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September 09 2026 02:43 am

जानिए कौन हैं राम मंदिर के पहले CEO एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा, क्या था ऐतिहासिक 'ऑपरेशन सिंदूर' जिससे थर्राया था दुश्मन?

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अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के प्रशासनिक और प्रबंधकीय इतिहास में उस वक्त एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया, जब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने भारतीय वायुसेना के पूर्व शीर्ष कमांडर एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) जीतेंद्र मिश्रा को राम मंदिर का पहला पूर्णकालिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त करने का निर्णय लिया। देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए लगभग चार दशकों तक आकाश में गर्जना करने वाले और सामरिक अभियानों के मास्टरमाइंड रहे एक सैन्य योद्धा को अब रामलला के दरबार की सुरक्षा, वित्तीय व्यवस्था और करोड़ों श्रद्धालुओं की दर्शन प्रणाली को व्यवस्थित करने का दायित्व सौंपा गया है। उनकी इस नियुक्ति के साथ ही यह सवाल हर किसी की जुबां पर तैर रहा है कि वायुसेना के लड़ाकू विमानों की कमान संभालने वाले एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा कौन हैं और उनका बहुचर्चित 'ऑपरेशन सिंदूर' से क्या संबंध है, जिसके चलते उन्हें देश के शीर्ष युद्ध सम्मान से नवाजा गया था।

उत्तर प्रदेश के देवरिया से निकलकर देश के सामरिक पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा का जीवन अनुशासन, अद्वितीय रणनीतिक सोच और असाधारण नेतृत्व का जीवंत उदाहरण है। अयोध्या में हाल ही में सामने आए दान-चढ़ावे के विवादों और दैनिक लाखों की संख्या में उमड़ने वाले श्रद्धालुओं के प्रबंधन की चुनौतियों के बीच ट्रस्ट ने एक ऐसे निष्पक्ष और दृढ़ संकल्प वाले व्यक्तित्व की तलाश की थी, जो बिना किसी राजनीतिक दबाव के मंदिर की कार्यप्रणाली को तिरुपति और वैष्णो देवी की तर्ज पर पूरी तरह पारदर्शी और कॉर्पोरेट स्तर का बना सके। 5,585 आवेदकों की लंबी कतार में से एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा का चयन इस बात का प्रमाण है कि राम मंदिर के संचालन में अब सैन्य अनुशासन और आधुनिक प्रबंधन की कार्यसंस्कृति स्थापित होने जा रही है।

देवरिया की माटी से वेस्टर्न एयर कमांड तक: कैसा रहा चार दशकों का सैन्य सफर

एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा का मूल जुड़ाव उत्तर प्रदेश की मिट्टी से बेहद गहरा है। वे पूर्वांचल के देवरिया जनपद के एक छोटे से गांव भोपतपुरा के रहने वाले हैं। एक साधारण मध्यमवर्गीय शिक्षक (प्रवक्ता) परिवार में जन्मे जीतेंद्र मिश्रा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही भारतीय सेना में जाकर देश सेवा करने का सपना संजो लिया था। अपनी मेधा और शारीरिक दक्षता के बल पर उन्होंने देश की सबसे प्रतिष्ठित सैन्य अकादमी—राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) खड़कवासला में प्रवेश प्राप्त किया। एनडीए से कठिन प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्हें 6 दिसंबर 1986 को भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान (फाइटर) विंग में एक फ्लाइंग ऑफिसर के रूप में कमीशन मिला।

अपने लगभग 40 वर्षों के सुदीर्घ और गौरवशाली सैन्य करियर में एयर मार्शल मिश्रा ने 18 से अधिक प्रकार के लड़ाकू, परिवहन और बहुउपयोगी विमानों पर 3,000 घंटे से अधिक की उड़ान भरी। वे वायुसेना के चुनिंदा 'फाइटर कॉम्बैट लीडर' और 'एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट' के रूप में जाने गए। वर्ष 1999 के ऐतिहासिक करगिल युद्ध (ऑपरेशन सफेद सागर) के दौरान जब भारतीय सेना द्रास और बटालिक की बर्फीली चोटियों पर कब्जा जमाए घुसपैठियों से जूझ रही थी, तब एयर मार्शल मिश्रा उस गुप्त तकनीकी टीम के सबसे प्रमुख सदस्य थे, जिसने बेहद कम समय में मिराज-2000 लड़ाकू विमानों में 'लेजर गाइडेड बम' (LGB) तकनीक को ऑपरेशनल रूप से इंटीग्रेट किया था। इसी तकनीक के सहारे टाइगर हिल और मुनथो ढालो में स्थित दुश्मन के मजबूत बंकरों पर अचूक हवाई हमले कर करगिल युद्ध की दिशा बदली गई थी। इसके अलावा वे एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट (ASTE) के कमांडेंट और इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ में डिप्टी चीफ (ऑपरेशंस एंड डॉक्ट्रिन) जैसे अत्यंत संवेदनशील नीतिगत पदों पर भी रहे।

क्या था 'ऑपरेशन सिंदूर' और क्यों मिला सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल?

एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा के सैन्य जीवन का सबसे निर्णायक और ऐतिहासिक अध्याय 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान लिखा गया। जनवरी 2025 में उन्होंने भारतीय वायुसेना की सबसे महत्वपूर्ण और सामरिक रूप से संवेदनशील मानी जाने वाली पश्चिमी वायु कमान (Western Air Command) के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ (AOC-in-C) का पदभार संभाला था। यह वही कमान है जिस पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली-एनसीआर, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान की सीमाओं की सुरक्षा का सीधा दारोमदार होता है।

मई 2025 के दौरान जब पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा की दृष्टि से गंभीर गतिरोध उत्पन्न हुआ था, तब भारत सरकार और वायुसेना मुख्यालय ने दुश्मन के किसी भी दुस्साहस का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए गोपनीय रूप से 'ऑपरेशन सिंदूर' की रूपरेखा तैयार की थी। इस पूरे ऑपरेशन के फील्ड कमांडर और रणनीतिक मुखिया एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा ही थे। उनके कुशल नेतृत्व में पश्चिमी कमान के लड़ाकू विमानों, अत्याधुनिक एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम्स और रडार सर्विलांस ने सीमा पार की किसी भी आक्रामक चाल को पूरी तरह निष्फल कर दिया था।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उन्होंने जिस सटीकता, गोपनीयता और न्यूनतम समय में विशाल सैन्य संसाधनों की तैनाती की, उसने विरोधी खेमे की रणनीतिक घेराबंदी को ध्वस्त कर दिया। इस अभियान में प्रदर्शित अद्वितीय पराक्रम, रणनीतिक दूरदर्शिता और असाधारण युद्धक नेतृत्व के लिए देश की राष्ट्रपति और सशस्त्र बलों की सर्वोच्च कमांडर द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें देश के सर्वोच्च युद्धकालीन सैन्य सम्मानों में शुमार 'सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल' (SYSM) से अलंकृत किया। इसी वर्ष 30 अप्रैल 2026 को वे वायुसेना की सक्रिय सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे।

5,585 आवेदनों में चयन: सर्च कमेटी की कसौटी पर कैसे खरे उतरे एयर मार्शल?

राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा पहले सीईओ पद के लिए विज्ञापन जारी किए जाने के बाद देश-विदेश से 5,585 आवेदन प्राप्त हुए थे। इनमें सेवानिवृत्त मुख्य सचिव, पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP), अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट कंपनियों के सीईओ और प्रतिष्ठित संस्थानों के निदेशक शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट व उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस (रिटायर्ड) प्रमोद कोहली, सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल विष्णु कांत चतुर्वेदी और परमाणु वैज्ञानिक डॉ. सुरेश हावरे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय सर्च कमेटी ने चयन के लिए कड़े पैमाने निर्धारित किए थे।

समिति ने आवेदनों की जांच के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) टूल्स और 600 अंकों की जटिल मूल्यांकन प्रणाली का उपयोग किया। इस प्रक्रिया में उम्मीदवार के प्रशासनिक ट्रैक रिकॉर्ड, संकट के समय त्वरित निर्णय लेने की क्षमता, भारी भीड़ और लॉजिस्टिक्स संभालने का अनुभव, वित्तीय सत्यनिष्ठा और सनातन मूल्यों के प्रति निष्ठा को मुख्य पैमाना बनाया गया था। 16 शीर्ष उम्मीदवारों के अयोध्या में व्यक्तिगत साक्षात्कार के बाद सर्च कमेटी ने तीन नामों का सीलबंद पैनल ट्रस्ट अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास को सौंपा था। ट्रस्ट की कोर कमेटी ने यह निष्कर्ष निकाला कि सिविल ब्यूरोक्रेसी के बजाय एक शीर्ष सैन्य कमांडर, जिसके पास करगिल और ऑपरेशन सिंदूर जैसे संवेदनशील मिशनों को सफलतापूर्वक संचालित करने का वास्तविक अनुभव हो, मंदिर के प्रशासनिक पुनर्गठन के लिए सबसे मुफीद साबित होगा।

रामलला के दरबार में अब मिलिट्री अनुशासन: क्या होंगी नए CEO की बड़ी जिम्मेदारियां?

राम मंदिर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्यभार संभालने के बाद एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा के सामने कई जटिल और ऐतिहासिक चुनौतियां होंगी। ट्रस्ट डीड में किए गए नए संशोधनों के तहत अब मंदिर का दैनिक प्रशासन, सुरक्षा और वित्तीय प्रबंधन पूरी तरह से सीईओ के अधिकार क्षेत्र में आ चुका है।

नए सीईओ के समक्ष निम्नलिखित प्रमुख प्राथमिकताएं रहेंगी:

दान और चढ़ावे का डिजिटल ऑडिट: हाल के महीनों में मंदिर की दानपेटियों से चढ़ावे की चोरी और अनियमितताओं के जो आरोप लगे थे, उन पर पूरी तरह विराम लगाना उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी। मंदिर के सभी ऑनलाइन व ऑफलाइन दान काउंटरों पर रियल-टाइम डिजिटल ट्रैकिंग और बारकोडेड रसीद प्रणाली लागू कर वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना उनका पहला कदम होगा।

क्राउड मैनेजमेंट और दर्शन प्रणाली: प्रतिदिन राम मंदिर में औसतन एक से दो लाख श्रद्धालु पहुंचते हैं, जबकि रामनवमी, दीपावली और प्राण प्रतिष्ठा की वर्षगांठ जैसे अवसरों पर यह संख्या चार से पांच लाख तक चली जाती है। एयर मार्शल मिश्रा कतार प्रबंधन, बुजुर्गों व दिव्यांगों के लिए गोल्फ कार्ट्स, शेड्स और पेयजल की ऐसी स्वचालित व्यवस्था विकसित करेंगे जिससे किसी भी श्रद्धालु को असुविधा या भगदड़ जैसी स्थिति का सामना न करना पड़े।

त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरे का समन्वय: राम जन्मभूमि परिसर की सुरक्षा में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF), उत्तर प्रदेश विशेष सुरक्षा बल (UPSSF) और सिविल पुलिस के जवान तैनात हैं। एक शीर्ष सैन्य रणनीतिकार होने के नाते वे इन सभी सुरक्षा बलों के बीच एक अभेद्य सुरक्षा ग्रिड और क्विक रिस्पॉन्स टीम (QRT) का नेटवर्क स्थापित करेंगे।

द्वितीय चरण के निर्माण कार्यों की निगरानी: 70 एकड़ के संपूर्ण परिसर में मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र के साथ समन्वय स्थापित कर परकोटा, शेषावतार मंदिर, महर्षि वाल्मीकि, वशिष्ठ, विश्वामित्र व निषादराज के सप्त मंदिरों और अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय के निर्माण कार्यों को तय समय-सीमा के भीतर पूर्ण कराना भी उनके प्रमुख दायित्वों में शामिल होगा।

अयोध्या के संतों, धर्माचार्यों और देश-विदेश के रामभक्तों ने एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा के इस नए दायित्व का खुले दिल से स्वागत किया है। उनका मानना है कि जिस अधिकारी ने अपने पूरे जीवन में देश की सरहदों को सुरक्षित रखा और 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे जटिल अभियानों को विजय तक पहुंचाया, उनके हाथों में रामलला के धाम की बागडोर आने से अयोध्या का प्रबंधन विश्व पटल पर एक अनुकरणीय उदाहरण बनकर उभरेगा।