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August 10 2026 05:22 pm

अयोध्या राम मंदिर में सीईओ की नियुक्ति पर धार्मिक समिति का बड़ा बयान; आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने जताई आशंका, कहा- 'सीईओ से नहीं, संतों से चले व्यवस्था'

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राम नगरी अयोध्या में प्रभु श्री राम के भव्य मंदिर निर्माण के बाद प्रशासनिक व्यवस्थाओं और दैनिक प्रबंधन को दुरुस्त करने के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की नियुक्ति की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है। इसी बीच, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा नवगठित 'धार्मिक समिति' की पहली महत्वपूर्ण बैठक अयोध्या स्थित श्री रामवल्लभा कुंज मंदिर में संपन्न हुई। लगभग तीन घंटे तक चली इस मैराथन बैठक में ट्रस्ट के अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन, समिति के वरिष्ठ सदस्य आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण, महंत रामानंद दास, महंत राजकुमार दास समेत कई प्रमुख पदाधिकारी और संत-महंत उपस्थित रहे, जबकि समिति के अध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी जी महाराज ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। इस बैठक में वैसे तो आगामी सावन झूलनोत्सव और रामलला की भव्य पालकी यात्रा को लेकर कई ऐतिहासिक निर्णय लिए गए, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था को संभालने के लिए बनाए जा रहे 'सीईओ' पद को लेकर हुई। बैठक के दौरान धार्मिक समिति के सदस्यों ने स्पष्ट किया कि सनातन धर्म की मर्यादा और मठ-मंदिरों की परंपराओं की रक्षा करना ही प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए।

'भगवान के प्रति निष्ठा बनाम प्रशासनिक व्यवस्था': धार्मिक समिति ने क्यों जताई चिंता?

बैठक में अपना पक्ष रखते हुए राम मंदिर ट्रस्ट की धार्मिक समिति के प्रमुख सदस्य आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने मंदिर के संचालन में सीईओ की भूमिका पर गंभीर विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि मौलिक रूप से सनातन धर्म के मठों, मंदिरों और आश्रमों का संचालन किसी प्रशासनिक अधिकारी या कॉर्पोरेट सीईओ के हाथों में नहीं होना चाहिए। मंदिर की व्यवस्था का वास्तविक अधिकार केवल ऐसे लोगों और संतों के पास होना चाहिए, जिनकी पहली और अंतिम निष्ठा भगवान के प्रति हो और जिनका संपूर्ण जीवन मंदिर, मठ तथा धर्मशास्त्रों की परंपराओं के बीच व्यतीत हुआ हो। उन्होंने तर्क दिया कि कोई भी नौकरशाह या प्रशासनिक अनुभव रखने वाला व्यक्ति अपनी दक्षता से व्यवस्था तो चला सकता है, लेकिन इस बात की पूरी आशंका बनी रहती है कि उस व्यक्ति की निष्ठा भगवान और धार्मिक मर्यादाओं के बजाय प्रशासनिक नियमों और पदानुक्रम के प्रति अधिक होगी। इससे मंदिर के आध्यात्मिक और पारंपरिक स्वरूप के प्रभावित होने का जोखिम रहता है।

सीईओ की नियुक्ति पर विरोध नहीं, लेकिन अधिकारों और भूमिका की स्पष्ट सीमा तय करना अनिवार्य

आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने अपने वक्तव्य में यह भी स्पष्ट किया कि वे समय और परिस्थिति की आवश्यकताओं से अनभिज्ञ नहीं हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि देश के कई अन्य बड़े और ऐतिहासिक मंदिरों (जैसे तिरुपति बालाजी या वैष्णो देवी) में सीईओ तथा प्रशासनिक बोर्ड के जरिए व्यवस्थाएं संचालित की जा रही हैं। यदि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट राम मंदिर में भी किसी सीईओ की नियुक्ति करने का फैसला लेता है, तो वे या धार्मिक समिति इसका प्रत्यक्ष विरोध नहीं करेंगे। हालांकि, उन्होंने इसके साथ एक बेहद कड़ी और महत्वपूर्ण शर्त रख दी। उन्होंने कहा कि यदि सीईओ की नियुक्ति होती है, तो उस अधिकारी की भूमिका, अधिकार क्षेत्र, कार्यशैली और शक्तियों की सीमाएं स्पष्ट रूप से पहले ही लिखित में तय होनी चाहिए। सीईओ केवल मंदिर के प्रशासनिक सहयोग और नागरिक सुविधाओं तक सीमित रहे; धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पद्धति और परंपराओं में उसका कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

चढ़ावा विवाद से लेकर 5,200 आवेदनों की स्क्रूटनी: कैसे तैयार हुई सीईओ नियुक्ति की पूरी पृष्ठभूमि?

उल्लेखनीय है कि अयोध्या राम मंदिर में पहली बार मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) का पद सृजित करने की आवश्यकता जून-जुलाई 2026 में सामने आए चढ़ावा विवाद के बाद महसूस की गई थी। मंदिर में चढ़ावे और व्यवस्थाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही तथा आधुनिक भीड़ प्रबंधन को लागू करने के लिए ट्रस्ट ने एक निष्कलंक और अनुभवी शीर्ष प्रशासक नियुक्त करने का निर्णय लिया। इस पद के लिए देश भर से 5,200 से अधिक पूर्व अधिकारियों, नौकरशाहों, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और प्रबंधकों ने आवेदन जमा किए थे। रिटायर्ड जस्टिस प्रमोद कोहली की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय चयन समिति ने गहन जांच-पड़ताल और पहले दौर के इंटरव्यू के बाद केवल 18 उम्मीदवारों को अंतिम साक्षात्कार के लिए छांटा है। 11 और 12 अगस्त को राम मंदिर परिसर स्थित पिलग्रिम फैसिलिटी सेंटर (PFC) में इन 18 उम्मीदवारों का साक्षात्कार लिया जा रहा है, जिसके बाद तैयार 3 नामों के पैनल पर 2 सितंबर को होने वाली ट्रस्ट की बैठक में अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

15 अगस्त को झूलनोत्सव और रामलला की भव्य पालकी यात्रा पर धार्मिक समिति का ऐतिहासिक फैसला

धार्मिक समिति की इस तीन घंटे लंबी बैठक में केवल प्रशासनिक मुद्दों पर ही चर्चा नहीं हुई, बल्कि सावन मास के पावन पर्व को लेकर कई अभूतपूर्व सांस्कृतिक फैसले भी लिए गए। बैठक की जानकारी देते हुए महंत रामानंद दास ने बताया कि 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस की शाम लगभग 5 बजे राम मंदिर के गर्भगृह से गाजे-बाजे के साथ पहली बार भगवान रामलला की भव्य पालकी यात्रा निकाली जाएगी। यह यात्रा परिसर के उत्तरी द्वार से होकर परकोटे का भ्रमण करते हुए ऐतिहासिक कुबेर टीला पहुंचेगी, जहां दो घंटे का विशेष धार्मिक अनुष्ठान होगा। इसके उपरांत रामलला पुनः गर्भगृह लौटेंगे और स्वर्ण जड़ित चांदी के हिंडोले (झूले) पर झूलनोत्सव का आनंद लेंगे। इसके साथ ही 15 अगस्त से अयोध्या के प्रसिद्ध मणिपर्वत से पारंपरिक सावन झूला मेला भी आरंभ हो रहा है।

धार्मिक परंपराओं और प्रशासनिक सुशासन के बीच संतुलन साधने की अवध में बड़ी कवायद

भौगोलिक और आध्यात्मिक दृष्टि से सरयू के तट पर बसी अवध नगरी अयोध्या इस समय एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। एक ओर जहां प्रतिदिन लाखों की संख्या में उमड़ रहे देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन और विश्वस्तरीय नागरिक सुविधाएं जुटाना प्रशासन और ट्रस्ट की प्राथमिक चुनौती है, वहीं दूसरी ओर सदियों पुरानी सनातन परंपराओं, संत समाज के मान-सम्मान और मंदिर की पवित्रता को अक्षुण्ण रखना भी उतना ही अनिवार्य है। धार्मिक समिति द्वारा रखी गई यह शर्त कि 'सीईओ केवल व्यवस्था संभाले, परंपराएं संत ही तय करेंगे', वास्तव में प्रशासनिक सुशासन और आध्यात्मिक मर्यादा के बीच एक बेहतरीन संतुलन कायम करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। अब सभी की निगाहें 2 सितंबर की ट्रस्ट बैठक पर टिकी हैं, जहां नए सीईओ का नाम और उसके अधिकारों का दायरा अंतिम रूप से तय होगा।