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July 08 2026 12:35 am

दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार बना भारत, पर स्वदेशी तकनीक के अभाव में विदेशी कंपनियों के हाथों में जा रहे हैं अरबों रुपये

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वैश्वीकरण के इस आधुनिक दौर में भारत पारंपरिक और श्रम-प्रधान क्षेत्रों (Employment-Intensive Sectors) जैसे कपड़ा, चमड़ा, रत्न-आभूषण और इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज कर रहा है। विकसित देशों के साथ हुए हालिया व्यापार समझौतों ने इस रफ्तार को और मजबूत किया है। लेकिन इसके विपरीत, भविष्य की सबसे बड़ी तकनीक यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से बढ़ते वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी अभी भी बेहद चिंताजनक स्थिति में है। भारत इस समय एआई का निर्माता (Creator) बनने के बजाय दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार (Consumer) बनकर उभरा है, जिसके चलते देश का एक बहुत बड़ा आर्थिक हिस्सा विदेशी एआई कंपनियों की तिजोरियों में जा रहा है।

3,500 अरब डॉलर का महा-बाजार: अमेरिकी कंपनियों का एकछत्र राज

वैश्विक स्तर पर एआई सेवाओं और उससे जुड़ी हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर सप्लाई चेन का मौजूदा बाजार आकार करीब 550 अरब डॉलर ($550 Billion) के आंकड़े को पार कर चुका है। 'ग्रैंड व्यू रिसर्च' (Grand View Research) की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 से 2033 के बीच वैश्विक एआई बाजार 35.5 प्रतिशत की अविश्वसनीय वार्षिक विकास दर (CAGR) से आगे बढ़ने का अनुमान है। इस रफ्तार से अगले सात वर्षों के भीतर यह पूरा बाजार 3,500 अरब डॉलर ($3500 Billion) का विशाल रूप ले लेगा।

आलियांज (Allianz) और ग्रैंड व्यू की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, इस उभरते हुए बाजार के सबसे बड़े हिस्से पर इस समय अमेरिका का नियंत्रण है। एंथ्रोपिक (Anthropic), ओपनएआई (OpenAI) और एनवीडिया (Nvidia) जैसे दुनिया के सबसे बड़े एआई इंजन और चिप निर्माता अमेरिका में स्थित हैं, और पूरी दुनिया के उपभोक्ता इन टूल्स का उपयोग करने के लिए उन्हें हर महीने भारी-भरकम भुगतान कर रहे हैं।

छात्रों से लेकर कॉपोरेट्स तक: भारतीय यूजर्स हर महीने चुका रहे हैं ₹20,000 तक का बिल

भारत में एआई का उपयोग केवल शौकिया तौर पर नहीं, बल्कि व्यावसायिक स्तर पर बहुत तेजी से बढ़ा है। आज देश के 20 लाख से अधिक एक्टिव यूजर्स इन विदेशी कंपनियों के प्रीमियम सब्सक्रिप्शन के लिए हर महीने 400 रुपये से लेकर 20,000 रुपये तक का भुगतान कर रहे हैं। फाइनेंस, हेल्थकेयर, इंश्योरेंस, कानूनी सेवाओं (Law), रिटेल और मीडिया जैसे प्रमुख उद्योगों में एआई पूरी तरह से दैनिक कार्यप्रणाली का हिस्सा बन चुका है।

तकनीकी कौशल को बढ़ाने के लिए देश के हजारों इंजीनियरिंग छात्र हर महीने अपनी जेब से $20 से $30 (लगभग 1,600 से 2,500 रुपये) ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी कंपनियों को दे रहे हैं। वहीं, कंटेंट क्रिएशन और हाई-एंड इमेज जनरेशन के लिए भारतीय कॉपोरेट्स और डिजिटल एजेंसियां हर महीने 50,000 रुपये तक के प्रीमियम टूल्स खरीद रही हैं। तकनीकी विशेषज्ञों का साफ कहना है कि भारतीय एआई मॉडल्स अभी तक अमेरिकी और पश्चिमी देशों के मॉडल्स जितने उन्नत और सटीक नहीं हो पाए हैं, जिसके कारण इस विदेशी निर्भरता को रोकना फिलहाल मुश्किल नजर आ रहा है।

एआई की ग्लोबल सप्लाई चेन: एशिया में चीन और ताइवान का दबदबा

एआई केवल सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं है, इसके पीछे एक बहुत बड़ी हार्डवेयर और चिपसेट सप्लाई चेन काम करती है। आलियांज की रिपोर्ट के मुताबिक, इस ग्लोबल हार्डवेयर सप्लाई चेन में भी भारत की भूमिका अभी नाममात्र की है। वर्तमान में एआई सप्लाई चेन पर एशियाई देशों का एकछत्र राज है, जिसमें चीन 18 प्रतिशत, ताइवान 12 प्रतिशत, हांगकांग 11 प्रतिशत, सिंगापुर 7 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया 6 प्रतिशत, मलेशिया 4 प्रतिशत और जापान 3 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं।

हाल के वर्षों में मेक्सिको और थाईलैंड जैसे देशों ने भी अपनी विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाकर एआई सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मजबूत की है। हालांकि, कुछ अंतरराष्ट्रीय शोध एजेंसियों का यह भी मानना है कि भारत में जारी डिजिटल क्रांति और आगामी सेमीकंडक्टर मिशन के बूते अगले कुछ वर्षों में देश एआई क्षेत्र में लंबी छलांग लगाएगा, जिससे अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा एआई हब बन सकता है।

'नया ईंधन' बना एआई: भारत के ₹24 लाख करोड़ के आईटी निर्यात पर मंडराता खतरा

वैश्विक व्यापार विश्लेषकों ने भारत सरकार को इस डिजिटल असंतुलन के प्रति गंभीर चेतावनी दी है। भारत के कुल 400 अरब डॉलर से अधिक के वार्षिक सेवा निर्यात (Service Exports) में से अकेले आईटी (IT Sector) और सॉफ्टवेयर क्षेत्र का योगदान 290 अरब डॉलर (लगभग 24 लाख करोड़ रुपये) है। यदि भारत समय रहते अपना स्वदेशी और शक्तिशाली एआई इकोसिस्टम विकसित नहीं करता है, तो विदेशी एआई टूल्स का बढ़ता उपयोग हमारे पारंपरिक आईटी और कोडिंग निर्यात को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

एआई को अब दुनिया में एक नई तरह के 'ईंधन' (New Fuel) के रूप में देखा जा रहा है, और वैश्विक स्तर पर कुल एआई उपयोगकर्ताओं में से अकेले भारत की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। अगर भारत जल्द ही सिर्फ एक 'उपभोक्ता' के टैग को हटाकर 'एआई उत्पादक' के रूप में खुद को स्थापित नहीं करता, तो भविष्य के इस सबसे बड़े तकनीकी व्यापार में भारत दुनिया का सबसे बड़ा आयातक (Importer) बनकर रह जाएगा।