BREAKING:
July 27 2026 08:39 pm

Jagannath Rath Yatra 2026: 108 कलशों के महास्नान के बाद बीमार हुए भगवान जगन्नाथ, 15 दिनों के लिए बंद हुए मंदिर के कपाट, जानिए अनावसार का रहस्य

Post

ओडिशा के पुरी में स्थित 12वीं शताब्दी के ऐतिहासिक जगन्नाथ मंदिर से सनातन धर्म की अटूट आस्था का सबसे बड़ा उत्सव शुरू हो चुका है। विश्व प्रसिद्ध वार्षिक जगन्नाथ रथ यात्रा की भव्य शुरुआत ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन 'स्नान यात्रा' अनुष्ठान से हुई। सोमवार तड़के महाप्रभु जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और लाडली बहन देवी सुभद्रा को मंदिर के गर्भगृह से बाहर लाकर ऊंचे 'स्नान मंडप' पर विराजमान किया गया। इस अलौकिक ‘देव स्नान पूर्णिमा’ के अवसर पर अपने आराध्य की एक झलक पाने के लिए पुरी की सड़कों पर लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा और पूरा शंख क्षेत्र 'जय जगन्नाथ' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।

रथयात्रा का मुख्य पूर्वाभ्यास है ‘स्नान यात्रा’

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन होने वाली इस स्नान यात्रा को विश्व प्रसिद्ध वार्षिक रथयात्रा का मुख्य पूर्व आयोजन (पूर्वाभ्यास) माना जाता है। इस विशेष दिन पर भगवान तीनों भाई-बहनों को सार्वजनिक रूप से पवित्र महास्नान कराया जाता है। मान्यता है कि ज्येष्ठ महीने की इस भीषण गर्मी में भगवान को शीतलता प्रदान करने के लिए यह शाही स्नान आयोजित होता है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से आए भक्त मंदिर के सामने बने भव्य मार्ग पर घंटों इंतजार करते हैं।

पारंपरिक पाहंडी और मंगला आरती से हुई शुरुआत

इस वर्ष इस दिव्य और अलौकिक अनुष्ठान की शुरुआत सुबह 5:15 बजे देवताओं की पारंपरिक ‘पाहंडी’ यानी कि भव्य शोभायात्रा के साथ हुई। भारी सुरक्षा और सेवायतों (पुजारियों) की देखरेख में यह रस्म सुबह 8:00 बजे तक पूरी हुई। स्कंद पुराण के अनुसार, पुरी मंदिर में लकड़ी की इन दिव्य मूर्तियों की स्थापना करने वाले राजा इंद्रद्युम्न ने ही इस अद्वितीय स्नान अनुष्ठान की नींव रखी थी। मूर्तियों को स्नान वेदी पर स्थापित करने के बाद सेवायतों द्वारा ‘मंगला आरती’ की गई। आम दिनों में मंदिर के बंद गर्भगृह में होने वाली इस पहली आरती को आज के दिन भक्तों को खुले आकाश के नीचे मंडप से देखने का दुर्लभ सौभाग्य मिलता है।

108 स्वर्ण कलशों का सुगंधित जल और दिव्य गज वेश

वैदिक मंत्रोच्चार, शंखध्वनि और मृदंग की थाप के बीच मंदिर परिसर में स्थित 'सुनाकुआ' (पवित्र स्वर्ण कुआं) से लाए गए सुगंधित और औषधीय जल से भरे 108 कलशों से तीनों भाई-बहनों का 'सहस्त्रस्नान' कराया गया। इसके बाद पुरी के गजपति महाराज दिव्यसिंह देव पारंपरिक रूप से सोने की झाड़ू से ‘स्नान मंडप’ की सफाई (छेरा पंहरा) की रस्म निभाएंगे। महास्नान के संपन्न होने के बाद भगवान को भगवान गणेश के रूप यानी ‘गज वेश’ (हाथी की अलौकिक पोशाक) में सजाया जाएगा, जिसके दर्शन को बेहद कल्याणकारी और हर बाधा दूर करने वाला माना जाता है।

क्यों 15 दिनों के लिए बंद हो जाते हैं मंदिर के कपाट?

अब आपके मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि इस भव्य स्नान के बाद अचानक मंदिर के कपाट 12वीं शताब्दी की परंपरा के अनुसार क्यों बंद कर दिए जाते हैं? दरअसल, इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प और मानवीय पौराणिक मान्यता है। माना जाता है कि कुएं के अत्यधिक ठंडे पानी से 108 घड़ों द्वारा स्नान करने के कारण महाप्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को तेज बुखार आ जाता है और वे अस्वस्थ हो जाते हैं।

क्या है 'अनाससर गृह' और एकांतवास का रहस्य?

अस्वस्थ होने के बाद भगवान को तुरंत मंदिर के अंदर ही एक गुप्त और विशेष कक्ष में ले जाया जाता है, जिसे 'अनाससर गृह' या 'अनावसार' कहा जाता है। अगले 15 दिनों तक भगवान इसी कक्ष में पूरी तरह आराम करते हैं और भक्तों के लिए दर्शन पूरी तरह बंद हो जाते हैं। इन 15 दिनों के एकांतवास के दौरान भगवान को राजसी छप्पन भोग नहीं लगाया जाता। बीमार होने के कारण उन्हें केवल सादा भोजन, फल, दलिया और विशेष आयुर्वेदिक काढ़ा व जड़ी-बूटियां ही अर्पित की जाती हैं। स्वस्थ होने के बाद भगवान 'नवयौवन रूप' में भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसके ठीक बाद भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है।