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September 11 2026 04:45 pm

18 साल बाद अक्षय-सैफ की वापसी, फिर भी क्यों फिसली प्रियदर्शन की ‘हैवान’? पढ़ें पूरा मूवी रिव्यू

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सिनेमाई गलियारों में जब दो दशक बाद कोई प्रतिष्ठित जोड़ी पर्दे पर लौटती है, तो दर्शकों की उम्मीदें सातवें आसमान पर पहुंच जाती हैं। निर्देशक प्रियदर्शन के निर्देशन में बनी क्राइम-थ्रिलर फिल्म 'हैवान' को लेकर भी कुछ ऐसा ही जबरदस्त माहौल देखने को मिल रहा था। करीब 18 साल के लंबे अंतराल के बाद बॉलीवुड के दो दिग्गज कलाकार—अक्षय कुमार और सैफ अली खान एक साथ बड़े पर्दे पर आमने-सामने आए हैं।

कागजी समीकरणों पर नजर डालें तो यह फिल्म किसी बड़े ब्लॉकबस्टर धमाके का मुकम्मल नुस्खा लग रही थी। प्रियदर्शन का सुलझा हुआ निर्देशन, अक्षय कुमार का खूंखार नेगेटिव रोल, सैफ अली खान का एक दृष्टिहीन (ब्लाइंड) व्यक्ति का चुनौतीपूर्ण किरदार और साथ में साउथ के दिग्गज सुपरस्टार मोहनलाल का सरप्राइज कैमियो। इन सभी तत्वों ने रिलीज से पहले दर्शकों के भीतर गजब का कौतूहल पैदा कर दिया था। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह फिल्म सिनेमाघरों में अपनी भारी-भरकम हाइप और दर्शकों की ऊंची उम्मीदों पर खरी उतर पाई है? आइए बारीकी से समझते हैं इस क्राइम थ्रिलर का पूरा सच।

कहानी का ताना-बाना: बदले की घिसी-पिटी राह पर भटकी पटकथा

फिल्म की शुरुआत एक रिटायर्ड जज की जिंदगी से होती है, जिन्होंने अपने सेवाकाल के अतीत में एक अपराधी को कठोर सजा सुनाई थी। अब वही मुजरिम अपनी सजा पूरी करने के बाद बदले की भीषण आग में जलता हुआ लौटता है और पूर्व जज से अपना हिसाब चुकता करना चाहता है। इसके बाद कहानी सीधे टकराव, इंतकाम और बिल्ली-चूहे के खेल के रास्ते पर आगे बढ़ती है।

कहानी का यह मूल विचार अपने आप में नया या अनूठा नहीं है। सिनेमाई इतिहास में बदले की भावना पर अनगिनत फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन ऐसे विषयों की जान उनकी कसी हुई पटकथा (स्क्रीनप्ले) और रोंगटे खड़े कर देने वाले सस्पेंस-ट्विस्ट्स में छिपी होती है। दुर्भाग्यवश 'हैवान' यहीं पर मात खा जाती है। फिल्म के शुरुआती चंद मिनटों में ही दर्शक आसानी से यह भांप लेते हैं कि कहानी किस मोड़ पर जाकर खत्म होगी। पूरी फिल्म में एक भी ऐसा चौंकाने वाला ट्विस्ट नहीं आता जो दर्शकों को अपनी सीट पर उछलने के लिए मजबूर कर सके या रहस्य का वह रोमांच पैदा कर सके जो एक बेहतरीन क्राइम थ्रिलर की पहचान होता है।

2 घंटे 40 मिनट का भारी-भरकम रनटाइम बना सबसे बड़ा सिरदर्द

फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसका जरूरत से ज्यादा लंबा होना साबित होती है। करीब 2 घंटे 40 मिनट (160 मिनट) का रनटाइम इस पतली और सीमित कहानी के लिए एक बहुत बड़ा बोझ बन जाता है। फिल्म में इतना मटीरियल या सब-प्लॉट्स ही मौजूद नहीं हैं कि दर्शकों को पौने तीन घंटे तक लगातार बांधकर रखा जा सके।

पर्दे पर कई बार ऐसा साफ महसूस होता है कि निर्देशक एक ही बात को घुमा-फिराकर अलग-अलग दृश्यों में बेवजह खींचने की कोशिश कर रहे हैं। यदि संपादन (एडिटिंग) की मेज पर कैंची थोड़ी सख्ती से चलाई जाती, गैरजरूरी दृश्यों को बाहर का रास्ता दिखाया जाता और स्क्रीनप्ले को तेज रफ्तार दी जाती, तो फिल्म का प्रभाव कहीं अधिक बेहतर हो सकता था। मौजूदा स्वरूप में यह सुस्त रफ्तार दर्शकों के सब्र का कड़ा इम्तिहान लेती है।

अक्षय-सैफ की अदाकारी और किरदारों में गहराई का अभाव

स्टारकास्ट के स्तर पर फिल्म बेहद भव्य नजर आती है, लेकिन किरदारों के लेखन में वह गहराई सिरे से नदारद है जिसकी एक गंभीर क्राइम थ्रिलर को दरकार होती है। अक्षय कुमार को एक डार्क और क्रूर विलेन के तौर पर देखना निश्चित रूप से एक ताजा अनुभव है। उनका लुक और आभा प्रभावशाली है, लेकिन कमजोर पटकथा उन्हें वह स्पेस और ताकतवर दृश्य नहीं देती जिससे उनका यह खलनायक का किरदार 'संघर्ष' या 'अजनबी' की तरह यादगार बन सके।

दूसरी तरफ सैफ अली खान ने एक दृष्टिहीन व्यक्ति का किरदार निभाकर अपने अभिनय के नए आयाम तलाशने की पूरी कोशिश की है। यह प्रयोग कागजों पर बेहद दिलचस्प था, लेकिन पर्दे पर उनके किरदार को इतनी उथली बनावट दी गई है कि वह दर्शकों के दिलों में कोई गहरी छाप नहीं छोड़ पाता। जब दो इतने बड़े सितारे 18 साल बाद भिड़ रहे हों, तो जिस चिंगारी, मनोवैज्ञानिक तनाव और हाई-वोल्टेज टकराव की उम्मीद की जा रही थी, वह पर्दे पर मिसिंग नजर आती है। बोमन ईरानी जैसे मजे हुए अभिनेता का उपयोग भी बेहद सीमित और सतही दायरे में सिमट कर रह गया है।

मोहनलाल का कैमियो और प्रियदर्शन की कॉमेडी का पूरी तरह गायब होना

फिल्म को लेकर बनी उत्सुकता का एक बड़ा कारण दक्षिण भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार मोहनलाल की मौजूदगी भी थी। लेकिन स्क्रीन पर उनका कैमियो देखकर घोर निराशा हाथ लगती है। इतने बड़े कद के अभिनेता को महज कुछ सेकंड की फुटेज में समेट दिया गया है। उनका यह दृश्य न तो कहानी को कोई नई दिशा देता है, न किसी सस्पेंस को मजबूती प्रदान करता है और न ही आगे के घटनाक्रम पर कोई सार्थक प्रभाव छोड़ता है। यह केवल एक पब्लिसिटी स्टंट जैसा बनकर रह जाता है।

इसके अलावा, प्रियदर्शन के नाम के साथ दर्शकों का एक स्वाभाविक जुड़ाव उनकी सिग्नेचर सिचुएशनल कॉमेडी से रहता है। लेकिन 'हैवान' में उनकी वह क्लासिक कॉमिक टाइमिंग पूरी तरह नदारद है। पूरे ढाई घंटे से ज्यादा के समय में बमुश्किल एक-दो मौके ऐसे आते हैं जहां चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ सके। वहीं दूसरी ओर, एक शुद्ध रिवेंज-थ्रिलर के तराजू पर तौलने पर भी फिल्म बेहद सपाट और बेअसर साबित होती है।

कैसा है फिल्म का म्यूजिक और कौन सा सीन छोड़ता है असर?

फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर (BGM) भी औसत दर्जे का ही है। कोई भी गाना ऐसा नहीं बन पाया है जो सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद जुबान पर चढ़ सके। थ्रिलर जॉनर की फिल्मों में बैकग्राउंड म्यूजिक दृश्यों के तनाव को दोगुना करने का काम करता है, लेकिन यहां वह आवश्यक सिहरन पैदा करने में नाकाम रहता है।

पूरी फिल्म में अगर कोई एक हिस्सा दर्शकों का ध्यान पूरी तरह खींचने में कामयाब रहता है, तो वह अंडरग्राउंड पार्किंग लॉट में फिल्माया गया अक्षय कुमार और सैफ अली खान के बीच का आमना-सामना है। इस एक सीन में दोनों कलाकारों की शारीरिक भाषा, आंखों की तल्खी और संवाद अदायगी पर्दे पर वह ऊर्जा पैदा करती है, जिसकी तलाश दर्शक पूरी फिल्म में करते रह जाते हैं। काश, पूरी फिल्म में इसी तरह का सघन तनाव और टकराव देखने को मिलता।

अंतिम फैसला: सिर्फ बड़े नामों का जमावड़ा, कंटेंट में खोखली

फिल्म 'हैवान' इस बात का एक सटीक उदाहरण है कि केवल बड़े सुपरस्टार्स को एक फ्रेम में खड़ा कर देने से कोई फिल्म क्लासिक नहीं बन जाती। अक्षय कुमार, सैफ अली खान, मोहनलाल और प्रियदर्शन जैसे दिग्गज नामों के बावजूद, यह फिल्म अपनी लचर पटकथा, पूर्वानुमानित कहानी, खिंचे हुए रनटाइम और कमजोर थ्रिल के कारण एक बड़ा मौका गंवा देती है।