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October 11 2026 12:05 am

RBI की नई व्यवस्था से क्या डॉलर की मांग पर लगेगी लगाम? स्पेशल ऑयल विंडो और डेरिवेटिव्स पर सख्ती से रुपये को मिलेगा सहारा

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अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये पर लगातार बढ़ते दबाव और विनिमय दर के ₹96.70 के पार पहुंचने के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा (Forex) बाजार को स्थिर करने के लिए बहुस्तरीय आक्रामक कदम उठाए हैं। पश्चिम एशिया संकट और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों के ऊंचे स्तर पर बने रहने के कारण घरेलू बाजार में डॉलर की भारी मांग पैदा हो गई थी। इस असंतुलन को दूर करने के लिए केंद्रीय बैंक ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों (Oil PSUs) के लिए एक स्पेशल ऑयल विंडो (Special Dollar Window) शुरू करने के साथ-साथ करेंसी डेरिवेटिव्स और बैंकों की नकदी पर सख्त निगरानी की नई व्यवस्था लागू की है। यह नई व्यवस्था सीधे तौर पर हाजिर (Spot) बाजार से डॉलर की अचानक उठने वाली बड़ी मांग को अलग करने का काम करेगी।

क्या है स्पेशल ऑयल विंडो और यह कैसे काम करेगी?

भारत अपनी कुल पेट्रोलियम जरूरतों का 85% से अधिक हिस्सा आयात करता है, जिसके भुगतान के लिए इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल जैसी सरकारी तेल विपणन कंपनियों को हर महीने अरबों डॉलर की जरूरत होती है।

सीधा डॉलर आवंटन: नई व्यवस्था के तहत तेल कंपनियों को अपने नियमित तेल आयात बिलों के भुगतान के लिए खुले इंटरबैंक फॉरेक्स मार्केट में नहीं जाना पड़ेगा। वे अधिकृत डीलर बैंकों के माध्यम से केंद्रीय बैंक की विशेष व्यवस्था से सीधे डॉलर प्राप्त कर सकेंगी।

ओपन मार्केट पर दबाव खत्म: जब बड़ी तेल कंपनियां एक साथ खुले बाजार से 1 से 2 अरब डॉलर की खरीदारी करती थीं, तो डॉलर की अचानक किल्लत हो जाती थी और रुपया भरभरा कर गिर जाता था। इस मांग को खुले बाजार से बाहर करने पर सामान्य आयातकों, निर्यातकों और अन्य कॉरपोरेट्स के लिए डॉलर-रुपया विनिमय दर में स्थिरता आ जाएगी।

सट्टेबाजी पर नकेल: डेरिवेटिव्स की सीमा $100M से घटाकर $5M की

रुपये में आ रही गिरावट की एक बड़ी वजह वायदा बाजार में डॉलर की होर्डिंग और सट्टेबाजी (Speculation) थी। इसे रोकने के लिए आरबीआई ने फॉरेक्स डेरिवेटिव्स के नियमों को बेहद सख्त कर दिया है:

अंडरलाइंग एक्सपोजर की सीमा में कटौती: बिना वास्तविक व्यापारिक प्रमाण (अंडरलाइंग एक्सपोजर) के करेंसी डेरिवेटिव्स सौदे करने की सीमा को $100 मिलियन से घटाकर सीधे $5 मिलियन कर दिया गया है। यानी अब केवल वास्तविक आयातक-निर्यातक ही बड़े सौदे कर सकेंगे।

डबल-हेजिंग और रीबुकिंग पर रोक: एक ही सौदे के लिए अलग-अलग बैंकों से हेजिंग करने पर पाबंदी लगा दी गई है और अनुबंधों को बार-बार रद्द कर दोबारा बुक करने की छूट खत्म कर दी गई है।

डेली सीआरआर 99% अनिवार्य: बैंकों द्वारा करेंसी सट्टेबाजी में अतिरिक्त लिक्विडिटी का इस्तेमाल रोकने के लिए दैनिक कैश रिजर्व रेशियो (CRR) की न्यूनतम सीमा 90% से बढ़ाकर 99% कर दी गई है।

रुपये पर क्या होगा इसका अल्पकालिक और दीर्घकालिक असर?

आरबीआई के इन संयुक्त उपायों से घरेलू मुद्रा बाजार में निम्नलिखित प्रभाव देखने को मिलेंगे:

पैनिक खरीदारी और ओवर-हेजिंग पर ब्रेक: आयातकों में डॉलर महंगा होने के डर से जो फॉरवर्ड हेजिंग की होड़ मची थी, डेरिवेटिव नियमों के सख्त होने से वह थमेगी। इससे डॉलर की कृत्रिम मांग घटेगी।

₹97 के मनोवैज्ञानिक स्तर को सुरक्षा: रुपये के ₹97 प्रति डॉलर के पार फिसलने की जो आशंका बनी हुई थी, उसे तत्काल समर्थन मिलेगा और विनिमय दर ₹96.20 से ₹96.70 के दायरे में स्थिर हो सकती है।

विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) का संतुलन: केंद्रीय बैंक को खुले बाजार में बार-बार स्पॉट डॉलर बेचकर हस्तक्षेप नहीं करना पड़ेगा, जिससे देश के प्राथमिक विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा होगी।

वैश्विक जोखिम अब भी चुनौती: हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि यदि मध्य-पूर्व में तनाव के चलते कच्चा तेल $100 प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है या अमेरिकी फेडरल रिजर्व दरों में और बढ़ोतरी करता है, तो डॉलर इंडेक्स (DXY) की वैश्विक मजबूती के कारण रुपये पर दबाव पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन यह भारी गिरावट से बच जाएगा।

आरबीआई की यह नई पहल विदेशी मुद्रा बाजार में अनुशासन लाने और रुपये को बाहरी भू-राजनीतिक झटकों से बचाने के लिए एक सुविचारित 'सेफ्टी वाल्व' की तरह काम करेगी।