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July 03 2026 05:35 am

मुंबई बेचारी क्यों?: साकीनाका में खुले मैनहोल से मौत, जलभराव से ₹10,000 करोड़ का नुकसान

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देश की आर्थिक राजधानी, देश की सबसे अमीर महानगरपालिका (BMC) और अरबों रुपये का सालाना बजट... लेकिन जैसे ही आसमान से आफत की बारिश बरसती है, मुंबई की रफ्तार थम जाती है। सड़कें नदियों में तब्दील हो जाती हैं, लोकल ट्रेनें प्रभावित होती हैं और लोग घंटों जाम में फंस जाते हैं। सबसे दर्दनाक बात यह है कि हर साल घर से निकला कोई न कोई बेकसूर इंसान सिस्टम की लापरवाही के कारण जिंदा वापस नहीं लौट पाता। यह हर साल दोहराई जाने वाली एक ऐसी त्रासदी है, जिससे प्रशासन आज तक कोई सबक लेता नहीं दिख रहा है।

फोन पर बात करते हुए जा रहे थे, 5 सेकंड में मैनहोल में समा गए

इस बार भी मुंबई में मानसून की शुरुआत एक बेहद खौफनाक और दर्दनाक हादसे के साथ हुई। मुंबई के साकीनाका इलाके में 55 वर्षीय असलम शेख सड़क पर सामान्य तरीके से फोन पर बात करते हुए चल रहे थे। तभी एक टेंपो ट्रैवलर उनके सामने से गुजरता है और जैसे ही वह वाहन हटता है, असलम गायब हो चुके होते हैं। वह सड़क पर खुले एक गहरे मैनहोल में समा गए।

करीब 4 घंटे के भारी रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद उनका शव दूसरे मैनहोल से बरामद हुआ। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि पूरी तरह प्रशासनिक हत्या थी। बीएमसी ने सफाई के लिए मैनहोल का ढक्कन खुला छोड़ दिया था, लेकिन वहां न तो कोई बैरिकेडिंग की गई थी और न ही कोई चेतावनी बोर्ड लगाया गया था। हादसे के बाद हमेशा की तरह अधिकारी एक-दूसरे पर दोष मढ़ते नजर आए, लेकिन पीड़ित परिवार के लिए इंसाफ और मुआवजे का सवाल जस का तस बना हुआ है।

ड्रेनेज सिस्टम और हाई टाइड का जानलेवा कॉम्बिनेशन

असलम शेख की मौत कोई इकलौती घटना नहीं है। हर मानसून में मुंबई, ठाणे, वसई और विरार पानी-पानी हो जाते हैं। अंधेरी सबवे जैसी जगहों पर कुछ ही मिनटों की बारिश में गाड़ियां डूब जाती हैं।

मुंबई की असली समस्या: मुंबई का स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज (Storm Water Drainage) सिस्टम बेहद कमजोर और पुराना हो चुका है। जब निचले इलाकों में भारी बारिश और समुद्र में हाई टाइड (ज्वार) एक साथ आते हैं, तो ड्रेनेज का पानी समुद्र में डिस्चार्ज नहीं हो पाता। नतीजा यह होता है कि बैकवाटर के कारण सड़कें तालाब बन जाती हैं। प्रशासन को इन हॉटस्पॉट्स की जानकारी सालों से है, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया।

मानसून से थम जाती है देश की धड़कन, ₹10,000 करोड़ की आर्थिक चोट

शिकागो यूनिवर्सिटी (University of Chicago) की एक हालिया शोध रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि मुंबई में मानसून के दौरान जलभराव, हादसों और बीमारियों के चलते हर साल लगभग 2,300 से 2,700 लोगों की जान जाती है। इसके अलावा, लोकल ट्रेनों का ठप होना, दफ्तरों-स्कूलों का बंद होना और सप्लाई चेन टूटने के कारण शहर को हर साल करीब 10,000 करोड़ रुपये का भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। 26 जुलाई 2005 की बाढ़ (जिसमें 24 घंटे में 944 mm बारिश हुई थी) के बाद बुनियादी ढांचे में कुछ सुधार जरूर हुए, लेकिन जिस तेजी से कंक्रीट का जाल फैला, उस अनुपात में जल निकासी की व्यवस्था नहीं सुधारी गई।

'साइलेंट किलर' बन रहे हैं गिरते हुए पेड़, आंकड़ों में देखें भयावहता

बारिश के मौसम में मुंबईकर्स के लिए एक और बड़ा खतरा 'हरे-भरे पेड़' बन चुके हैं। हाल ही में चेंबूर में एक स्कूल बस पर पेड़ गिरने से एक मासूम छात्र की मौत हो गई।

वर्ष 2024: पेड़ गिरने की 653 घटनाएं दर्ज की गईं।

वर्ष 2025: यह आंकड़ा तेजी से बढ़कर 855 तक पहुंच गया।

क्यों गिर रहे हैं पेड़?

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क चौड़ीकरण और फुटपाथ निर्माण के चक्कर में पेड़ों के तनों के चारों तरफ कंक्रीट भर दी जाती है। इससे पेड़ों की जड़ों तक न तो ऑक्सीजन पहुंच पाती है और ना ही पानी। अंदर ही अंदर जड़ें सड़ जाती हैं और तेज हवा या बारिश होते ही भारी-भरकम पेड़ अचानक ताश के पत्तों की तरह गिर जाते हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) का स्पष्ट नियम है कि किसी भी पेड़ के चारों ओर कम से कम एक मीटर का दायरा कंक्रीट से मुक्त होना चाहिए, लेकिन मुंबई में इस नियम की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।