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October 09 2026 07:38 pm

'यह तो टॉर्चर करने जैसा है': मौत की सजा के लाइव टेलीकास्ट के फैसले पर भड़का वैश्विक गुस्सा

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मौत की सजा पाए कैदियों के अंतिम पलों और उन्हें दी जाने वाली सजा-ए-मौत (Execution) के सीधे प्रसारण (Live Telecast/Broadcast) को हरी झंडी दिए जाने के एक विवादास्पद न्यायिक व प्रशासनिक कदम ने पूरी दुनिया में भारी हलचल और आक्रोश पैदा कर दिया है। कैदी के निष्पादन के दृश्य को कैमरों के जरिए सार्वजनिक रूप से दिखाने के इस फैसले पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वरिष्ठ वकीलों, नागरिक अधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय मंचों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। आलोचकों और लीगल एक्सपर्ट्स ने दो टूक शब्दों में कहा है कि किसी भी इंसान की मृत्यु प्रक्रिया को टीवी या डिजिटल स्क्रीन पर तमाशा बना देना 'सीधे तौर पर क्रूरता और मानसिक टॉर्चर' है। यह कदम न केवल अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों और कैदियों की गरिमा के मूल सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है, बल्कि 21वीं सदी के सभ्य समाज को मध्यकालीन बर्बरता के दौर में धकेलने जैसा है।

फैसले के पीछे का तर्क: 'अपराधियों में खौफ और पारदर्शी न्याय'

प्रशासन और इस फैसले के समर्थकों की ओर से यह दलील दी जा रही है कि जघन्य अपराधों के दोषियों को मिलने वाली सजा का सीधा प्रसारण समाज के लिए एक कड़ा सबक (Deterrence) साबित होगा:

अपराध पर अंकुश लगाने का दावा: समर्थकों का कहना है कि सजा-ए-मौत की प्रक्रिया को सार्वजनिक रूप से दिखाने से समाज में संभावित अपराधियों के मन में कानून का ऐसा खौफ पैदा होगा जिससे संगीन वारदातों में कमी आएगी।

पारदर्शिता का हवाला: कुछ कानूनी हलकों ने यह भी तर्क दिया कि बंद जेल की कोठरियों और एकांत एग्जीक्यूशन चैंबर के बजाय प्रक्रिया को रिकॉर्ड व टेलीकास्ट करने से यह सुनिश्चित होगा कि सजा के दौरान किसी भी गैर-कानूनी या अमानवीय अतिरिक्त यातना का सहारा नहीं लिया गया।

'यह न्याय नहीं, सार्वजनिक तमाशा है': मानवाधिकार समूहों का कड़ा विरोध

इस फैसले की खबर फैलते ही एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े मानवाधिकार विशेषज्ञों ने एकजुट होकर इसका कड़ा विरोध शुरू कर दिया है:

मानवीय गरिमा का हनन: कार्यकर्ताओं ने कहा कि कानून का काम न्याय देना है, बदले की भावना से हिंसा का प्रदर्शन करना नहीं। किसी इंसान की आखिरी सांसों और तड़प को राष्ट्रीय या वैश्विक दर्शकों के सामने परोसना घोर अनैतिक और मानसिक रूप से विकृत करने वाला कदम है।

परिवार पर भावनात्मक अत्याचार: वकीलों ने तर्क दिया कि दोषी की सजा का सीधा प्रसारण न केवल उस कैदी को अंतिम क्षणों में मानसिक टॉर्चर से गुजारेगा, बल्कि उसके परिवार, मासूम बच्चों और रिश्तेदारों पर भी जीवन भर के लिए एक गहरा मनोवैज्ञानिक आघात छोड़ जाएगा।

सभ्य समाज के मूल्यों के खिलाफ: विशेषज्ञों का कहना है कि पहले भी मध्यकाल में चौराहों पर फांसी या सिर कलम करने की प्रथाएं थीं, जिन्हें आधुनिक सभ्य दुनिया ने इसलिए त्याग दिया था क्योंकि वे समाज को संवेदनशील बनाने के बजाय और अधिक हिंसक व असंवेदनशील बनाती हैं।

अदालतों में चुनौती देने की तैयारी, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घिरी सरकार

मानवाधिकार वकीलों के एक बड़े समूह ने इस आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालतों और संवैधानिक पीठों में आपातकालीन याचिकाएं दायर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

याचिकाओं में अंतरराष्ट्रीय नागरिक और राजनीतिक अधिकार संधि (ICCPR) का हवाला दिया जा रहा है, जो किसी भी व्यक्ति को 'क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार व सजा' के खिलाफ स्पष्ट कानूनी सुरक्षा प्रदान करती है। कई यूरोपीय देशों और वैश्विक राजनयिकों ने भी इस फैसले पर गहरी आपत्ति जताते हुए कहा है कि मृत्युदंड की प्रक्रिया का मीडिया प्रसारण किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के मानकों के अनुकूल नहीं है। बढ़ते दबाव और तीखे विरोध के बीच अब यह देखना होगा कि क्या प्रशासन इस विवादास्पद फैसले को वापस लेता है या फिर यह मामला अदालत की चौखट पर जाकर रुकता है।