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November 07 2026 06:29 am

सेना जैसी वर्दी क्यों नहीं पहनते हूती लड़ाके? जानिए पारंपरिक लिबास के पीछे की सैन्य रणनीति

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लाल सागर के समंदर में आधुनिक जहाजों को दहलाने वाले, अरबों डॉलर के अमेरिकी एमक्यू-9 रीपर ड्रोन को मार गिराने वाले और हजारों किलोमीटर दूर इजरायल तक सटीक बैलिस्टिक मिसाइलें दागने वाले यमन के हूती विद्रोहियों का हुलिया हर किसी को हैरान कर देता है। जब भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया या सोशल मीडिया पर हूती लड़ाकों की तस्वीरें और वीडियो सामने आते हैं, तो एक बात सबसे अलग नजर आती है—आधुनिक सेनाओं की तरह न तो उनके सिर पर केवलर हेलमेट होता है, न सीने पर बुलेटप्रूफ बॉडी आर्मर और न ही पैरों में भारी टैक्टिकल मिलिट्री बूट्स। इसके बजाय वे साधारण रबर की चप्पलों या सैंडल, पारंपरिक अरबी स्कर्ट जैसी पोशाक और कंधे पर एक शॉल डाले नजर आते हैं, जबकि हाथों में दुनिया के सबसे आधुनिक और संहारक हथियार होते हैं। यह विरोधाभास महज सादगी या गरीबी का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे यमन की सदियों पुरानी कबीलाई संस्कृति, मनोवैज्ञानिक युद्ध और गुरिल्ला रणनीति का एक बेहद सोचा-समझा खेल है।

'फूटा' और 'जम्बिया': यमनी कबीलाई संस्कृति और पहचान का प्रतीक

हूती लड़ाके जो पारंपरिक पोशाक पहनते हैं, उसे स्थानीय यमनी भाषा में 'फूटा' (Futa) या 'मावास' कहा जाता है। यह कमर के चारों ओर लपेटी जाने वाली एक सूती लुंगी या अनस्टिच स्कर्ट जैसी होती है। इसके साथ वे ऊपर साधारण शर्ट, वेस्टकोट या जैकेट पहनते हैं। उनकी कमर पर सजे चौड़े बेल्ट में एक विशेष मुड़ा हुआ खंजर लगा होता है, जिसे 'जम्बिया' (Jambiya) कहा जाता है।

यमन के समाज में यह पहनावा केवल रोजमर्रा के कपड़े नहीं हैं, बल्कि यह पुरुषत्व, कबीलाई स्वाभिमान और सामाजिक सम्मान का सबसे बड़ा प्रतीक है। उत्तरी यमन के जैदी शिया कबीलों में एक वयस्क पुरुष का अपनी पारंपरिक पोशाक और जम्बिया के बिना सार्वजनिक रूप से निकलना कमजोरी माना जाता है। हूती विद्रोही (जिन्हें आधिकारिक रूप से 'अंसार अल्लाह' कहा जाता है) खुद को विदेशी आक्रांताओं और भ्रष्ट हुकूमतों के खिलाफ लड़ने वाले 'जमीन से जुड़े सच्चे यमनी' के रूप में पेश करते हैं। पारंपरिक पोशाक पहनकर वे स्थानीय कबीलों को यह संदेश देते हैं कि वे किसी विदेशी सेना के भाड़े के सैनिक नहीं, बल्कि उन्हीं के बीच के आम लोग हैं।

गुरिल्ला युद्ध (Guerrilla Warfare) और पहचान छिपाने की सोची-समझी चाल

सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, हूतियों द्वारा नियमित सैन्य वर्दी न पहनने की सबसे बड़ी वजह उनकी सामरिक गुरिल्ला रणनीति है:

आम नागरिकों में घुलना-मिलना: यदि लड़ाके नियमित छलावरण वाली वर्दी (Camouflage Uniform) पहनेंगे, तो अमेरिकी ड्रोन्स, सैटेलाइट्स और लड़ाकू विमानों के लिए उन्हें आसमान से पहचानना और निशाना बनाना बेहद आसान हो जाएगा। चप्पल और पारंपरिक पोशाक पहनने से हूती लड़ाके किसी आम गड़ेरिये, किसान या बाजार में घूमते आम नागरिक से अलग नहीं दिखते। वे हमला करने के बाद अपनी राइफल छुपाकर पलक झपकते ही आम भीड़ में गायब हो जाते हैं।

पहाड़ी इलाकों में चप्पलों की गतिशीलता: यमन का भूगोल बेहद उबड़-खाबड़, पथरीले और तीखे पहाड़ों से भरा हुआ है। स्थानीय लड़ाके बचपन से ही इन चट्टानों पर नंगे पांव या हल्की चप्पलों में चलने के आदी होते हैं। भारी और टाइट मिलिट्री बूट्स की तुलना में हल्की चप्पलें या नंगे पैर उन्हें इन पथरीली पहाड़ियों पर बिना फिसले बेहद तेजी और फुर्ती से चढ़ने-उतरने की आजादी देते हैं।

गर्म और शुष्क मौसम: यमन की भीषण गर्मी और उमस में भारी कॉम्बैट गियर और सिंथेटिक यूनिफॉर्म पहनकर घंटों घात लगाकर बैठना बेहद कष्टदायक होता है। हवादार सूती 'फूटा' लड़ाकों को डिहाइड्रेशन और अत्यधिक पसीने से बचाती है।

मनोवैज्ञानिक युद्ध: 'सुपरपॉवर' के अहंकार को चोट पहुंचाने का औजार

हूतियों की चप्पल और पारंपरिक पोशाक मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare) का एक बेहद घातक हथियार भी है। जब सोशल मीडिया पर एक साधारण चप्पल पहने लड़ाका 30 मिलियन डॉलर के हाई-टेक अमेरिकी ड्रोन के मलबे पर खड़ा होकर जश्न मनाता है, या अत्याधुनिक रडार सिस्टम से लैस अरबों डॉलर के पश्चिमी युद्धपोत पर एंटी-शिप क्रूज मिसाइल दागता दिखता है, तो यह वैश्विक महाशक्तियों की आधुनिक सैन्य श्रेष्ठता के अहंकार पर सीधा प्रहार होता है।

हूती अपने प्रचार वीडियो के जरिए यह नैरेटिव गढ़ते हैं कि तकनीक और अकूत दौलत से लैस आधुनिक सेनाओं को उनके फकीराना जज्बे, साधारण पहनावे और धार्मिक विश्वास के दम पर धूल चटाई जा सकती है। यह दृश्य अरब जगत और पश्चिमी देशों के विरोधी गुटों में उनके प्रति एक खास किस्म का आकर्षण और समर्थन पैदा करता है, जिससे उन्हें नए रंगरूटों की भर्ती करने में भारी मदद मिलती है।

परेड में वर्दी, लेकिन मोर्चे पर चप्पल: दोनों का अलग इस्तेमाल

ऐसा नहीं है कि हूती विद्रोहियों के पास सेना जैसी कॉम्बैट वर्दी की कमी है। राजधानी सना में होने वाली औपचारिक सैन्य परेडों में उनके विशेष दस्ते (स्पेशल फोर्सेज) पूरी तरह से डिजिटल कैमोफ्लाज वर्दी, बुलेटप्रूफ जैकेट्स, टैक्टिकल गॉगल्स और आधुनिक हेलमेट पहनकर मार्च-पास्ट करते दिखाई देते हैं। यह प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अपने समर्थकों को अपनी संगठित सैन्य ताकत दिखाने के लिए किया जाता है।

लेकिन जैसे ही ये लड़ाके वास्तविक युद्ध के मोर्चे—सऊदी सीमा, मारिब के रेगिस्तान या लाल सागर के तटीय ठिकानों—पर पहुंचते हैं, वे तुरंत अपनी पश्चिमी शैली की वर्दी उतारकर अपनी पुरानी 'चप्पल और फूटा' में लौट आते हैं। यही चप्पल और पारंपरिक पोशाक पिछले एक दशक से दुनिया की सबसे महंगी और सुसज्जित सेनाओं के लिए एक ऐसा अबूझ चक्रव्यूह बनी हुई है, जिसे भेद पाना आज भी आधुनिक सैन्य तकनीक के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है।