September 02 2026 07:01 pm

हरतालिका तीज पर न करें ये गलतियां: अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य के लिए जरूरी हैं ये 10 कड़े नियम

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भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को सनातन परंपरा का सबसे कठिन, तपस्यापूर्ण और पुण्य फलदायी व्रत 'हरतालिका तीज' पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह व्रत अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और दांपत्य जीवन में अटूट प्रेम का वरदान लेकर आता है, वहीं कुंवारी कन्याएं सुयोग्य, मनचाहा और सदाशिव जैसा वर पाने के लिए इस व्रत का अनुष्ठान करती हैं। उत्तर प्रदेश के उन्नाव, कानपुर, लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी और बुंदेलखंड के समस्त क्षेत्रों सहित बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली-एनसीआर में हरतालिका तीज का पर्व एक महान उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए जंगल में सखियों द्वारा हरण किए जाने के बाद अत्यंत कठोर, निराहार और निर्जला तपस्या की थी। माता पार्वती की उसी अनन्य तपस्या और दृढ़ संकल्प की स्मृति में यह पावन व्रत रखा जाता है। धर्मशास्त्रों और भविष्य पुराण में उल्लेख मिलता है कि हरतालिका तीज का व्रत जितना अधिक फलदायी है, इसके नियम उतने ही कठोर और मर्यादित हैं। यदि कोई भी व्रती महिला इन नियमों में थोड़ी सी भी चूक करती है, तो व्रत का पूर्ण पुण्य फल प्राप्त नहीं होता। इसलिए हरतालिका तीज की साधना शुरू करने से पहले शास्त्रों में वर्णित इन 10 प्रमुख नियमों का भली-भांति ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है।

हरतालिका तीज का आध्यात्मिक महत्व और माता पार्वती की कठोर तपस्या

'हरतालिका' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—'हरत' अर्थात हरण करना और 'आलिका' अर्थात सखी या सहेली। पौराणिक कथा के अनुसार जब पर्वतराज हिमालय माता पार्वती का विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से कराना चाहते थे, तब पार्वती जी की सखियों ने उनका हरण कर उन्हें एक घने, एकांत जंगल में छुपा दिया था। उसी निर्जन वन में गुफा के भीतर माता पार्वती ने रेत और मिट्टी से शिवलिंग का निर्माण किया और अन्न-जल का त्याग कर भगवान आशुतोष की घोर तपस्या की थी। भाद्रपद शुक्ल तृतीया के पावन दिन ही भगवान शंकर ने माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया था।

यही कारण है कि हरतालिका तीज को केवल एक सामान्य उपवास नहीं, बल्कि आत्म-संयम, निष्ठा और आत्म-समर्पण का महापर्व माना जाता है। इस व्रत में प्रयुक्त होने वाली हर विधि, हर सामग्री और हर नियम का अपना एक गहरा आध्यात्मिक व वैज्ञानिक आधार है। सनातन परंपरा में इस व्रत को निर्जला रखने का विधान इसलिए बनाया गया है ताकि साधक अपनी इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर शिव-शक्ति की चेतना में लीन हो सके।

1. निर्जला और निराहार व्रत का कड़ा संकल्प: जल की एक बूंद भी ग्रहण करना वर्जित

हरतालिका तीज का सबसे पहला और सर्वोपरि नियम है कि यह व्रत पूरी तरह से 'निर्जला' (बिना पानी के) और 'निराहार' (बिना अन्न-फलाहार के) रखा जाता है। सूर्योदय से पहले भोर में स्नानादि के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद पूरे दिन और पूरी रात पानी की एक बूंद भी कंठ से नीचे उतारने की सख्त मनाही होती है।

गरुड़ पुराण और व्रत संहिताओं में उल्लेख है कि यदि कोई व्रती महिला जानबूझकर या आलस्यवश व्रत के दौरान जल ग्रहण कर लेती है, तो उसका व्रत तत्काल खंडित माना जाता है। यह व्रत व्रती के शारीरिक और मानसिक धैर्य की सबसे बड़ी परीक्षा है। हालांकि अत्यंत वृद्ध, गर्भवती या गंभीर बीमारियों से पीड़ित महिलाओं को शास्त्रों में फलाहार या जल ग्रहण करने की विशेष छूट दी गई है, लेकिन स्वस्थ महिलाओं के लिए निर्जला उपवास का पालन करना अनिवार्य कर्तव्य माना गया है।

2. व्रत की निरंतरता का नियम: एक बार प्रारंभ करने पर जीवनभर छोड़ना वर्जित

शास्त्रों के अनुसार हरतालिका तीज एक ऐसा अखंड व्रत है जिसे यदि किसी कन्या या सुहागिन महिला ने एक बार पूरे विधि-विधान से उठा लिया, तो वह इसे अपनी इच्छानुसार बीच में छोड़ नहीं सकती। इसे जीवनभर प्रतिवर्ष निष्ठापूर्वक निभाना पड़ता है।

यदि किसी वर्ष व्रती महिला गंभीर रूप से अस्वस्थ हो जाए और व्रत रखने में असमर्थ हो, तो उसके बदले में उसके पति या परिवार की कोई अन्य सुहागिन महिला इस व्रत का संकल्प लेकर अनुष्ठान पूर्ण कर सकती है। इस व्रत को बिना विधिवत उद्यापन के बीच में छोड़ना परिवार और वैवाहिक सुख के लिए अनिष्टकारी माना गया है। पूर्ण आयु में अथवा जब शरीर पूरी तरह असमर्थ हो जाए, तभी योग्य ब्राह्मणों की उपस्थिति में विधिवत उद्यापन करके ही इस व्रत की पूर्णाहुति की जाती है।

3. रात्रि जागरण का विधान: रातभर भजन-कीर्तन और चार प्रहर की विशेष पूजा

हरतालिका तीज का पर्व केवल दिन के उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी मुख्य आत्मा रात्रि जागरण में बसती है। इस दिन रातभर जागकर भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण करना अनिवार्य नियम है। महिलाएं पूरी रात जागकर भजन, कीर्तन, शिव तांडव स्तोत्र, पंचाक्षर मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' और पार्वती चालीसा का सामूहिक गायन करती हैं।

शास्त्रों में हरतालिका तीज की रात को चार प्रहरों में बांटकर पूजा करने का विधान बताया गया है। प्रथम प्रहर (शाम), द्वितीय प्रहर (मध्यरात्रि पूर्व), तृतीय प्रहर (निशीथ काल) और चतुर्थ प्रहर (ब्रह्म मुहूर्त से पूर्व)—इन चारों प्रहरों में क्रमशः दूध, दही, घी और शहद से भगवान भोलेनाथ का अभिषेक किया जाता है और नए पुष्प व नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। जो महिलाएं रात में सो जाती हैं, उन्हें चार प्रहर की पूजा का पुण्य प्राप्त नहीं हो पाता।

4. दिन और रात में सोने की सख्त मनाही: निद्रा त्यागने का है कड़ा शास्त्रीय विधान

हरतालिका तीज व्रत के नियमों में निद्रा त्याग को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। शास्त्रों में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि व्रतधारी महिला को व्रत के दिन दोपहर में या रात के समय भूलकर भी नहीं सोना चाहिए।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो महिला हरतालिका तीज के पावन दिन या रात में आलस्यवश सो जाती है, उसे अगले जन्म में अजगर या छिपकली की योनि प्राप्त होती है। इस प्रतीकात्मक चेतावनी का मूल अर्थ यह है कि साधना काल में चेतना का जाग्रत रहना परम आवश्यक है। नींद में जाने से मन और शरीर में तमोगुण की वृद्धि होती है, जो सात्विक साधना को नष्ट कर देती है। इसलिए पूरे 24 घंटे जागकर भगवान की भक्ति में रमे रहना ही इस व्रत का सच्चा विधान है।

5. शुद्ध काली मिट्टी या रेत से स्वयं बनाएं शिवलिंग और पार्वती प्रतिमा

हरतालिका तीज पर बाजार से खरीदी गई धातु या प्लास्टिक की मूर्तियों की अपेक्षा अपने हाथों से बनाई गई पार्थिव प्रतिमाओं के पूजन का अनंत गुना फल बताया गया है। माता पार्वती ने भी वन में अपने हाथों से रेत के शिवलिंग की रचना की थी।

व्रती को चाहिए कि किसी पवित्र नदी, तालाब या बेलपत्र के वृक्ष की जड़ से शुद्ध काली मिट्टी अथवा गंगा की पवित्र बालू (रेत) लेकर आए। उस मिट्टी में थोड़ा सा गंगाजल और गाय का दूध मिलाकर भगवान शिव, माता पार्वती, रिद्धि-सिद्धि सहित भगवान गणेश और कार्तिकेय जी की सुंदर प्रतिमाएं अपने हाथों से बनाएं। घर के ईशान कोण में फूलों का सुंदर मंडप (फुलेहरा) सजाकर एक स्वच्छ चौकी पर इन प्रतिमाओं को लाल या पीले रेशमी वस्त्र पर स्थापित करें। मिट्टी की इन पार्थिव प्रतिमाओं की पूजा करने से कोटि-कोटि यज्ञों का फल स्वतः प्राप्त हो जाता है।

6. सोलह श्रृंगार और सुहाग सामग्री अर्पण: मां गौरी को चढ़ाएं संपूर्ण सुहाग पिटारी

हरतालिका तीज अखंड सुहाग का उत्सव है, इसलिए इस दिन व्रती महिलाओं को पूर्ण रूप से सज-धजकर सोलह श्रृंगार करना चाहिए। हाथों में सुंदर मेहंदी रचाना, पैरों में महावर लगाना, मांग में सिंदूर भरना, लाल, पीले या हरे रंग की मांगलिक साड़ी पहनना और पारंपरिक आभूषण धारण करना इस व्रत का अनिवार्य अंग है। इस दिन काले, नीले या सफेद रंग के वस्त्र भूलकर भी धारण नहीं करने चाहिए, क्योंकि ये रंग सनातन पूजा में वर्जित माने गए हैं।

पूजा के दौरान माता पार्वती को एक सुहाग पिटारी अर्पित की जाती है, जिसमें सिंदूर, बिंदी, काजल, मेहंदी, चूड़ियां, बिछिया, कंघी, शीशा, आलता और लाल चुनरी सहित 16 प्रकार की श्रृंगार सामग्रियां होनी चाहिए। यह सुहाग सामग्री माता गौरी के चरणों में स्पर्श कराकर अपनी मांग में लगाने से दांपत्य जीवन के समस्त संकट, अकाल वैधव्य का भय और ग्रहों के क्रूर प्रभाव सदा के लिए नष्ट हो जाते हैं।

7. हरतालिका तीज व्रत कथा का अनिवार्य श्रवण: बिना कथा के निष्फल रहता है पूजन

इस व्रत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम यह है कि प्रदोष काल की मुख्य पूजा के समय हरतालिका तीज की पौराणिक कथा का श्रवण पूरे ध्यान और श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए। अकेले या मोहल्ले की सभी व्रतधारी महिलाओं के साथ बैठकर किसी बुजुर्ग महिला या योग्य पुरोहित के मुख से कथा सुनना धर्मसम्मत है।

कथा सुनते समय हाथ में अक्षत, पुष्प और दूर्वा रखकर कथा के एक-एक शब्द को एकाग्रचित्त होकर सुनना चाहिए। शास्त्रों का विधान है कि यदि किसी व्रती ने कठिन से कठिन निर्जला उपवास रखा, किंतु व्रत कथा का श्रवण नहीं किया, तो उसकी पूजा अधूरी मानी जाती है और उसे व्रत का यथेष्ट फल नहीं मिलता। कथा की समाप्ति के बाद हाथ के अक्षत और पुष्प को माता पार्वती और शिवलिंग पर अर्पित कर देना चाहिए।

8. क्रोध, कलह और वाणी दोष से पूर्ण दूरी: मन, कर्म और वचन की शुद्धता

व्रत केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि अपनी इंद्रियों, विचारों और वाणी को शुद्ध करना ही वास्तविक तपस्या है। हरतालिका तीज के दिन व्रती महिला को अपने क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण रखना चाहिए।

घर-परिवार में किसी से भी वाद-विवाद, झगड़ा, कटु वचन या किसी अन्य की निंदा और चुगली करने से पूरी तरह बचना चाहिए। इस दिन यदि मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष या अहंकार का भाव आता है, तो उपवास का आध्यात्मिक प्रभाव नष्ट हो जाता है। अपने पति, सास-ससुर और घर के सभी बुजुर्गों के प्रति आदर का भाव रखें। वाणी में मिठास और हृदय में क्षमा व करुणा का भाव रखना ही भगवान शिव और माता जगदंबा को सर्वाधिक प्रिय है।

9. सास या वरिष्ठ सुहागिन महिला को बायना (सुहाग पिटारी) भेंट और चरण स्पर्श

पूजा और कथा संपन्न होने के बाद शास्त्रों में 'बायना' निकालने का विशेष विधान है। बायने में एक थाली में सात्विक फल, मिष्ठान्न, कुछ दक्षिणा (रुपये) और माता पार्वती को अर्पित की गई सुहाग पिटारी रखी जाती है।

इस बायने को अपने आंचल से ढककर अपनी सास, जेठानी या किसी वरिष्ठ पूज्य सुहागिन महिला के चरण स्पर्श करके आदरपूर्वक भेंट करना चाहिए। यदि सास पास में न हों, तो यह सामग्री किसी योग्य, सदाचारी ब्राह्मण की पत्नी को दी जा सकती है। सास और बड़ों का आशीर्वाद लिए बिना हरतालिका तीज की पूजा संपूर्ण नहीं मानी जाती। बड़ों के मुख से निकला 'अखंड सौभाग्यवती भव' का आशीर्वाद ही महिला के सुहाग की सबसे बड़ी रक्षा ढाल बनता है।

10. सूर्योदय के बाद ही पारण और पार्थिव प्रतिमाओं का विधिवत विसर्जन

हरतालिका तीज व्रत का अंतिम और दसवां नियम पारण (व्रत खोलने) से जुड़ा है। तीज का पारण उसी दिन रात में नहीं किया जाता, बल्कि अगले दिन यानी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की सुबह सूर्योदय के बाद ही पारण करने का विधान है।

व्रती महिलाओं को अगले दिन प्रातः काल जल्दी उठकर पुनः स्नान करना चाहिए। इसके पश्चात विधि-विधान से शिव-पार्वती की अंतिम आरती करें और उन्हें भोग अर्पित करें। इसके बाद श्रद्धापूर्वक बनाई गई मिट्टी की प्रतिमाओं को किसी पवित्र नदी, जलाशय, तालाब या घर के गमले में शुद्ध जल के साथ विसर्जित करें। विसर्जन के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। पारण में सबसे पहले खीरा, ककड़ी, जल या भीगे हुए चने का प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोला जाता है। इसके पश्चात ही सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।

हरतालिका तीज का यह महापर्व आत्म-समर्पण और निष्ठा का पावन संगम है। यदि कोई व्रती महिला जाने-अनजाने में किसी नियम का पालन करने से चूक जाती है, तो पूजा के अंत में भगवान शिव और माता पार्वती से हाथ जोड़कर क्षमा याचना करनी चाहिए। सच्चे भाव, शुद्ध अंतःकरण और बताए गए इन 10 नियमों के साथ किया गया हरतालिका तीज का व्रत घर में सुख, शांति, संतान वृद्धि और सात जन्मों तक पति के अटूट साथ का वरदान सुनिश्चित करता है।