नजराना लेना किन्नरों का कानूनी हक नहीं, एरिया बंटवारे का मुकदमा हाईकोर्ट में खारिज
India News Live,Digital Desk : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किन्नर समुदाय द्वारा पारंपरिक रूप से लिए जाने वाले 'बधाई उपहार' या 'नजराना' को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किन्नरों के पास इस तरह की भेंट या धन लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने रेखा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में यह आदेश देते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
कानूनी आधार के बिना वसूली अवैध
रेखा देवी नामक याचिकाकर्ता ने कोर्ट में अपील की थी कि अन्य किन्नर उनके 'क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र' (एरिया) का अतिक्रमण कर रहे हैं, जिससे उन्हें सुरक्षा दी जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह प्रथा वर्षों से चली आ रही है और इसे 'प्रथागत अधिकार' माना जाना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा:
"कानून के अनुसार ही किसी व्यक्ति से धन, टैक्स या शुल्क वसूला जा सकता है। इस तरह के उपहार या नजराने की अनुमति देने वाला कोई वैध या कानूनी आधार मौजूद नहीं है।"
अवैध वसूली को मान्यता देना अपराध
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायालय कानून के समर्थन के बिना किसी भी कृत्य को वैध नहीं ठहरा सकता। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि इस तरह की याचिकाओं को स्वीकार किया गया, तो अन्य गिरोह भी सक्रिय हो सकते हैं जो नागरिकों से जबरन वसूली करेंगे। हाई कोर्ट के अनुसार, इस प्रकार की वसूली भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत एक अपराध है और इसे कभी भी कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।
एरिया बंटवारे की मांग हुई खारिज
याचिकाकर्ता (गोंडा जिले से संबंधित) की वकील संगीता वर्मा ने दलील दी थी कि किन्नर समुदाय के लोग एक-दूसरे के क्षेत्राधिकार में घुस रहे हैं, जिससे हिंसा की स्थिति पैदा हो रही है। उन्होंने बधाई के लिए क्षेत्रों के सीमांकन (डीमार्केशन) की मांग की थी। कोर्ट ने इस पर टिप्पणी की कि जब 'बधाई' वसूलने का ही कोई कानूनी अधिकार नहीं है, तो क्षेत्रों के सीमांकन का सवाल ही नहीं उठता।
ट्रांसजेंडर संरक्षण कानून और भविष्य के बदलाव
हाई कोर्ट ने 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019' का हवाला देते हुए कहा कि इस कानून में भी ऐसी किसी प्रथा के संरक्षण की बात नहीं कही गई है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि भारत की संसद में 2026 का एक नया विधेयक विचाराधीन है, जो लिंग निर्धारण के संबंध में 2019 के अधिनियम से भिन्न हो सकता है, लेकिन वर्तमान में 'नजराना' लेने का कोई संवैधानिक या कानूनी प्रावधान नहीं है।