क्या विराट कोहली वनडे में सचिन से बेहतर खिलाड़ी हैं? आंकड़े भले भरें हामी, लेकिन दो युगों की तुलना कतई जायज नहीं
क्रिकेट इतिहास में जब भी वनडे क्रिकेट (ODI) के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों की बात होगी, भारत के दो महान दिग्गजों—सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली—का नाम सबसे शीर्ष पर जगमगाएगा। सचिन तेंदुलकर ने अपने 24 साल के लंबे अंतरराष्ट्रीय करियर में 463 वनडे मैचों में 18,426 रन और 49 शतक जड़कर एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया था, जिसे कभी अटूट माना जाता था। लेकिन आधुनिक क्रिकेट के 'चेज मास्टर' विराट कोहली ने 50 वनडे शतकों का आंकड़ा छूकर और बेहद कम पारियों में सचिन के कई मील के पत्थरों को पीछे छोड़कर क्रिकेट जगत को स्तब्ध कर दिया।
कागजों और आंकड़ों की दुनिया में नजर डालें तो विराट कोहली का औसत (58 से अधिक), स्ट्राइक रेट (93 से अधिक) और शतकों की गति सचिन से कहीं आगे दिखाई देती है। लेकिन क्रिकेट केवल एक स्प्रेडशीट या आंकड़ों की बाजीगरी नहीं है। क्रिकेट के जानकारों और पूर्व दिग्गजों का मानना है कि केवल शतकों और औसत की संख्या देखकर विराट को सचिन से बेहतर घोषित कर देना खेल की बदलती परिस्थितियों और उस दौर के क्रिकेट के साथ सरासर नाइंसाफी होगी।
आंकड़ों की जुबानी: क्यों भारी दिखता है विराट कोहली का पलड़ा?
यदि विशुद्ध गणितीय आंकड़ों की कसौटी पर परखा जाए, तो विराट कोहली का रिकॉर्ड वनडे क्रिकेट में अविश्वसनीय रूप से बेजोड़ नजर आता है:
शतक और पारियां: जहां सचिन तेंदुलकर ने अपने 49 वनडे शतक 452 पारियों में बनाए थे, वहीं विराट कोहली ने 280 से भी कम पारियों में 50 शतकों का जादुई आंकड़ा छू लिया।
बल्लेबाजी औसत और निरंतरता: सचिन तेंदुलकर का वनडे करियर औसत 44.83 का रहा, जबकि विराट कोहली लगभग पूरे करियर में 58 के औसत के आसपास बल्लेबाजी करते रहे हैं।
लक्ष्य का पीछा (Run Chase) करने का कौशल: लक्ष्य का पीछा करते हुए विराट कोहली का रिकॉर्ड विश्व क्रिकेट में अद्वितीय है। चेज करते हुए उनके 27 से अधिक शतक और 65 से ज्यादा का औसत उन्हें इतिहास का सबसे विध्वंसक 'मैच फिनिशर' बनाता है।
इन आंकड़ों को देखकर पहली नजर में कोई भी यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि विराट कोहली वनडे के सबसे महानतम बल्लेबाज हैं, लेकिन असली पेंच इसके बाद शुरू होता है।
दो गेंदें, पॉवरप्ले और फील्डिंग प्रतिबंध: सचिन के दौर में नियम थे बेहद कड़े
सचिन तेंदुलकर ने 1989 से 2012 के बीच जिस दौर में क्रिकेट खेला, वह गेंदबाजों का स्वर्ण काल था। उस दौर और आधुनिक क्रिकेट की परिस्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर है:
एक गेंद बनाम दो नई गेंदें: 1990 और 2000 के दशक में पूरी 50 ओवर की पारी केवल एक ही गेंद से खेली जाती थी। 30-35 ओवर के बाद जब गेंद पुरानी और खुरदरी हो जाती थी, तो वसीम अकरम, वकार यूनिस और जहीर खान जैसे गेंदबाज 'रिवर्स स्विंग' के जरिए बल्लेबाजों के स्टंप्स उखाड़ देते थे। वहीं आज दोनों छोर से दो नई सफेद गेंदें इस्तेमाल होती हैं, जिससे गेंद 25 ओवर से ज्यादा पुरानी नहीं होती और रिवर्स स्विंग का खेल लगभग समाप्त हो चुका है।
फील्डिंग नियम (5 फील्डर्स का दायरा): सचिन के दौर में 15 ओवर के अनिवार्य फील्डिंग प्रतिबंध के बाद 30 गज के दायरे के बाहर 5 फील्डर्स तैनात रहते थे। आधुनिक क्रिकेट में 40वें ओवर तक केवल 4 फील्डर्स को बाउंड्री पर रखने की अनुमति है, जिससे गैप ढूंढना और चौके-छक्के लगाना कई गुना आसान हो गया है।
बल्ले की मोटाई और छोटी बाउंड्रीज: आधुनिक दौर के बल्ले 'मॉन्स्टर ब्लेड्स' बन चुके हैं; जहां गेंद का हल्का सा किनारा (एज) लगकर भी गेंद स्टैंड्स में गिरती है। सचिन के दौर में भारी लकड़ी के साधारण बल्ले होते थे और बाउंड्रीज आज के 65-70 मीटर के मुकाबले 80 से 85 मीटर की हुआ करती थीं।
गेंदबाजी आक्रमण की गुणवत्ता: जब हर टीम में होते थे खूंखार गेंदबाज
सचिन तेंदुलकर ने जिन गेंदबाजों का सामना अपने प्राइम में किया, उनकी कल्पना मात्र से आज के बल्लेबाजों के पसीने छूट सकते हैं। सचिन को वसीम अकरम, वकार यूनिस, शोएब अख्तर, ग्लेन मैक्ग्रा, ब्रेट ली, शेन वॉर्न, मुथैया मुरलीधरन, कर्टली एम्ब्रोस, कर्टनी वॉल्श और एलन डोनाल्ड जैसे सर्वकालिक महान गेंदबाजी आक्रमणों के सामने रन बनाने पड़ते थे। उस दौर में हर दूसरी टीम के पास कम से कम दो ऐसे गेंदबाज होते थे जो 145+ किमी प्रति घंटे की रफ्तार या जादुई स्पिन से बल्लेबाजों को डराते थे।
विराट कोहली ने भी मिचेल स्टार्क, ट्रेंट बोल्ट, जसप्रीत बुमराह और पैट कमिंस जैसे विश्वस्तरीय गेंदबाजों का सामना किया है, लेकिन समग्र रूप से आधुनिक क्रिकेट में टी20 लीग्स और अत्यधिक क्रिकेट के कारण वनडे में विशुद्ध टेस्ट-क्वालिटी गेंदबाजी आक्रमण की भारी कमी आई है।
'अकेले योद्धा' से लेकर 'मजबूत टीम इंडिया' तक का सफर
1990 के दशक में भारतीय क्रिकेट की सच्चाई यह थी कि "जब तक सचिन क्रीज पर हैं, भारत जीत सकता है; सचिन आउट, तो टीवी बंद।" सचिन तेंदुलकर पर करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का जो मानसिक दबाव था, वह आधुनिक दौर के किसी भी खिलाड़ी से कई गुना अधिक था। उस दौर में सचिन को अक्सर अकेले दम पर पूरी विरोधी टीम से लड़ना पड़ता था।
इसके विपरीत, विराट कोहली को अपने करियर में वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, सचिन तेंदुलकर, एमएस धोनी, रोहित शर्मा, शिखर धवन और युवराज सिंह जैसे दिग्गजों का साथ मिला। एक मजबूत बल्लेबाजी क्रम होने से बल्लेबाज पर मनोवैज्ञानिक दबाव कम होता है और वह खुलकर अपनी स्वाभाविक आक्रामक शैली में खेल सकता है।
तुलना निरर्थक, दोनों अपनी-अपनी पीढ़ी के 'बादशाह'
सचिन तेंदुलकर ने उस दौर में भारतीय बल्लेबाजी का नेतृत्व किया जब परिस्थितियां पूरी तरह गेंदबाजों के पक्ष में झुकी हुई थीं और भारतीय टीम जीतना सीख रही थी। सचिन ने भारत को क्रिकेट का महापावर बनाने की नींव रखी। वहीं विराट कोहली ने उस नींव पर एक भव्य इमारत खड़ी की और आधुनिक क्रिकेट की फिटनेस, आक्रामकता और चेज करने की कला को एक ऐसे मुकाम पर पहुंचाया जहां पहुंचना किसी अन्य के लिए संभव नहीं दिखता।
अतः आंकड़ों के तराजू पर तौलकर किसी एक को छोटा या बड़ा बताना खेल की आत्मा के साथ खिलवाड़ होगा। सचिन तेंदुलकर यदि क्रिकेट के 'भगवान' और उस कठिन युग के सबसे बड़े महारथी थे, तो विराट कोहली निर्विवाद रूप से आधुनिक युग के 'किंग' और वनडे के सबसे बड़े रन-मशीन हैं।