गधों ने कर दिखाया करिश्मा: 44 साल में बदल डाली बंजर रेगिस्तान की तस्वीर, लौट आई हरियाली और जीवन
इंसानी समाज में गधे को अक्सर मंदबुद्धि या केवल वजन ढोने वाले जानवर के तौर पर देखा जाता है, लेकिन प्रकृति के संतुलन और पर्यावरण संरक्षण के मामले में इस बेजुबान जानवर ने ऐसा ऐतिहासिक कारनामा कर दिखाया है जिसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों को दांतों तले उंगलियां दबाने पर मजबूर कर दिया है। पिछले 44 वर्षों तक चले एक लंबे और गहन वैज्ञानिक अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि जंगली गधों (Feral Donkeys) और घोड़ों ने अपने प्राकृतिक व्यवहार की बदौलत एक सूखे, बंजर और वीरान रेगिस्तान का पूरा भूगोल ही बदलकर रख दिया। जहां कभी मीलों तक सिर्फ सूखी रेत, चटकती मिट्टी और कंटीली झाड़ियां नजर आती थीं, आज वहां पानी के नए स्रोत फूट पड़े हैं, घनी हरियाली लहलहा रही है और दर्जनों दुर्लभ वन्यजीव वापस लौट आए हैं।
रेगिस्तान में 'इंजीनियर' बने गधे: खुरों से खोद डाले पानी के गहरे कुएं
यह अद्भुत कहानी उत्तरी अमेरिका के सोनोरन और मोजावे रेगिस्तान (Sonoran and Mojave Deserts) के बंजर इलाकों की है। गर्मियों के मौसम में जब इन रेगिस्तानी इलाकों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और जमीन की सतह पर मौजूद सारे प्राकृतिक जलस्रोत सूखकर पत्थर हो जाते हैं, तब वहां जीवन बचाना लगभग नामुमकिन हो जाता है। ऐसे भीषण सूखे के दौर में इन जंगली गधों ने एक असाधारण प्राकृतिक इंजीनियरिंग का प्रदर्शन किया।
गधों ने अपनी सूंघने की तीव्र क्षमता से जमीन के नीचे बहने वाले भूमिगत जल (Underground Water) की नमी को पहचाना। इसके बाद उन्होंने अपने मजबूत खुरों और थूथन से सूखी नदी की तलहटियों (Dry Riverbeds) में खुदाई शुरू की। गधों ने एक-दो नहीं, बल्कि दो से छह फीट तक गहरे दर्जनों कुएं खोद डाले। गधों द्वारा खोदे गए इन कुओं को वैज्ञानिकों ने 'ऐस वेल्स' (Ass Wells / Donkey Wells) का नाम दिया है। जैसे ही जमीन से ठंडा और साफ पानी ऊपर आया, वह न केवल गधों के लिए बल्कि पूरे रेगिस्तानी तंत्र के लिए जीवनदायिनी वरदान साबित हुआ।
57 से अधिक वन्यजीव प्रजातियों के लिए बने जीवन रक्षक, लौट आया इकोसिस्टम
वैज्ञानिकों ने जब इन कुओं के पास मोशन-सेंसर कैमरे लगाए, तो फुटेज देखकर शोधकर्ता दंग रह गए। गधों द्वारा खोदे गए इन कुओं पर केवल गधे ही पानी पीने नहीं आते थे, बल्कि रेगिस्तान में प्यास से दम तोड़ रहे 57 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के वन्यजीव नियमित रूप से अपनी प्यास बुझाने पहुंचने लगे।
इन कुओं का इस्तेमाल करने वाले प्रमुख जीवों में शामिल हैं:
बिगहॉर्न भेड़ें (Bighorn Sheep), पहाड़ी शेर (कौगर) और मरुस्थलीय हिरण।
काले भालू, कोयोट (जंगली भेड़िए) और रेगिस्तानी लोमड़ियां।
दर्जनों प्रजातियों के प्रवासी पक्षी, चमगादड़ और दुर्लभ मरुस्थलीय मेंढक व कीड़े-मकोड़े।
यदि गधे यह खुदाई न करते, तो भीषण गर्मी और जलवायु परिवर्तन की मार से इनमें से कई प्रजातियां इलाके से पूरी तरह विलुप्त हो चुकी होतीं। इन कुओं ने सूखे रेगिस्तान में जीवन के छोटे-छोटे नखलिस्तान (Oases) तैयार कर दिए।
बीजों का अंकुरण और 44 साल में बंजर भूमि का कायाकल्प
गधों के इस अनोखे जल प्रबंधन का सबसे क्रांतिकारी असर वहां की वनस्पति पर पड़ा। गधे जब पानी पीने के लिए गड्ढे खोदते हैं, तो आसपास की सख्त मिट्टी भुरभुरी और उपजाऊ हो जाती है। रेगिस्तानी हवाओं से उड़कर आने वाले पेड़-पौधों के बीज इन नम गड्ढों के किनारों पर अटक जाते हैं।
इसके साथ ही, गधों की लीद (Dung) ने इन बीजों के लिए एक बेहतरीन प्राकृतिक खाद (Organic Fertilizer) का काम किया। धीरे-धीरे इन कुओं के चारों ओर विलो (Willow), कॉटनवुड और विभिन्न औषधीय घासों के पौधे पनपने लगे। 44 साल के अनवरत चक्र में यह प्रक्रिया इतनी व्यापक हो गई कि जिन सूखी घाटियों में हरियाली का नामोनिशान नहीं था, वहां सघन हरियाली की लंबी पट्टियां विकसित हो गईं। जहां पानी और पेड़ आए, वहां कीट-पतंगों और पक्षियों का पूरा नया संसार बस गया।
'आक्रामक प्रजाति' कहे जाने वाले गधों पर वैज्ञानिकों का बदला नजरिया
पर्यावरण विज्ञान की दुनिया में लंबे समय से यह बहस चल रही थी कि गधे और घोड़े ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे महाद्वीपों के मूल निवासी नहीं हैं, बल्कि इंसानों द्वारा लाए गए 'इनवेसिव' (आक्रामक) जीव हैं जो स्थानीय संसाधनों को नुकसान पहुंचाते हैं। कई देशों में तो इनकी आबादी को नियंत्रित करने के लिए इन्हें मारने तक की योजनाएं बनाई गई थीं।
लेकिन साइंस जर्नल में प्रकाशित इस 44 साल के ऐतिहासिक अध्ययन ने वैज्ञानिकों के पुराने नजरिए को पूरी तरह पलट कर रख दिया है। वैज्ञानिकों ने माना है कि लाखों साल पहले हिमयुग के दौरान जो विशालकाय शाकाहारी जीव (Megafauna) विलुप्त हो गए थे, गधे आज ठीक उन्हीं का पारिस्थितिकीय स्थान (Ecological Niche) भर रहे हैं। प्रकृति ने इन बेजुबानों को रेगिस्तान का पुनर्जीवन करने वाला 'इकोसिस्टम इंजीनियर' बनाया है। गधों के इस करिश्मे ने यह साबित कर दिया है कि कुदरत के बनाए किसी भी जीव को कमतर आंकना इंसान की सबसे बड़ी भूल है।