऊ बयानों से इतर, कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस अंतिम संस्कार पर किसी भी तरह के सैन्य हमले की आशंका न के बराबर है। अमेरिका के साथ हुए आधिकारिक शांति समझौते के बाद ही ईरान ने इस पूरे कार्यक्रम की घोषणा की है। हालांकि, यह भी सच है कि इजरायल इस शांति समझौते से पूरी तरह खुश नहीं है।
इससे पहले भी जब लेबनान में इजरायली हमले के दौरान हिज्बुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की मौत हुई थी, तब उनका अंतिम संस्कार भी युद्ध विराम के बाद ही शांति से संपन्न हुआ था। हालांकि, उस दौरान भी इजरायली फाइटर जेट्स लगातार आसमान में मंडराते रहे थे। इस बार भी उम्मीद है कि इजरायल और अमेरिकी खुफिया एजेंसियां आसमान से इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखेंगी, लेकिन सीधे हमले का जोखिम उठाकर वैश्विक शांति समझौते को नहीं तोड़ेंगी।