आखिर क्यों कभी सामने नहीं आएगा गायब हुई रकम का सटीक आंकड़ा, आरोपियों की प्लानिंग देख पुलिस हैरान
अयोध्या: उत्तर प्रदेश के पवित्र धार्मिक शहर अयोध्या के भव्य श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की हुंडियों (दानपात्रों) से चढ़ावे की रकम चोरी होने का मामला इस समय देश भर में सबसे बड़ी कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक बहस का विषय बना हुआ है। इस हाई-प्रोफाइल वित्तीय अपराध (Financial Crime) की जांच कर रही टीमों और अंदरूनी सूत्रों से एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा हुआ है जो इस पूरे मामले की कानूनी पेचीदगियों को बेहद उलझा देता है। मामले से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों का स्पष्ट मानना है कि गर्भगृह और मंदिर परिसर के दानपात्रों से अब तक कुल कितनी करोड़ रुपये की नकदी और बहुमूल्य आभूषण गायब हुए हैं, इसका सटीक और अंतिम आंकड़ा जुटा पाना सिर्फ मुश्किल ही नहीं, बल्कि पूरी तरह से नामुमकिन है। पुलिस जांच में यह तथ्य सामने आया है कि इस बड़ी साजिश को अंजाम देने वाले शातिर मास्टरमाइंड्स ने सुरक्षा चक्र के लागू होने से काफी पहले ही मंदिर के प्रशासनिक तंत्र में अपनी जड़ें बेहद मजबूत कर ली थीं।
सुरक्षा एजेंसी की एंट्री से पहले ही जमा ली थी जड़ें: महाकुंभ 2025 के दौरान रची गई पूरी साजिश
'टाइम्स ऑफ इंडिया' की एक विशेष खोजी रिपोर्ट के मुताबिक, अयोध्या पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए कुल आठ आरोपियों में से चार मुख्य अपराधी— अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा और करुणेश पांडे— ऐसे हैं जो किसी भी बाहरी सुरक्षा ऑडिट से बहुत पहले से राम मंदिर परिसर में सक्रिय रूप से काम कर रहे थे। दरअसल, जब महाकुंभ 2025 (Mahakumbh 2025) के ऐतिहासिक आयोजन के दौरान देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के चलते राम मंदिर की हुंडियों में करोड़ों रुपये की अतिरिक्त नकदी आने लगी, तब भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के पास इस भारी-भरकम कैश को संभालने के लिए तत्काल प्रशिक्षित मैनपावर उपलब्ध नहीं थी। इसी प्रशासनिक शून्यता का लाभ उठाकर इन आरोपियों ने मंदिर के भीतर प्रवेश किया।
ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों का जीता भरोसा: अनुकल्प मिश्रा ने रची नकदी गबन की चक्रव्यूह
इस पूरे वित्तीय गबन का सबसे प्रमुख चेहरा अनुकल्प मिश्रा था, जिसने अपनी गहरी पैठ के दम पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और वरिष्ठ सदस्य अनिल मिश्रा का अटूट विश्वास जीत लिया था। अनुकल्प मंदिर के भव्य शिखर पर ऐतिहासिक ध्वजारोहण, रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की पहली व दूसरी वर्षगांठ के बड़े समारोहों और अयोध्या के वैश्विक दीपोत्सव जैसे अति-संवेदनशील व प्रतिष्ठित आयोजनों की मुख्य प्रबंधकीय टीमों में लगातार शामिल रहा था। इस भारी साख का नाजायज फायदा उठाकर उसने अहम बैठकों में अपनी जगह पक्की की और बाद में अपने अन्य शातिर साथियों को वालंटियर्स के रूप में ट्रस्ट के पदाधिकारियों से मिलवाया। भगवा संगठनों से पुरानी संबद्धता के कारण ट्रस्ट ने भी बिना किसी कड़े पुलिस वेरिफिकेशन के, महज एक अनुमान और आपसी भरोसे के आधार पर इन वालंटियर्स को दैनिक नकदी गिनने (Cash Counting) जैसी अति-महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी थी।
बैंक की लापरवाही और चेकिंग का अभाव: एसबीआई द्वारा नियुक्त 'सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज' भी रही बेअसर
जांच में सामने आया कि जब भारतीय स्टेट बैंक ने बाद में कैश मैनेजमेंट को पेशेवर बनाने के लिए वाराणसी की एक प्रतिष्ठित प्राइवेट एजेंसी 'सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज' को अनुबंधित किया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। निजी सुरक्षा कंपनी ने कैश काउंटिंग के लिए अपने 40 नए युवाओं को जरूर तैनात किया, लेकिन उन्होंने मंदिर के पुराने वालंटियर्स के गहरे प्रभाव को देखते हुए उन्हीं चारों मुख्य आरोपियों को अपना प्रमुख काउंटिंग एजेंट बना दिया। इस बेहद कमजोर आंतरिक नियंत्रण (Weak Internal Control) और मेटल डिटेक्टर व सघन चेकिंग के अभाव का फायदा उठाकर आरोपी कई महीनों तक दैनिक रूप से दानपात्रों से नकदी उड़ाते रहे। यही वजह है कि बिना किसी लिखित रिकॉर्ड या प्रारंभिक एंट्री के, यह कभी तय नहीं किया जा सकेगा कि कुल कितनी रकम और कितने लंबे समय से चुराई जा रही थी।
रिकवरी के आंकड़े देखकर पुलिस के उड़े पसीने: आभूषणों के साथ लाखों रुपये नकद बरामद
अयोध्या पुलिस और विशेष जांच दल (SIT) ने अब तक आरोपियों के विभिन्न ठिकानों पर छापेमारी कर लगभग ₹80 लाख की भारी-भरकम नकदी और कीमती आभूषण बरामद किए हैं, जिसका आधिकारिक ब्योरा इस प्रकार है:
अविनाश शुक्ला: इसके पास से सबसे अधिक ₹20.39 लाख नकद और भारी मात्रा में सोने-चांदी के आभूषण बरामद हुए हैं।
करुणेश पांडे: पुलिस ने इसके पास से ₹18.63 लाख की नकदी जब्त की है।
अनुकल्प मिश्रा: इसके पास से ₹16.82 लाख के नोट बरामद किए गए हैं।
लवकुश मिश्रा: इसके ठिकाने से ₹14.25 लाख बरामद हुए हैं।
रमाशंकर मिश्रा: इसके पास से ₹7.32 लाख की रिकवरी हुई है।
मनीष यादव: इसके पास से ₹2 लाख बरामद किए गए हैं।
मामले के अन्य दो गिरफ्तार आरोपी— राम शंकर यादव (उर्फ टीनू) और सुभाष श्रीवास्तव सीधे तौर पर नोटों की गिनती में शामिल नहीं थे, बल्कि वे बाहर से इस अवैध सिंडिकेट को लॉजिस्टिक सहायता प्रदान कर रहे थे। वर्तमान में पुलिस की जांच पूरी तरह से मुख्य चार आरोपियों की चौकड़ी पर टिकी हुई है। इस पूरे शर्मनाक घटनाक्रम पर गंभीर कानूनी टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रांशु अग्रवाल बताते हैं कि यह मामला न केवल नैतिक पतन का एक भयानक उदाहरण है, बल्कि यह बैंक और ट्रस्ट के पदाधिकारियों की घोर कैजुअल कार्यप्रणाली और लापरवाही को भी उजागर करता है, जिन पर तुरंत कड़ा विधिक एक्शन होना चाहिए।