कानपुर NSI परिसर में बिना अनुमति कटे 722 हरे पेड़, डायरेक्टर प्रो. सीमा परोहा सस्पेंड
कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर में स्थित नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट (NSI - राष्ट्रीय शर्करा संस्थान) परिसर में हुए भीषण पर्यावरण उल्लंघन के मामले में केंद्र सरकार ने बेहद सख्त और बड़ी कार्रवाई की है। वन विभाग की अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) के बिना ही संस्थान के भीतर 722 हरे-भरे पेड़ों को बेरहमी से काटने के आरोप में केंद्र सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने संस्थान की निदेशक (डायरेक्टर) प्रो. सीमा परोहा को तत्काल प्रभाव से निलंबित (सस्पेंड) कर दिया है।
प्रो. सीमा परोहा के निलंबन के बाद संस्थान के प्रशासनिक कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए निदेशक (शर्करा) अरविंद कुमार रावत को राष्ट्रीय शर्करा संस्थान के निदेशक पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। वह अगले आदेश तक अपनी वर्तमान जिम्मेदारी के साथ-साथ इस पद का कार्यभार भी संभालेंगे।
कर्मचारी संगठनों ने किया भंडाफोड़, कल्याणपुर थाने में FIR दर्ज
इस पूरे खेल का पर्दाफाश किसी बाहरी एजेंसी ने नहीं, बल्कि एनएसआई के ही सजग कर्मचारी संगठनों ने किया है। एनएसआई कर्मचारी संघ के मंत्री अजीत कुमार और सभापति अरविंद कुमार सविता की आधिकारिक शिकायत पर ही वन विभाग की टीम हरकत में आई थी। हरियाली पर आरा चलाने के साथ-साथ सरकारी संपत्ति की हेराफेरी के इस गंभीर मामले में बीती 3 जून को वन विभाग ने कड़ी कार्रवाई करते हुए कल्याणपुर थाने में संस्थान की तत्कालीन निदेशक प्रो. सीमा परोहा समेत पांच नामजद अधिकारियों और कई अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज कराई थी।
जांच टीम को रोकने की कोशिश, रात में गायब की जाती थीं लकड़ियां
मामले की परतें तब खुलनी शुरू हुईं जब 27 मई को क्षेत्रीय वन अधिकारी जांच के लिए एनएसआई परिसर पहुंचे। उस समय वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों ने दबंगई दिखाते हुए यह कह दिया कि "निदेशक की अनुमति के बिना ताला नहीं खोला जाएगा", जिसके चलते टीम को बैरंग लौटना पड़ा। इसके बाद उप प्रभागीय वन अधिकारी की अध्यक्षता में 30 मई को एक विशेष जांच कमेटी का गठन किया गया।
इस टीम ने 2 जून को निदेशक से मुलाकात की, जिसके बाद वे खुद टीम को उस स्थान पर लेकर गईं जहां पेड़ काटे गए थे। जांच में सामने आया कि पेड़ों को काटने के बाद उनकी कीमती लकड़ियों को रात के अंधेरे में चुपचाप परिसर से बाहर निकाल दिया जाता था। इस लापरवाही में वन विभाग ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित वन दरोगा को सस्पेंड कर दिया है और अब जांच की कमान उप प्रभागीय अधिकारी आशीष जैन को सौंप दी गई है। वर्तमान में संस्थान के भीतर बाहरी और अनजान लोगों के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है।
95 फोटो भेजीं पर नहीं दिया जवाब: 'हिन्दुस्तान' की पड़ताल
आपके अपने अखबार 'हिन्दुस्तान' की ओर से इस महाघोटाले पर पक्ष जानने के लिए निदेशक प्रो. सीमा परोहा से फोन कॉल, मैसेज और व्हाट्सएप के माध्यम से लगातार संपर्क करने का प्रयास किया गया। मंगलवार देर रात से ही उनसे प्रतिक्रिया मांगी जा रही थी, लेकिन उन्होंने सीधे तौर पर कोई जवाब नहीं दिया। हालांकि, बुधवार सुबह उन्होंने आंधी के कारण गिरे हुए पेड़ों की करीब 95 तस्वीरें व्हाट्सएप पर भेजीं, लेकिन अवैध कटान और एफआईआर से जुड़े सीधे सवालों पर चुप्पी साधे रखी।
655 बड़े पेड़ और 67 बौने कनेर उजाड़े, जेसीवी से उखाड़ी गईं जड़ें
दर्ज एफआईआर के मुताबिक, एनएसआई के खूबसूरत और हरे-भरे परिसर में 655 बड़े छायादार वृक्षों और 67 बौने कनेर के पौधों का अवैध रूप से सफाया किया गया। नष्ट किए गए पेड़ों में पोसोपिस, कंजी, नीम, कनेर, केसिया, श्यामिया, शीशम, यूकेलिप्टस, जंगल जलेबी, चिलबिल, सिरस, बॉटल ब्रश, गोल्ड मोहर, अर्रू, लसोढ़ा, छितवन, सुबबूल और गूलर जैसी बहुमूल्य प्रजातियां शामिल थीं।
जांच टीम को मौके पर 377 पेड़ों के ताजे ठूंठ मिले, जिन्हें पिछले छह महीनों के अंतराल में काटा गया था। निरीक्षण के दौरान निदेशक ने बताया था कि इस खाली की गई जगह पर फार्म (खेत) बनाया जाना था। इसके अलावा 250 पेड़ों को तो बकायदा जेसीबी मशीन लगाकर जड़ से उखाड़ दिया गया था।
9 स्वीकृतियों की आड़ में साफ कर दिए 722 पेड़, राजकोष को चपत
जांच में परिसर के अलग-अलग कोनों से 95 और पेड़ों के पुराने ठूंठ बरामद हुए हैं, जिनकी कीमती लकड़ियां पूरी तरह गायब थीं। परिसर के भीतर कुछ भंडारित लकड़ियां जरूर मिलीं, जो करीब 8 से 10 महीने पुरानी बताई जा रही हैं। एफआईआर में स्पष्ट तौर पर उल्लेख है कि एनएसआई परिसर में काटे गए ये सभी वृक्ष सरकारी संपत्ति के दायरे में आते थे, जिनकी नीलामी या बिक्री से प्राप्त होने वाली पूरी रकम को सरकारी राजकोष में जमा कराया जाना अनिवार्य था।
वन विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 8 जुलाई 2024 को एनएसआई प्रशासन ने केवल 9 सूखे या खतरनाक पेड़ों को काटने की वैधानिक मंजूरी ली थी। लेकिन संस्थान प्रबंधन ने इसी मामूली मंजूरी की आड़ लेकर बिना किसी एनओसी के पूरे जंगल के रूप में खड़े 722 हरे-भरे पेड़ों को जमींदोज कर दिया।