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September 16 2026 10:18 pm

ट्रंप के नए फैसले के खिलाफ कोर्ट पहुंचे 22 राज्य, 'पब्लिक चार्ज' नियम पर छिड़ी भीषण कानूनी जंग

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संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थायी निवास यानी 'ग्रीन कार्ड' (Green Card) हासिल करने की राह देख रहे लाखों प्रवासियों के भविष्य को लेकर एक बार फिर जबरदस्त कानूनी और राजनीतिक संग्राम छिड़ गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले प्रशासन द्वारा ग्रीन कार्ड जारी करने के नियमों को और अधिक कड़ा बनाने के लिए लाए गए नए 'पब्लिक चार्ज' (Public Charge) नियम के खिलाफ अमेरिका के 22 राज्यों और राजधानी वाशिंगटन डीसी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। इसके साथ ही न्यूयॉर्क शहर के मेयर और सैन फ्रांसिस्को, शिकागो, सिएटल जैसे प्रमुख शहरों के गठबंधन ने भी अलग से मुकदमा दायर कर इस नीति पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है।

यह नया विवादित नियम 18 सितंबर से लागू होने वाला है। इसके तहत यदि कोई अप्रवासी नागरिक अमेरिका में किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता—जैसे फूड स्टैम्प्स (SNAP), मेडिकेड (स्वास्थ्य बीमा) या हाउसिंग वाउचर—का लाभ लेता है, तो इमिग्रेशन अधिकारियों को उसका ग्रीन कार्ड आवेदन खारिज करने का व्यापक विवेकाधिकार मिल जाएगा। डेमोक्रेटिक शासित राज्यों ने इसे "विनाशकारी और क्रूर" नीति बताते हुए संघीय अदालत से इसे असंवैधानिक घोषित करने की अपील की है।

क्या है 140 साल पुराना 'पब्लिक चार्ज' नियम और ट्रंप ने इसमें क्या बदला?

अमेरिकी आव्रजन कानून में 'पब्लिक चार्ज' की अवधारणा कोई नई नहीं है; इसका इतिहास वर्ष 1882 के इमिग्रेशन एक्ट से जुड़ा हुआ है। इस नियम का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अमेरिका में बसने आने वाले लोग आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हों और सरकार के वित्तीय संसाधनों पर बोझ न बनें।

हालांकि, दशकों से इस नियम की परिभाषा काफी सीमित थी। जो बाइडन प्रशासन के तहत यह स्पष्ट था कि केवल सीधी नकद सहायता (Cash Assistance जैसे Supplemental Security Income) लेने वाले मामलों को ही इसमें गिना जाएगा। सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं और खाद्य सुरक्षा जैसी गैर-नकद सहायता (Non-cash benefits) लेने पर ग्रीन कार्ड की पात्रता पर कोई असर नहीं पड़ता था।

लेकिन ट्रंप प्रशासन के नए आदेश ने इस दायरे को खतरनाक रूप से बढ़ा दिया है:

गैर-नकद सहायता भी दायरे में: अब मेडिकेड, खाद्य सहायता (SNAP) और किफायती आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं लेने पर भी अप्रवासी को 'पब्लिक चार्ज' माना जा सकता है।

अधिकारियों को असीमित अधिकार: नियम में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कौन सी योजनाएं मान्य हैं और कौन सी नहीं, जिससे व्यक्तिगत इमिग्रेशन अफसरों को अपनी मर्जी से आवेदन रद्द करने की मनमानी छूट मिल जाएगी।

अमेरिकी नागरिक बच्चों के लाभ पर भी आफत: सबसे विवादित पहलू यह है कि यदि किसी परिवार में माता-पिता अप्रवासी हैं लेकिन उनके बच्चे जन्म से कानूनी तौर पर अमेरिकी नागरिक हैं, तो बच्चों को मिलने वाले सरकारी पोषण या स्वास्थ्य लाभ को भी माता-पिता के ग्रीन कार्ड आवेदन के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकेगा।

22 राज्यों ने अदालत में क्या दी दलील? 'अरबों डॉलर का होगा नुकसान'

न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिटिया जेम्स के नेतृत्व में कैलिफोर्निया, इलिनोइस, मैसाचुसेट्स, न्यू जर्सी, पेंसिल्वेनिया, वर्जीनिया और वाशिंगटन समेत 22 राज्यों ने संघीय अदालत में याचिका दायर की है।

राज्यों ने अपनी याचिका में प्रमुख तर्क रखे हैं:

कानूनी अधिकारों से वंचित करने का डर: लेटिटिया जेम्स ने कहा कि मेहनतकश परिवारों को सिर्फ इसलिए भूखा रहने या इलाज छोड़ने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उन्हें डर है कि सहायता मांगने पर उनका ग्रीन कार्ड रुक जाएगा या उन्हें डिपोर्ट कर दिया जाएगा। यह नीति लोगों के मन में डर पैदा कर उन्हें उन कल्याणकारी योजनाओं से दूर कर रही है जिसके वे कानूनी हकदार हैं।

राज्यों के बजट पर 2.2 अरब डॉलर की चोट: याचिका के अनुसार, इस नियम के डर से लाखों परिवार जब मेडिकेड और बच्चों के स्वास्थ्य बीमा (CHIP) से नाम वापस ले लेंगे, तो राज्यों को मिलने वाले संघीय फंड में अकेले 2.2 अरब डॉलर (लगभग 18 हजार करोड़ रुपये) से अधिक का सीधा नुकसान होगा।

सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट: न्यूयॉर्क के मेयर ने चेताया कि यदि गरीब प्रवासी परिवार डॉक्टर के पास जाने या संक्रामक बीमारियों का इलाज कराने से डरेंगे, तो इसका खमियाजा पूरे शहर और आम अमेरिकी नागरिकों को महामारी व स्वास्थ्य संकट के रूप में भुगतना पड़ेगा।

ट्रंप प्रशासन का रुख: 'आत्मनिर्भरता है आव्रजन की पहली शर्त'

दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन और व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने इस नीति का कड़ा बचाव किया है। प्रशासन का कहना है कि यह अमेरिकी करदाताओं के धन और सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम है।

अधिकारियों का तर्क है कि जो विदेशी नागरिक अमेरिका में स्थायी रूप से बसना चाहते हैं, उनसे यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे अपनी और अपने परिवार की वित्तीय जरूरतों को खुद पूरा करने में सक्षम हों, न कि अमेरिकी कल्याणकारी योजनाओं के सहारे रहें। ट्रंप प्रशासन ने साफ किया कि यह नीति अमेरिका को आर्थिक रूप से मजबूत प्रवासियों के लिए आकर्षक बनाने की दिशा में जरूरी कदम है।

'मिक्स्ड-स्टेटस' और भारतीय परिवारों पर क्या पड़ेगा असर?

इस कानूनी लड़ाई ने अमेरिका में रह रहे भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और ग्रीन कार्ड बैकलॉग का सामना कर रहे परिवारों की चिंता भी बढ़ा दी है। भारत से हजारों की संख्या में एच-1बी (H-1B) और एल-1 (L-1) वीजा धारक वर्षों से ग्रीन कार्ड के इंतजार में कतारबद्ध हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार:

'मिक्स्ड-स्टेटस' वाले परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित: अमेरिका में काम करने वाले कई भारतीय दंपतियों के बच्चे वहां पैदा होने के कारण जन्मजात अमेरिकी नागरिक हैं। यदि किसी विपरीत परिस्थिति (जैसे छंटनी या बीमारी) में ऐसे परिवारों ने बच्चों के लिए स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य या डे-केयर से जुड़ी सब्सिडी ली है, तो नए नियम के तहत ग्रीन कार्ड साक्षात्कार के समय उनसे कठिन सवाल पूछे जा सकते हैं या आवेदन खारिज हो सकता है।

दस्तावेजी जटिलता: जिन लोगों ने कभी भी किसी सरकारी राहत का उपयोग किया है, उन्हें अब अपने आवेदन में यह साबित करने के लिए अतिरिक्त कागजात और शपथ पत्र देने होंगे कि वे सरकार पर निर्भर नहीं हैं, जिससे पहले से ही लंबित फाइलों का बैकलॉग और लंबा हो जाएगा।

शुक्रवार से लागू होने जा रहे इस नियम पर अब सबकी निगाहें संघीय अदालत के फैसले पर टिकी हैं कि क्या अदालत ट्रंप के इस आदेश पर आपातकालीन रोक (Injunction) लगाती है या फिर लाखों प्रवासियों के लिए ग्रीन कार्ड का सपना और अधिक पथरीला हो जाएगा।