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September 08 2026 07:16 pm

हमने कभी हक नहीं जताया : ऐतिहासिक मस्जिद पर कार्रवाई के बाद नवाब याकूब खां के परपोते फिरोज खां का छलका दर्द

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ऐतिहासिक धरोहरों, वक्फ संपत्तियों और हालिया प्रशासनिक ध्वस्तीकरण की कार्रवाइयों के बीच एक सदियों पुरानी मस्जिद को गिराए जाने के मामले ने बड़ा तूल पकड़ लिया है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद संबंधित रियासत और ऐतिहासिक घराने से जुड़े नवाब याकूब खां के परपोते फिरोज खां की पहली भावुक और कूटनीतिक प्रतिक्रिया सामने आई है। मीडिया से बातचीत करते हुए फिरोज खां ने साफ शब्दों में कहा कि उनके पूर्वजों ने यह इबादतगाह खुदा की इबादत और अवाम के सजदे के लिए तामीर कराई थी, इसलिए उनके परिवार ने कभी भी इस पर किसी निजी संपत्ति के रूप में मालिकाना हक नहीं जताया। हालांकि, उन्होंने भारी मन से यह भी जोड़ा कि सैकड़ों साल पुरानी उस ऐतिहासिक विरासत और मजहबी पहचान को जिस तरह जमींदोज किया गया, उससे न केवल उनके खानदान बल्कि इतिहास और तहजीब से मुहब्बत करने वाले हर इंसान का दिल छलनी हुआ है।

'यह अवाम की अमानत थी, हमारा जाती मलकियत नहीं': फिरोज खां

फिरोज खां ने अपने पारिवारिक इतिहास और मस्जिद के निर्माण की पृष्ठभूमि को साझा करते हुए कहा कि उनके परदादा नवाब याकूब खां ने इस इलाके में कई जनहितैषी और मजहबी निर्माण कराए थे। यह मस्जिद उसी दौर की गंगा-जमुनी तहजीब और वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना थी।

उन्होंने कहा—"हमारे खानदान की यह रिवायत रही है कि जो चीज अल्लाह की राह में वक्फ कर दी गई, वह पूरी कौम और इंसानियत की हो जाती है। हमने कभी भी इस मस्जिद पर यह दावा नहीं किया कि यह हमारी निजी मिल्कियत है या हम इसके जरिए कोई जाती फायदा उठाना चाहते हैं। यह हमेशा से अवाम की अमानत थी और अवाम ही इसकी देखरेख करती आ रही थी। लेकिन जब किसी ऐसी जगह पर बुलडोजर चलता है, जहां सदियों से अजान गूंजती रही हो और जिसे आपके बुजुर्गों ने अपने खून-पसीने से संवारा हो, तो एक इंसान और वारिस होने के नाते सीने में टीस उठना स्वाभाविक है।"

कानूनी प्रक्रिया और ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी का आरोप

फिरोज खां ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि इस तरह की कार्रवाइयों में अक्सर ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुराने वक्फ रिकॉर्ड्स की बारीकी से पड़ताल नहीं की जाती।

उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार विकास, सड़क चौड़ीकरण या अतिक्रमण हटाने की जल्दबाजी में प्रशासनिक स्तर पर उन ऐतिहासिक सनदों और राजस्व अभिलेखों को दरकिनार कर दिया जाता है जो ब्रिटिश हुकूमत या उससे भी पहले के दौर से दर्ज हैं:

दस्तावेजों की पड़ताल की मांग: उनका कहना था कि किसी भी प्राचीन धार्मिक स्थल पर कोई भी अंतिम कदम उठाने से पहले वक्फ बोर्ड, इतिहासकारों और स्थानीय मुतवल्लियों के साथ बैठकर तमाम कागजातों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए थी।

विकल्प तलाशे जाने चाहिए थे: फिरोज खां ने तर्क दिया कि दुनिया भर में और देश के कई हिस्सों में इंजीनियरिंग तकनीकों के जरिए ऐतिहासिक इमारतों को नुकसान पहुंचाए बिना बुनियादी ढांचे का विकास किया जाता रहा है, और यहां भी ऐसा कोई बीच का रास्ता निकाला जा सकता था।

अमन-चैन और कानून के दायरे में इंसाफ की अपील

मस्जिद गिराए जाने के बाद उपजे स्थानीय तनाव और लोगों में फैली नाराजगी को देखते हुए फिरोज खां ने एक जिम्मेदार नागरिक की तरह शांति और संयम बनाए रखने की पुरजोर अपील की।

उन्होंने कहा कि जज्बाती होकर सड़कों पर उतरने या कानून हाथ में लेने से किसी मसले का हल नहीं निकलता। नवाब खानदान के वारिस ने स्पष्ट किया कि वे इस मामले में कानूनी जानकारों, वक्फ के नुमाइंदों और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर विचार-विमर्श कर रहे हैं। यदि कानूनी प्रक्रिया में कोई खामी या ज्यादती पाई जाती है, तो उसके खिलाफ न्यायपालिका की चौखट पर जाकर संविधान के दायरे में इंसाफ की गुहार लगाई जाएगी।

ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण पर खड़ा हुआ सवाल

फिरोज खां का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के अलग-अलग हिस्सों में सार्वजनिक जमीनों, सड़कों और जल स्रोतों से धार्मिक ढांचों को हटाने की प्रशासनिक मुहिम तेज है।

नवाब याकूब खां के परिवार की ओर से आए इस संतुलित लेकिन दर्द भरे बयान ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में सदियों पुरानी ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक धरोहरों के बीच संतुलन कैसे साधा जाए। फिरोज खां की यह बेबाक टिप्पणी अब सोशल मीडिया और राजनीतिक-सामाजिक गलियारों में चर्चा का बड़ा विषय बन गई है।