पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत: असम सीएम की पत्नी से जुड़े मामले में मिली अग्रिम जमानत
India News Live,Digital Desk : कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी कानूनी जीत मिली है। शीर्ष अदालत ने असम पुलिस द्वारा दर्ज किए गए जालसाजी और मानहानि के मामले में खेड़ा को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) दे दी है। यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा की पत्नी रिनिकी भुइयां शर्मा के खिलाफ खेड़ा द्वारा की गई टिप्पणियों से जुड़ा है। जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने गुवाहाटी हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें खेड़ा की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
'व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा जरूरी'
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए टिप्पणी की कि प्रथम दृष्टया यह मामला 'राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता' से प्रेरित प्रतीत होता है। बेंच ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना न्यायालय का प्राथमिक दायित्व है। अदालत ने माना कि यह मामला ऐसा नहीं है जिसमें हिरासत में लेकर पूछताछ करना अनिवार्य हो, विशेषकर तब जब विवाद का मूल आधार राजनीतिक बयानों से जुड़ा हो।
क्या था पूरा विवाद?
पवन खेड़ा के खिलाफ यह कानूनी कार्रवाई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद शुरू हुई थी। आरोप है कि खेड़ा ने सार्वजनिक मंच से दावा किया था कि मुख्यमंत्री की पत्नी रिनिकी भुइयां शर्मा के पास एक से अधिक देशों के पासपोर्ट हैं और विदेशों में उनकी अघोषित संपत्ति है। इन आरोपों के बाद असम में उनके खिलाफ जालसाजी, मानहानि और आपराधिक साजिश की धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई थी। खेड़ा का तर्क था कि उनके बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया और यह पूरी कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा है।
अभिषेक मनु सिंघवी की तीखी दलीलें
पवन खेड़ा की ओर से पेश दिग्गज वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में दलील दी कि खेड़ा कोई शातिर अपराधी या आतंकवादी नहीं हैं, बल्कि एक सक्रिय राजनेता हैं। सिंघवी ने असम के मुख्यमंत्री की टिप्पणियों का जिक्र करते हुए उन्हें "संवैधानिक काउबॉय" करार दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि एक मानहानि के मामले में पूछताछ के लिए 50-60 पुलिसकर्मियों का दिल्ली पहुंचना क्या उचित है? सिंघवी ने आशंका जताई थी कि अगर खेड़ा को गिरफ्तार किया गया, तो उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं होगा।
सॉलिसिटर जनरल का विरोध
दूसरी ओर, असम सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जमानत का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने दावा किया कि खेड़ा ने पासपोर्ट की फर्जी प्रतियां पेश की हैं और यह पता लगाना जरूरी है कि इन दस्तावेजों के निर्माण में किन विदेशी तत्वों का हाथ है। मेहता ने तर्क दिया था कि "विदेशी ताकतों द्वारा चुनावी हस्तक्षेप" की संभावना की जांच के लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों के बावजूद खेड़ा को राहत देना उचित समझा।
घटनाक्रम पर एक नजर
यह कानूनी लड़ाई कई हफ्तों से चल रही थी। 10 अप्रैल को तेलंगाना हाई कोर्ट से मिली ट्रांजिट बेल के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट और फिर गुवाहाटी हाई कोर्ट पहुंचा था। 24 अप्रैल को गुवाहाटी हाई कोर्ट ने यह कहते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था कि एक "निर्दोष महिला" को राजनीतिक विवाद में घसीटा गया है। अंततः 1 मई को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए खेड़ा की अग्रिम जमानत पर मुहर लगा दी।