Ravi Pradosh Vrat 2026: 26 जुलाई को रवि प्रदोष पर बन रहे 2 शुभ योग, जानें शाम के समय ही क्यों की जाती है भगवान शिव की पूजा
सनातन धर्म में प्रदोष व्रत को भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त करने का सबसे उत्तम साधन माना गया है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि यानी 26 जुलाई 2026 को आषाढ़ का अंतिम प्रदोष व्रत रखा जाएगा। रविवार के दिन पड़ने के कारण इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस बार रवि प्रदोष व्रत पर अत्यंत दुर्लभ और शुभ योगों का निर्माण हो रहा है। रवि प्रदोष का व्रत करने से साधक को उत्तम स्वास्थ्य, मान-सम्मान और करियर में सफलता की प्राप्ति होती है।
रवि प्रदोष व्रत 2026: शुभ तिथि व मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ 26 जुलाई को दोपहर 1:57 बजे से होगा, जो 27 जुलाई को शाम 4:14 बजे तक रहेगी।
प्रदोष पूजा का समय: शाम 07:16 बजे से रात 09:21 बजे तक
शुभ-उत्तम मुहूर्त: शाम 07:16 बजे से 08:34 बजे तक
अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त: रात 08:34 बजे से 09:21 बजे तक
अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:00 बजे से 12:55 बजे तक
इंद्र और सर्वार्थ सिद्धि योग का दुर्लभ संयोग
इस बार रवि प्रदोष व्रत के दिन दो अत्यंत फलदायी योग सक्रिय रहेंगे:
इंद्र योग: सूर्योदय से लेकर रात 10:05 बजे तक रहेगा।
सर्वार्थ सिद्धि योग: सुबह 07:34 बजे से शुरू होकर अगले दिन (27 जुलाई) सुबह 05:40 बजे तक रहेगा।
प्रदोष पूजा के दौरान इन दोनों योगों के उपस्थित रहने से की गई पूजा और उपाय का फल कई गुना बढ़कर मिलेगा। सर्वार्थ सिद्धि योग में भगवान शिव का पूजन करने से मनोकामनाओं की पूर्ति शीघ्र होती है।
शाम को (प्रदोष काल में) ही क्यों होती है भगवान शिव की पूजा?
शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा केवल प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद और रात्रि के प्रथम प्रहर में ही की जाती है। पौराणिक मान्यता है कि प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को सूर्यास्त के समय भगवान शिव अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर कैलाश पर्वत पर आनंद तांडव नृत्य करते हैं। इस समय सभी देवी-देवता कैलाश पर उपस्थित होकर महादेव की स्तुति करते हैं। माना जाता है कि इस पावन समय पर भगवान शिव की आराधना करने से वे प्रसन्न होकर अपने भक्तों के सभी दुख, दरिद्रता और पापों को क्षणभर में नष्ट कर देते हैं।
रवि प्रदोष की सरल पूजन विधि
सुबह स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
दिनभर सात्विकता का पालन करें और मन ही मन 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करते रहें।
शाम को शुभ मुहूर्त में शिवलिंग का दूध, दही, शहद, शक्कर और गंगाजल से पंचामृत अभिषेक करें।
भगवान शिव को चंदन, बेलपत्र, भांग, धतूरा, आंकड़े के फूल और नैवेद्य अर्पित करें।
रवि प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें अथवा सुनें और अंत में शिव जी की आरती करें।