कर्नाटक सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत! 42 विधायकों की कैबिनेट रैंक को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, जानें कोर्ट ने क्या कहा

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India News Live, Digital Desk : नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट से कर्नाटक की सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के लिए एक बेहद राहत भरी खबर सामने आई है। शीर्ष अदालत ने कर्नाटक में 42 विधायकों और विधान परिषद सदस्यों (MLCs) को विभिन्न बोर्डों और निगमों के अध्यक्ष के रूप में कैबिनेट रैंक देने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद राज्य सरकार ने बड़ी राहत की सांस ली है।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर याचिकाकर्ता को दिया यह बड़ा विकल्प

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जायमाल्य बागची की खंडपीठ ने इस मामले पर मंगलवार को सुनवाई की। सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को एक बार फिर उच्च न्यायालय का रुख करने की आजादी दी है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट करते हुए कहा कि हम इस याचिका को खारिज कर रहे हैं, लेकिन याचिकाकर्ता के पास अभी भी यह स्वतंत्रता है कि वह उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दायर कर सकता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने समेकित कोष के खर्च पर उठाए गंभीर सवाल

अदालत में याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने राज्य सरकार के इस फैसले पर जोरदार बहस की। उन्होंने पीठ के सामने दलील देते हुए कहा कि इस गंभीर मामले को उच्च न्यायालय द्वारा जिस संजीदगी से देखा जाना चाहिए था, वैसे नहीं विचार किया गया। उन्होंने वित्तीय व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि इन विभागों के पास अपना कोई निजी धन नहीं होता है, बल्कि इन विधायकों और अध्यक्षों को कैबिनेट रैंक की सुविधाएं देने के लिए सारा पैसा भारत के समेकित कोष (Consolidated Fund of India) से आता है, जो जनता का पैसा है।

जानिए आखिर क्या है पूरा मामला और क्यों हाईकोर्ट ने भी झाड़ा था पल्ला

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट उस विशेष अपील पर सुनवाई कर रहा था जो कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ काम करने वाले सुरि पायाला द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के 4 मार्च के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसने उनकी इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया था। इससे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा था कि यह याचिका पूरी तरह से जनहित से प्रेरित नहीं लगती है। हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि याचिकाकर्ता इस मामले में अपने खुद के लाभ और संलिप्तता को लेकर आवश्यक जानकारी कोर्ट के सामने देने में पूरी तरह विफल रहा है, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।