'हमारी मदद करने के लिए तेल नहीं खरीदता भारत': रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव की दो टूक
रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद से ही पश्चिमी देशों और उनके मीडिया द्वारा भारत की स्वतंत्र ऊर्जा नीति और रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने को लेकर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। यूरोपीय और अमेरिकी राजनयिक कई बार यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश करते दिखे हैं कि भारत सस्ता रूसी तेल खरीदकर मास्को की युद्ध मशीनरी और अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर 'मदद' पहुंचा रहा है। पश्चिमी देशों के इस पाखंड और दुष्प्रचार पर अब भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव (Denis Alipov) ने बेहद कड़ा और दो टूक पलटवार किया है। अलीपोव ने साफ शब्दों में स्पष्ट किया है कि भारत रूस पर कोई अहसान या उपकार करने के लिए उससे तेल नहीं खरीदता, बल्कि यह पूरी तरह से एक व्यावहारिक, व्यावसायिक और भारत की 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा स्वतंत्र निर्णय है। रूसी राजदूत के इस बेबाक बयान ने उन सभी पश्चिमी आलोचकों को आईना दिखाया है जो भारत की कूटनीतिक संप्रभुता पर उंगली उठाने की कोशिश कर रहे थे।
'यह कोई खैरात या उपकार नहीं': डेनिस अलीपोव का पश्चिमी मीडिया को जवाब
एक विस्तृत इंटरव्यू और प्रेस वार्ता के दौरान डेनिस अलीपोव ने भारत-रूस ऊर्जा संबंधों पर खुलकर बात की। उन्होंने पश्चिमी देशों के उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा जाता है कि भारत रूस को आर्थिक संकट से उबारने के लिए उससे ऊर्जा उत्पाद आयात कर रहा है।
अलीपोव ने सीधे और तल्ख अंदाज में कहा—"भारत हमें कोई राहत देने या हमारी मदद करने के लिए तेल नहीं खरीदता है। भारत एक संप्रभु और बेहद समझदार राष्ट्र है, जो अपने आर्थिक और राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखता है। भारत इसलिए रूसी तेल खरीदता है क्योंकि यह उसके लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद और तार्किक है। यह पूरी तरह से एक निष्पक्ष बाजार सौदा है जो दोनों देशों के पारस्परिक हितों को पूरा करता है। पश्चिमी देशों को यह समझना चाहिए कि भारत की नीतियां किसी तीसरे देश के दबाव या आदेश से नहीं, बल्कि उसकी अपनी जनता की प्राथमिकताओं से तय होती हैं।"
वैश्विक बाजार को भारी तबाही से भारत ने ही बचाया
रूसी राजदूत ने इस बात को भी प्रमुखता से रेखांकित किया कि भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल के आयात ने वास्तव में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को एक महाविनाशकारी ऊर्जा संकट से बचाया है। उन्होंने बताया कि जब पश्चिमी देशों ने रूस पर एकतरफा प्रतिबंध लगाकर उसके ऊर्जा संसाधनों का बहिष्कार करने की कोशिश की, तब अगर भारत और चीन जैसे बड़े उपभोक्ता बाजार रूसी तेल को बाजार से बाहर कर देते, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच जातीं।
भारत ने रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदकर न केवल अपनी घरेलू महंगाई और ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखा, बल्कि उस तेल को रिफाइन कर यूरोप और अन्य पश्चिमी देशों को पेट्रोलियम उत्पादों के रूप में निर्यात भी किया। अलीपोव ने पश्चिमी देशों के दोहरे चरित्र पर तंज कसते हुए कहा कि वही यूरोपीय देश जो भारत पर रूस से व्यापार करने का आरोप लगाते हैं, पर्दे के पीछे से भारतीय रिफाइनरियों से प्रोसेस किया हुआ यही तेल खरीदकर अपना काम चला रहे हैं।
स्वतंत्र विदेश नीति पर भारत की दृढ़ता की सराहना
डेनिस अलीपोव ने भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कूटनीतिक रुख की सराहना की। उन्होंने कहा कि अत्यधिक भू-राजनीतिक दबाव, अमेरिकी प्रतिबंधों की चेतावनियों और प्रतिबंध लगाने के पश्चिमी धमकियों के बावजूद भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) पर अडिग रहा।
भारत ने हमेशा वैश्विक मंचों पर यह सिद्ध किया है कि विकासशील देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा कोई विलासिता नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों के जीवन स्तर और गरीबी उन्मूलन से जुड़ा बुनियादी सवाल है। भारत जहां से भी सबसे किफायती और स्थिर शर्तों पर ऊर्जा मिलेगी, वहां से वह संसाधन जुटाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। अलीपोव ने कहा कि मॉस्को भारत के इस सैद्धांतिक और निष्पक्ष रुख का पूरा सम्मान करता है।
व्यापार, स्थानीय मुद्रा और रुपये-रूबल तंत्र में विस्तार
राजदूत ने दोनों देशों के बीच तेजी से बढ़ रहे द्विपक्षीय व्यापार के भविष्य पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ऊर्जा क्षेत्र से शुरू हुई यह मजबूत साझेदारी अब फर्टिलाइजर्स (उर्वरक), कोयला, भारी मशीनरी, रक्षा उपकरण और हाई-टेक क्षेत्रों तक फैल चुकी है।
दोनों देश पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों और स्विफ्ट (SWIFT) पर अपनी निर्भरता घटाने के लिए राष्ट्रीय मुद्राओं (रुपया-रूबल तंत्र) और वैकल्पिक भुगतान गेटवे को तेजी से विकसित कर रहे हैं। अलीपोव का यह बयान यह साबित करता है कि नई दिल्ली और मॉस्को के संबंध किसी तीसरे देश की मंशा या पश्चिमी दबाव के बंधक नहीं हैं, बल्कि यह ऐतिहासिक विश्वास और व्यावहारिक जरूरतों की मजबूत नींव पर खड़े हैं।