ईरान-अमेरिका युद्ध और पाकिस्तान की मध्यस्थता: क्या भारत की कूटनीति को लगा है झटका? जानिए इस 'पॉवर गेम' के पीछे का सच
India News Live,Digital Desk : ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे भीषण संघर्ष के बीच पाकिस्तान द्वारा मध्यस्थता (Mediation) की पहल ने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 को इस्लामाबाद में होने वाली उच्च-स्तरीय वार्ता की मेजबानी कर पाकिस्तान खुद को अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक शांतिदूत के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में भारत के भीतर और बाहर यह सवाल उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान की यह नई भूमिका भारत के लिए कूटनीतिक झटका है?
पाकिस्तान की मध्यस्थता: कूटनीतिक जीत या 'अमेरिकी मोहरा'?
इस्लामाबाद को 'रेड जोन' में तब्दील कर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा युद्धविराम की घोषणा के दौरान पाकिस्तान की सराहना करने और ब्रिटेन व यूरोपीय संघ द्वारा पाकिस्तान को क्रेडिट देने से इस्लामाबाद उत्साहित है। हालांकि, कूटनीतिक जानकारों का एक वर्ग इसे अलग नजरिए से देखता है:
अमेरिका की मजबूरी: कहा जा रहा है कि अमेरिका युद्ध की भारी लागत और सैन्य नुकसान के कारण युद्धविराम का बहाना ढूंढ रहा था। पाकिस्तान को एक 'मोहरे' के रूप में इस्तेमाल किया गया ताकि अमेरिका की साख बची रहे।
ट्रंप-पाकिस्तान गठजोड़: 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान डोनाल्ड ट्रंप की सरपरस्ती चाहता है। वहीं, अमेरिका की नजर पाकिस्तान के 'रेयर अर्थ मिनरल्स' पर है।
भारत का रुख: स्वागत भी और सतर्कता भी
भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने युद्धविराम का स्वागत करते हुए इसे पश्चिम एशिया और वैश्विक अर्थव्यवस्था (तेल-गैस सप्लाई) के लिए शुभ संकेत बताया है। भारत की स्थिति इस मामले में स्थिर और स्पष्ट है:
होर्मुज में जीत: तनाव और नाकाबंदी के बावजूद भारतीय पोत होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित गुजरते रहे, जिसे भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है।
ईरान से संबंध: भारत ने हर स्थिति में युद्ध को गलत बताया है। हाल ही में विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि ने ईरानी दूतावास जाकर शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए, जो ईरान के साथ भारत के प्रगाढ़ संबंधों को दर्शाता है।
तालिबान का समर्थन: पाकिस्तान का पड़ोसी अफगानिस्तान (तालिबान) भी उससे बात करने को तैयार नहीं है और भारत के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने का इच्छुक है, जो पाकिस्तान की क्षेत्रीय विफलता को दर्शाता है।
विपक्ष का हमला और विशेषज्ञों की राय
विपक्ष (कांग्रेस) ने इसे भारत के लिए झटका बताया है। जयराम रमेश और राशिद अलवी जैसे नेताओं का कहना है कि जो भूमिका पाकिस्तान निभा रहा है, वह भारत को निभानी चाहिए थी। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि 1970 में भी पाकिस्तान ने अमेरिका और चीन/रूस के बीच मध्यस्थता की थी, लेकिन उससे भारत की स्थिति कमजोर नहीं हुई।
भारत पर संभावित प्रभाव: क्या बढ़ेगी 'टेंशन'?
भले ही पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाइलाइट होने का मौका मिला हो, लेकिन भारत के लिए कुछ चिंताएं बनी हुई हैं:
आतंकवाद: पाकिस्तान को मिलने वाली संभावित अमेरिकी वित्तीय मदद का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने में हो सकता है।
रणनीतिक दबाव: डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान के प्रभाव में आकर कश्मीर या सिंधु जल जैसे मुद्दों पर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है।