सारे आदर्श भूल गया ब्रिटेन अब भारत के आगे फैलाए हाथ, दोबारा खरीदेगा रिफाइंड रूसी तेल

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India News Live,Digital Desk : वैश्विक राजनीति में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही कोई स्थायी दुश्मन, यहां सिर्फ 'राष्ट्रहित' सर्वोपरि होता है। यह बात एक बार फिर साबित हो गई है। यूक्रेन युद्ध के बाद पूरी दुनिया को नैतिकता और आदर्शों का पाठ पढ़ाने वाला ब्रिटेन अब जमीनी हकीकत के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गया है। रूस की अर्थव्यवस्था को तबाह करने का दावा करने वाले ब्रिटेन ने अब अपनी जिद छोड़ दी है और वह भारत से प्रोसेस्ड रूसी तेल (रिफाइंड ऑयल) दोबारा खरीदने जा रहा है।

ईरान और अमेरिका के बीच भड़के ताजा युद्ध ने वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार मचा दिया है। इस जंग के चलते दुनिया के कई देशों में ईंधन का गंभीर संकट पैदा हो गया है, जिसके बाद पश्चिमी देशों के तेवर ढीले पड़ते दिख रहे हैं। इसी कड़ी में ब्रिटेन ने एक ऐसा यू-टर्न लिया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी कूटनीति की पोल खोलकर रख दी है।

ब्रिटिश सरकार का बड़ा फैसला, जारी किया 'जनरल लाइसेंस'

ब्लूमबर्ग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटिश सरकार ने रूस के खिलाफ लगाए गए अपने बेहद कड़े प्रतिबंधों को काफी हद तक शिथिल (ढीला) कर दिया है। ब्रिटेन ने मंगलवार देर रात एक नया 'जनरल लाइसेंस' जारी किया है। इस नए आदेश के तहत, भारत और तुर्की की रिफाइनरियों में रूसी कच्चे तेल (Crude Oil) से तैयार किए गए डीजल और जेट ईंधन (Aviation Fuel) के आयात को बिना किसी समय सीमा (Time Limit) के वैध घोषित कर दिया गया है। यह नया नियम बुधवार, 20 मई से आधिकारिक तौर पर लागू भी हो गया है।

आखिर यू-टर्न लेने पर क्यों मजबूर हुआ ब्रिटेन?

सवाल उठता है कि कल तक रूस को आंखें दिखाने वाला ब्रिटेन आज अचानक क्यों झुक गया? दरअसल, इसके पीछे की मुख्य वजह ईरान-अमेरिका युद्ध है। इस जंग के कारण खाड़ी देशों (Gulf Countries) से होने वाली तेल और ईंधन की सप्लाई चेन बुरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है।

इससे पहले तक ब्रिटेन और पूरा यूरोपीय संघ अपनी जरूरतों के लिए खाड़ी देशों की रिफाइनरियों पर निर्भर थे, लेकिन वहां जारी जंग ने सप्लाई ठप कर दी है। अपनी जिद के कारण ब्रिटेन ने जनवरी महीने से भारत से डीजल या जेट ईंधन की एक बूंद भी आयात नहीं की थी, लेकिन अब घरेलू संकट को देखते हुए उसे अपने ही बनाए नियमों को ताक पर रखना पड़ा।

आसमान छू रहीं कीमतें, ठप होने की कगार पर परिवहन व्यवस्था

ईंधन की सप्लाई बाधित होने से पूरे यूरोप में हाहाकार मचा हुआ है। यूरोप में डीजल का मुख्य बेंचमार्क यानी 'ICE Gasoil Futures' इतिहास के सबसे उच्चतम स्तर यानी करीब 160 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है। ब्रिटेन के भीतर विमान ईंधन (जेट फ्यूल) और डीजल की भारी किल्लत हो गई है, जिससे वहां की पूरी परिवहन व्यवस्था और एविएशन सेक्टर ठप होने की कगार पर पहुंच गया था। देश को ब्लैकआउट और आर्थिक मंदी से बचाने के लिए आखिरकार ब्रिटिश सरकार को भारत का रुख करना ही पड़ा।

भारतीय कूटनीति की महाविजय, सही साबित हुई मोदी सरकार की नीति

ब्रिटेन के इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की विदेश नीति और कूटनीति का डंका एक बार फिर बजा दिया है। साल 2022 में जब यूक्रेन पर रूसी हमला हुआ था, तब अमेरिका और ब्रिटेन समेत तमाम पश्चिमी देशों ने भारत पर रूस से तेल न खरीदने का भारी दबाव बनाया था। हालांकि, भारत ने बिना किसी दबाव में आए अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा और रूस से भारी डिस्काउंट पर कच्चा तेल खरीदना जारी रखा।

देखते ही देखते भारत रूसी कच्चे तेल का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार और प्रोसेसर बनकर उभरा। भारतीय रिफाइनरियों (जैसे रिलायंस और नयरा) ने इस सस्ते तेल को प्रोसेस करके डीजल और पेट्रोल में बदला। अब वही पश्चिमी देश, जो कभी भारत की आलोचना कर रहे थे, अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए भारत के सामने कतार में खड़े हैं। बता दें कि इससे पहले अमेरिका भी रूसी तेल की खरीद पर प्रतिबंधों में छूट की अवधि को आगे बढ़ा चुका है।