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September 02 2026 09:51 pm

42 हजार से ज्यादा मीटर कभी नेटवर्क में आए ही नहीं, 87 हजार से संपर्क टूटा; कानपुर-बुंदेलखंड से पूर्वांचल तक बिलिंग ठप

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उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था को हाईटेक, पारदर्शी और मानवीय दखल से मुक्त करने के नाम पर शुरू की गई महत्वाकांक्षी स्मार्ट मीटर परियोजना इस समय प्रदेश के लाखों उपभोक्ताओं और बिजली निगम के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुकी है। राज्य के विभिन्न बिजली वितरण निगमों (डिस्कॉम) द्वारा भारी-भरकम प्रचार-प्रसार के बीच लगाए गए लाखों स्मार्ट मीटर अब खुद तकनीकी रूप से 'लाचार' साबित हो रहे हैं। आधिकारिक तंत्र से सामने आए ताजा और चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश भर में लगे स्मार्ट मीटरों में से हजारों ऐसे मीटर हैं जो लगने के दिन से लेकर आज तक कभी बिजली कंपनियों के सेंट्रल सर्वर या नेटवर्क से जुड़ ही नहीं पाए हैं। इसके अलावा करीब एक लाख के करीब मीटर ऐसे हैं जिनका नेटवर्क से संपर्क पूरी तरह टूट चुका है और वे पूरी तरह 'ऑफलाइन' हो चुके हैं।

राजधानी लखनऊ से लेकर औद्योगिक नगरी कानपुर, उन्नाव, प्रयागराज, वाराणसी, गोरखपुर, बस्ती, बांदा और झांसी तक इस तकनीकी विफलता के चलते बिजली उपभोक्ता भीषण असमंजस और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। सरकार ने जिस व्यवस्था को बिजली चोरी रोकने, लाइन लॉस घटाने और उपभोक्ताओं को घर बैठे सटीक ऑनलाइन बिलिंग व रियल-टाइम खपत देखने की सुविधा देने के उद्देश्य से लागू किया था, वह अब जमीनी स्तर पर अव्यवस्था का शिकार हो गई है। सर्वर से संपर्क न होने के कारण उपभोक्ताओं को न तो स्मार्ट मीटर से मिलने वाली आधुनिक डिजिटल सेवाएं मिल पा रही हैं और न ही उनके बिजली बिल नियमित रूप से जनरेट हो पा रहे हैं। इस गंभीर तकनीकी विफलता ने ऊर्जा विभाग के दावों और निजी कार्यदायी कंपनियों की गुणवत्ता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

27 हजार करोड़ खर्च फिर भी 'डंब' बने स्मार्ट मीटर: 42 हजार से अधिक कभी ऑनलाइन हुए ही नहीं

उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) और राज्य के चारों प्रमुख डिस्कॉम—मध्यांचल, पश्चिमांचल, दक्षिणांचल और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम—के तहत 21 अगस्त तक पूरे प्रदेश में लगभग 96.88 लाख स्मार्ट बिजली मीटर स्थापित किए जा चुके हैं। केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग से शुरू की गई इस विशाल परियोजना पर करीब 27 हजार करोड़ रुपये की भारी-भरकम धनराशि खर्च की जा रही है। इस योजना का मूल सिद्धांत यह था कि मीटर में लगी आधुनिक सिम और मॉडम तकनीक के जरिए उपभोक्ता की बिजली खपत का डेटा सीधे विभाग के सेंट्रल सर्वर तक पहुंचेगा, जिससे मीटर रीडर के घर जाने की अनिवार्यता खत्म हो जाएगी और बिलिंग 100 प्रतिशत पारदर्शी हो जाएगी।

हालांकि, धरातल पर जो वास्तविकता सामने आई है वह बेहद परेशान करने वाली है। आधिकारिक विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में कुल लगाए गए मीटरों में से 42,947 स्मार्ट मीटर ऐसे चिन्हित किए गए हैं जो लगने की तारीख से लेकर आज तक 'कभी भी नेटवर्क के संपर्क में आए ही नहीं' (Never Connected) की श्रेणी में दर्ज हैं। वहीं दूसरी तरफ, 87,833 स्मार्ट मीटर ऐसे हैं जो एक बार नेटवर्क में आने के बाद लंबे समय से 'संपर्क से बाहर' (Out of Network/Offline) चल रहे हैं।

तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि जब कोई स्मार्ट मीटर नेटवर्क से जुड़ता ही नहीं है, तो वह किसी सामान्य या पुराने इलेक्ट्रो-मैकेनिकल मीटर से भी बदतर स्थिति में पहुंच जाता है। निजी कंपनियों द्वारा घटिया गुणवत्ता के मॉडम, कमजोर सिग्नल वाले टेलीकॉम ऑपरेटरों के सिम कार्ड का चयन और मीटर लगाने से पहले अनिवार्य नेटवर्क सर्वे न किए जाने के कारण यह गंभीर तकनीकी संकट पैदा हुआ है।

कानपुर, झांसी, बांदा से लेकर गोरखपुर तक बुरा हाल: क्षेत्रीय आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

स्मार्ट मीटरों के नेटवर्क से बाहर होने का संकट पूरे उत्तर प्रदेश में फैला है, लेकिन कुछ अंचलों में स्थिति बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है। विभागीय आंकड़ों के क्षेत्रीय विश्लेषण से पता चलता है कि केस्को (कानपुर इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कंपनी) और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के कार्यक्षेत्र वाले जिले इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। अकेले कानपुर शहर में नेटवर्क के संपर्क से बाहर हो चुके स्मार्ट मीटरों का अनुपात 3.97 प्रतिशत दर्ज किया गया है। कानपुर के घनी आबादी वाले मोहल्लों और संकरी गलियों में सिग्नल न मिलने के कारण मीटर सर्वर को डेटा भेजने में पूरी तरह नाकाम हो रहे हैं।

इससे भी अधिक गंभीर स्थिति कानपुर-झांसी-बांदा विद्युत क्षेत्र में देखने को मिली है। इस विस्तृत बुंदेलखंड और मध्य यूपी कॉरिडोर में कुल स्थापित स्मार्ट मीटरों में से 3.69 प्रतिशत मीटर पूरी तरह नेटवर्क से बाहर पाए गए हैं। इतना ही नहीं, इसी क्षेत्र में 3.46 प्रतिशत स्मार्ट मीटर ऐसे हैं जो अपनी स्थापना के बाद से आज तक कभी भी बिजली निगम के सिस्टम से कनेक्ट ही नहीं हो सके।

पूर्वांचल के गोरखपुर और बस्ती मंडल में भी हालात संतोषजनक नहीं हैं। मुख्यमंत्री के गृहक्षेत्र से जुड़े गोरखपुर-बस्ती जोन में 2.73 प्रतिशत स्मार्ट मीटर नेटवर्क के दायरे से पूरी तरह बाहर चल रहे हैं, जबकि 1.21 प्रतिशत मीटर 'नेवर कनेक्टेड' की सूची में पड़े हैं। लखनऊ, उन्नाव, बाराबंकी और सीतापुर जैसे जिलों में भी ग्रामीण और अर्ध-शहरी फीडरों पर लगे हजारों मीटरों में संचार लिंक ठप पड़ा हुआ है, जिससे स्थानीय उपकेंद्रों के अभियंताओं के पास शिकायतों का अंबार लग गया है।

स्मार्ट सुविधाओं से महरूम लाखों उपभोक्ता: न बिल अपडेट हो रहा, न मिल रही ऑनलाइन सेवाएं

नेटवर्क न होने का सीधा और सबसे बड़ा खामियाजा उन आम उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ रहा है, जिनके परिसरों पर ये तथाकथित स्मार्ट मीटर जबरन या सहमति से थोप दिए गए हैं। स्मार्ट मीटर लगाने के पीछे उपभोक्ताओं को यह भरोसा दिया गया था कि वे UPPCL Smart App के माध्यम से रोजाना की बिजली खपत देख सकेंगे, मोबाइल की तरह आसानी से रिचार्ज या भुगतान कर सकेंगे और गलत बिलिंग के झंझट से हमेशा के लिए मुक्त हो जाएंगे।

लेकिन वास्तविकता इसके ठीक उलट हो चुकी है:

ऑनलाइन बिलिंग सिस्टम ठप: जब मीटर नेटवर्क में ही नहीं आता, तो सर्वर तक मीटर की वास्तविक रीडिंग पहुंच ही नहीं पाती। इसके परिणामस्वरूप सॉफ्टवेयर पिछले महीनों की खपत के आधार पर 'काल्पनिक' या 'औसत' (Estimated/Provisional) बिल बनाकर भेज देता है, जिससे कई बार अचानक हजारों रुपये का अप्रत्याशित बिल आ जाता है।

रीचार्ज और बिजली बहाली में भारी फजीहत: जिन उपभोक्ताओं के मीटर नेटवर्क विहीन हैं, यदि उनका बैलेंस किसी कारणवश शून्य हो जाता है या बिल बकाया दिखता है, तो वे ऑनलाइन भुगतान तो कर देते हैं लेकिन मीटर में सिग्नल न होने के कारण 'रिमोट री-कनेक्शन कमांड' मीटर तक पहुंच ही नहीं पाती। इसके चलते बिल भरने के बावजूद उपभोक्ता उमस और गर्मी में 24 से 48 घंटे तक बिना बिजली के अंधेरे में बैठने को विवश हो रहे हैं।

पुनः मीटर रीडरों पर निर्भरता: जिस व्यवस्था को पेपरलेस और ऑटोमैटिक बनाने के लिए 27 हजार करोड़ रुपये झोंके गए, वहां अब मीटरों की रीडिंग लेने के लिए फिर से संविदा मीटर रीडरों को घर-घर भेजना पड़ रहा है, जो कई बार मैन्युअल रीडिंग दर्ज करने में मनमानी और धांधली कर रहे हैं।

उपभोक्ता निवारण तंत्र लाचार: टोल-फ्री हेल्पलाइन 1912 पर जब उपभोक्ता नेटवर्क और बिल न दिखने की शिकायत दर्ज कराते हैं, तो सिस्टम से कोई समाधान नहीं निकलता और निचले स्तर के लाइनमैन या जेई यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि 'यह मीटर कंपनी का काम है, हम कुछ नहीं कर सकते'।

उपभोक्ता परिषद ने उठाए टेंडर और कंपनियों की गुणवत्ता पर सवाल: अवधेश वर्मा की उच्चस्तरीय जांच की मांग

इस गंभीर तकनीकी विफलता और उपभोक्ताओं के उत्पीड़न पर उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने अत्यंत कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। राज्य सलाहकार समिति के सदस्य और उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने इन आधिकारिक आंकड़ों के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार और नियामक आयोग से इस समूची 27 हजार करोड़ रुपये की स्मार्ट मीटर परियोजना पर तत्काल पुनर्विचार करने और एक उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच बैठाने की पुरजोर मांग की है।

अवधेश कुमार वर्मा ने सीधा और सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र सरकार द्वारा प्रति मीटर स्वीकृत की गई अनुमानित लागत की तुलना में उत्तर प्रदेश में निजी कार्यदायी कंपनियों को काफी ऊंचे और अत्यधिक दरों पर टेंडर बांटे गए थे। उन्होंने सवाल उठाया कि जब जनता और सरकार के खजाने से भारी-भरकम भुगतान किया जा रहा है, तो फिर इतनी घटिया गुणवत्ता के उपकरण और लचर नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर क्यों स्वीकार किया गया? वर्मा ने पूछा कि जब 42 हजार से ज्यादा मीटर कभी नेटवर्क में आए ही नहीं और 87 हजार मीटर संपर्क से बाहर हो गए, तो इन मीटरों की आपूर्ति और स्थापना करने वाली निजी कंपनियों के खिलाफ अब तक ब्लैकलिस्टिंग या भारी जुर्माना लगाने जैसी दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

उपभोक्ता परिषद ने मांग की है कि जब तक पूर्व में लगाए गए सभी 96 लाख से अधिक मीटरों का थर्ड पार्टी तकनीकी ऑडिट नहीं हो जाता और नेटवर्क संबंधी सभी खामियों को दुरुस्त नहीं कर लिया जाता, तब तक नए स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए। परिषद ने चेतावनी दी है कि यदि निजी कंपनियों की लापरवाही का आर्थिक बोझ आम उपभोक्ताओं की बिजली दरों पर डालने की कोशिश की गई, तो इसके खिलाफ विद्युत नियामक आयोग और न्यायिक मंचों पर कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी।

ऊर्जा विभाग और डिस्कॉम के सामने साख का संकट: क्या होगा समाधान?

स्मार्ट मीटरों के नेटवर्क फेलियर ने उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) के शीर्ष प्रबंधन को भी रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार इस समस्या का मूल कारण यह है कि कई क्षेत्रों में 2G/4G सेल्यूलर नेटवर्क बहुत कमजोर है, जबकि कई मीटर बेसमेंट, लोहे के बक्सों या संकरी गलियों में अंदरूनी दीवारों पर लगाए गए हैं जहां आरएफ (रेडियो फ्रीक्वेंसी) या सेलुलर तरंगे प्रवेश नहीं कर पातीं।

इस गतिरोध को दूर करने के लिए विभागीय स्तर पर अब निम्नलिखित तकनीकी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है:

नेटवर्क बूस्टर और एक्सटर्नल एंटीना: जिन मीटरों में सिग्नल की समस्या है, वहां कंपनियों को अनिवार्य रूप से बाहरी एंटीना या सिग्नल बूस्टर लगाने के निर्देश दिए जाएं।

ड्यूल-सिम या टेलीकॉम ऑपरेटर बदलना: जो मीटर 'नेवर कनेक्टेड' की श्रेणी में हैं, उनकी आंतरिक चिप की जांच कर उन सिम कार्डों को बदला जाए जिनका उस इलाके में मजबूत 4G/5G सिग्नल उपलब्ध हो।

दोषपूर्ण मीटरों को निःशुल्क बदलना: यदि किसी मीटर का मॉडम या मदरबोर्ड पूरी तरह निष्क्रिय पाया जाता है, तो कार्यदायी एजेंसी अपने खर्च पर उसे तुरंत बदले।

निजी कंपनियों पर पेनल्टी: डिस्कॉम स्तर पर ऐसा वित्तीय तंत्र बनाया जाए जिसके तहत जितने दिन मीटर ऑफलाइन रहेगा, उतने दिन का सर्विस शुल्क संबंधित ठेकेदार कंपनी के बिल से काटा जाए।

उत्तर प्रदेश में ऊर्जा क्षेत्र का आधुनिकीकरण तभी सार्थक हो सकता है जब तकनीक जनता के लिए सुविधा बने, न कि उत्पीड़न का सबब। जब तक 42 हजार से अधिक नेटवर्क-विहीन और 87 हजार से ज्यादा ऑफलाइन पड़े स्मार्ट मीटरों को दुरुस्त कर पूरी तरह क्रियाशील नहीं किया जाता, तब तक 27 हजार करोड़ रुपये की इस महा-परियोजना की सफलता पर सवालिया निशान यूं ही गहराते रहेंगे। लखनऊ के शक्ति भवन से लेकर जिलों के विद्युत उपकेंद्रों तक अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शासन इस डिजिटल नाकामी से उपभोक्ताओं को कब तक राहत दिला पाता है।