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October 10 2026 09:53 pm

शारदीय नवरात्रि कलश स्थापना: चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग के साए में कब करें घटस्थापना?

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शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व जगतजननी मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना का सबसे बड़ा अनुष्ठान माना जाता है, जिसमें पहले दिन की जाने वाली घटस्थापना पूरे नौ दिनों की पूजा की आधारशिला बनती है। शास्त्रों के अनुसार सही मुहूर्त में कलश की स्थापना करने से घर में सुख, समृद्धि, सकारात्मक ऊर्जा और शांति का वास होता है, वहीं वर्जित योग या अशुद्ध काल में घट स्थापित करने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। अक्सर आश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का संयोग बन जाता है, जिसे ज्योतिष और धर्मशास्त्रों में घटस्थापना के लिए विशेष विचारणीय माना गया है। ऐसे में श्रद्धालुओं के मन में संशय रहता है कि इस संवेदनशील नक्षत्र और योग के बीच माता रानी का आह्वान किस समय करना सर्वोत्तम फलदायी रहेगा।

चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में घटस्थापना का शास्त्रीय नियम

वैदिक ज्योतिष और धर्मसिंधु के ग्रंथों में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि घटस्थापना प्रतिपदा तिथि के सूर्योदय कालीन समय में की जानी चाहिए, लेकिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का प्रथम चरण या इनका अधिकांश प्रभाव कलश स्थापना के लिए त्याज्य माना गया है। शास्त्र कहते हैं कि यदि प्रतिपदा तिथि को चित्रा नक्षत्र या वैधृति योग विद्यमान हो, तो इनके शुरुआती हिस्से या प्रभाव को टालकर कलश स्थापित करना शुभ होता है। हालांकि जब पूरे दिन चित्रा नक्षत्र अथवा वैधृति योग व्याप्त रहे और प्रतिपदा तिथि समाप्त हो रही हो, तब निर्णयसिंधु का नियम कहता है कि अभिजीत मुहूर्त को सबसे अचूक और कल्याणकारी समय मानकर घटस्थापना कर लेनी चाहिए। अभिजीत मुहूर्त दिन का वह आठवां मुहूर्त होता है जो सभी प्रकार के दोषों का शमन करने की अद्भुत क्षमता रखता है।

घटस्थापना का शुभ मुहूर्त और अभिजीत काल की महत्ता

पंचांग गणना के अनुसार जब प्रतिपदा तिथि पर सुबह के समय चित्रा नक्षत्र का प्रभाव अधिक हो, तो भक्तों को प्रातःकाल के विशेष शुभ चौघड़िया या फिर दोपहर के अभिजीत मुहूर्त का चयन करना चाहिए। सामान्यतः प्रातः 06:15 से 08:30 बजे के बीच यदि चित्रा का प्रारंभिक संवेदनशील चरण समाप्त हो रहा हो, तो वह समय द्विपद लग्न या स्थिर लग्न वृषभ में घटस्थापना के लिए अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। यदि कोई भक्त प्रातःकाल इस मुहूर्त में स्थापना न कर पाए, तो दोपहर में लगभग 11:45 बजे से 12:35 बजे के बीच आने वाला अभिजीत मुहूर्त सर्वोत्तम विकल्प बनकर उभरता है। स्थिर लग्न में स्थापित कलश घर में लक्ष्मी और देवी कृपा को स्थायी बनाता है, जिससे परिवार पर आने वाली बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

कलश स्थापना की प्रामाणिक सामग्री और पूर्व तैयारी

घटस्थापना से पूर्व पूजा स्थल की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। पूजन के लिए मिट्टी का चौड़ा पात्र, साफ छनी हुई पवित्र मिट्टी, सप्तधान्य अथवा शुद्ध जौ, गंगाजल, तांबे या मिट्टी का कलश, आम या अशोक के पत्ते, मौली (कलावा), रोली, अक्षत, सुपारी, सिक्का, लाल चुनरी, नारियल (श्रीफल) और दूर्वा की आवश्यकता होती है। शास्त्रों में उल्लेख है कि कलश को ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है, जिसमें त्रिदेवों समेत समस्त तीर्थों और देवी-देवताओं का वास होता है। इसलिए स्थापना से पहले पूजा की चौकी पर लाल या पीला स्वच्छ वस्त्र बिछाकर गंगाजल छिड़कें और मन को पूरी तरह शांत व भक्तिमय रखें।

जौ बोने से लेकर कलश स्थापित करने की संपूर्ण विधि

घटस्थापना की प्रक्रिया की शुरुआत मिट्टी के पात्र में जौ बोने से होती है। सर्वप्रथम मिट्टी के पात्र में थोड़ी पवित्र मिट्टी फैलाएं, उस पर जौ के दाने समान रूप से डालें और फिर ऊपर से हल्की मिट्टी की परत बिछाकर जल का हल्का छिड़काव करें। इसके पश्चात तांबे या मिट्टी के कलश के कंठ पर कलावा बांधें और उसमें शुद्ध जल भरकर थोड़ा गंगाजल मिलाएं। कलश के जल में एक सुपारी, हल्दी की गांठ, दूर्वा, अक्षत और एक चांदी या तांबे का सिक्का डालें। कलश के मुख पर आम या अशोक के पांच या सात पत्ते इस प्रकार सजाएं कि उनका आधा भाग कलश के भीतर और आधा बाहर रहे। अब एक पानी वाले नारियल पर लाल चुनरी लपेटकर उसे रक्षासूत्र से बांधें और कलश के ऊपर पत्तों के बीच स्थापित करें, ध्यान रहे कि नारियल का मुख सदैव साधक की ओर होना चाहिए।

भौगोलिक प्रभाव और स्थानीय शहरों में मुहूर्त का तालमेल

भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में सूर्योदय के समय में भिन्नता होने के कारण घटस्थापना के सटीक समय में कुछ मिनटों का अंतर देखने को मिलता है। पूर्वी राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, असम और बिहार में सूर्योदय जल्दी होने से प्रातःकालीन मुहूर्त पश्चिमी राज्यों जैसे गुजरात या राजस्थान की तुलना में लगभग 20 से 30 मिनट पहले प्रारंभ हो जाता है। लखनऊ, कानपुर, दिल्ली, वाराणसी और जयपुर जैसे उत्तर भारतीय शहरों में स्थानीय पंचांग के सूर्योदय समय को आधार बनाकर ही लग्न की गणना की जाती है। यदि आप अपने स्थानीय शहर में घटस्थापना कर रहे हैं, तो स्थानीय सूर्योदय के बाद स्थिर लग्न (जैसे कन्या या वृषभ लग्न) और दोपहर के अभिजीत मुहूर्त की स्थानीय समयावधि का विशेष ध्यान रखें, ताकि चित्रा नक्षत्र के दुष्प्रभाव से मुक्त होकर पूरी श्रद्धा से पूजा संपन्न हो सके।

नवरात्रि प्रतिपदा पर मां शैलपुत्री की उपासना और ध्यान मंत्र

कलश स्थापना पूर्ण होने के पश्चात उसी पवित्र वेदी के सम्मुख मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की विधिवत पूजा अर्चना की जाती है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री मां शैलपुत्री वृषभ पर सवार होकर अपने दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प धारण करती हैं। मां को सफेद वस्त्र, सफेद पुष्प, गाय के शुद्ध घी का भोग और बताशे अति प्रिय हैं। कलश के समक्ष बैठकर "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" अथवा मां शैलपुत्री के ध्यान मंत्र "वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥" का श्रद्धापूर्वक जप करें। यह पूजन साधक के मूलाधार चक्र को जाग्रत कर आंतरिक शक्ति, आत्मविश्वास और आरोग्यता प्रदान करता है।

घटस्थापना के दौरान रखी जाने वाली सावधानियां और नियम

कलश स्थापना के नौ दिनों तक अखंड ज्योति प्रज्वलित करने वाले साधकों को घर को कभी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। घटस्थापना के समय ध्यान रखें कि कलश कभी भी दक्षिण दिशा की ओर मुख करके न रखा जाए, इसे सदैव ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या पूर्व दिशा में ही स्थापित करना शास्त्रसम्मत है। नारियल का मुख ऊपर या नीचे की ओर न होकर साधक की ओर होना अत्यंत शुभ फल देने वाला माना गया है। इन नौ दिनों में सात्विक जीवन शैली, ब्रह्मचर्य का पालन, क्रोध और असत्य भाषण से दूरी बनाए रखना आवश्यक है। यदि चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग के दिन पूरी निष्ठा और शुद्ध नियमों के साथ कलश की स्थापना की जाए, तो माता भगवती की कृपा से समस्त कष्टों का निवारण होता है और घर में रिद्धि-सिद्धि का स्थायी वास होता है।