नवरात्रि कलश स्थापना में भूलकर भी न करें ये गलतियां: जानें संपूर्ण पूजन सामग्री, सही विधि और जरूरी नियम
सनातन धर्म में शक्ति उपासना का महापर्व शारदीय नवरात्रि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस दिव्य अनुष्ठान में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि पूजन का सबसे आधारभूत और पवित्र स्तंभ 'कलश स्थापना' (घटस्थापना) होता है। वैदिक परंपरा में कलश को केवल पानी का पात्र नहीं, बल्कि समस्त तीर्थों, भगवान श्रीगणेश, त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और 33 कोटि देवी-देवताओं का साक्षात स्वरूप माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि सही विधि और शुद्ध भाव से स्थापित किया गया कलश घर में सकारात्मक ऊर्जा, आरोग्य, धन और समृद्धि का वास कराता है। हालांकि, कई बार श्रद्धालु अज्ञानतावश या जल्दबाजी में कुछ ऐसी बुनियादी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे पूजा का पूरा फल नहीं मिल पाता और वास्तु दोष भी उत्पन्न हो सकता है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना करने से पहले इन नियमों, सामग्री और विधि को जानना बेहद जरूरी है।
कलश स्थापना के दौरान भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां
घटस्थापना करते समय शास्त्रों में वर्जित इन सामान्य गलतियों से पूरी तरह बचना चाहिए:
गलत धातु के कलश का चुनाव: कलश स्थापना के लिए कभी भी स्टील, लोहा, एल्युमिनियम या प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग नहीं करना चाहिए। पूजा में मिट्टी, तांबा, पीतल या कांसे का पात्र ही शुद्ध माना गया है। मिट्टी का कलश सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि यह पंचतत्वों का प्रतीक है।
नारियल की दिशा में चूक: कलश के ऊपर रखे जाने वाले जटाधारी नारियल (श्रीफल) का मुख किस तरफ होना चाहिए, इसे लेकर अक्सर लोग भ्रमित रहते हैं। नारियल का मुख हमेशा पूजा करने वाले साधक की तरफ होना चाहिए। नारियल का मुख वह हिस्सा होता है जहां तीन आंखें जैसी आकृतियां बनी होती हैं। नारियल को कभी ऊपर की ओर खड़ा या नीचे की ओर झुकाकर नहीं रखना चाहिए।
अशुभ दिशा में चौकी लगाना: कलश की स्थापना कभी भी दक्षिण दिशा में नहीं करनी चाहिए। दक्षिण को यम की दिशा माना गया है। कलश और माता की चौकी हमेशा पूर्व, उत्तर या ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में ही स्थापित होनी चाहिए।
बिना ढक्कन या खाली कलश रखना: कलश को कभी खाली या बिना ढक्कन के स्थापित नहीं किया जाता। जल से भरने के बाद उस पर अक्षत (चावल) से भरा पूर्णपात्र (मिट्टी या तांबे की कटोरी) रखना अनिवार्य होता है।
अखंड ज्योति और कलश का स्थान बदलना: एक बार जिस स्थान पर संकल्प लेकर कलश और अखंड ज्योति स्थापित कर दी जाए, उसे नौ दिनों तक अपनी जगह से हिलाना या हटाना पूरी तरह वर्जित है।
कलश स्थापना के लिए संपूर्ण पूजन सामग्री लिस्ट
पूजा शुरू करने से पहले सभी आवश्यक वस्तुओं को एक जगह व्यवस्थित कर लें ताकि अनुष्ठान के बीच कोई व्यवधान न आए:
कलश और जौ का पात्र: शुद्ध मिट्टी अथवा तांबे का कलश, चौड़ा मिट्टी का सकोरा (पात्र), साफ छनी हुई बालू या मिट्टी, और बिना टूटे हुए साफ जौ (सप्तधान्य)।
कलश में डालने की सामग्री: शुद्ध जल, गंगाजल, सुपारी, सिक्का (तांबे या चांदी का), हल्दी की साबुत गांठ, दूर्वा घास और इत्र।
पल्लव और नारियल: आम के 5 या 7 पत्ते (अथवा अशोक के पत्ते), जटा वाला सूखा नारियल, लाल कपड़ा या चुनरी, और कलावा (मौली धागा)।
देवी चौकी सामग्री: लकड़ी की चौकी, नया लाल सूती या रेशमी वस्त्र, रोली, कुमकुम, अक्षत, धूपबत्ती, कपूर, गाय का शुद्ध घी, दीपक, मौसमी फल, मिठाई और ताजे फूल।
घटस्थापना की शास्त्रसम्मत और सरल स्टेप-बाय-स्टेप विधि
सुबह स्नान के बाद शुद्ध और साफ वस्त्र धारण करके एकाग्रचित्त होकर पूजा स्थल पर बैठें और इन चरणों का पालन करें:
स्थान की शुद्धि और चौकी सजावट: पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। ईशान कोण में लकड़ी की चौकी रखें और उस पर नया लाल कपड़ा बिछाएं। देवी दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
जौ बोने की प्रक्रिया: मिट्टी के चौड़े पात्र में साफ मिट्टी या बालू की आधी परत बिछाएं। उस पर जौ के दाने छिड़कें और ऊपर से हल्की मिट्टी की परत डाल दें। इसके बाद उस पर थोड़ा सा जल छिड़कें ताकि नमी बनी रहे।
कलश तैयार करना: कलश के कंठ पर तीन बार कलावा लपेटकर बांधें। कलश के बाहरी हिस्से पर रोली से शुभ स्वास्तिक का चिह्न बनाएं। कलश में शुद्ध जल और गंगाजल भरें। अब इसमें सुपारी, सिक्का, हल्दी की गांठ, दूर्वा और अक्षत डालें।
आम के पत्ते और पूर्णपात्र: कलश के मुख पर आम के 5 या 7 पत्ते इस तरह सजाएं कि उनके डंठल जल में डूबे रहें। पत्तों के ऊपर एक छोटी मिट्टी या तांबे की कटोरी रखें और उसे साबुत चावलों से भर दें।
नारियल की स्थापना: नारियल पर कलावा लपेटें और उसे लाल चुनरी में लपेटकर पूर्णपात्र के ऊपर स्थापित करें। नारियल का अग्रभाग (मुख) अपनी ओर रखें।
दीप प्रज्वलन और संकल्प: अब कलश को जौ वाले पात्र के बिल्कुल बीचों-बीच स्थापित करें। गाय के घी का दीपक जलाएं। अपने दाहिने हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर मां दुर्गा के समक्ष नौ दिनों के व्रत अथवा नित्य पूजन का संकल्प लें और 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' अथवा 'दुर्गा स्तुति' का पाठ करें।
घटस्थापना के बाद नौ दिनों के जरूरी नियम
कलश स्थापना के बाद घर में सात्विकता और पवित्रता का वातावरण बनाए रखना जरूरी है। घर में प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन का पूरी तरह त्याग करें। जौ के पात्र में प्रतिदिन सुबह पूजा के समय हल्का-सा जल छिड़कते रहें ताकि नौ दिनों में जौ हरे-भरे होकर अच्छे से उग सकें; जौ का हरा-भरा उगना घर में आने वाले साल के लिए अत्यंत शुभ और समृद्धि का सूचक माना जाता है। घर को कभी भी नौ दिनों तक पूरी तरह ताला लगाकर सूना न छोड़ें। शांत मन, संयमित आचरण और अटूट श्रद्धा से की गई घटस्थापना मां जगदंबा की असीम कृपा और आशीर्वाद दिलाती है।