भगवान जगन्नाथ हुए बीमार, 15 दिन रहेंगे क्वारंटीन, वैद्य कर रहे हैं इलाज...
क्या भगवान भी कभी बीमार हो सकते हैं. क्या आम इंसानों की तरह उन्हें भी तेज बुखार आता है. क्या भगवान को भी कभी सबसे अलग यानी क्वारंटीन होना पड़ता है. ये सवाल सुनने में आपको थोड़े अजीब जरूर लग रहे होंगे. लेकिन ये सारे सवाल बिल्कुल सही हैं और इनका जवाब भी हां है. जी हां, भगवान भी बीमार होते हैं, उन्हें बुखार भी आता है और वो इंसानों की तरह क्वारंटीन भी होते हैं. इन दिनों जगत के पालनहार भगवान जगन्नाथ बीमार हैं और एकांतवास में हैं. आखिर क्यों और कैसे, आइए जानते हैं हमारी इस खास रिपोर्ट में.
जगत के पालनहार कहे जाने वाले महाप्रभु जगन्नाथ बीते 29 जून से बीमार हैं. वे इस समय एकांतवास यानी क्वारंटीन में हैं और राजवैद्य उनका इलाज कर रहे हैं. इस 'क्वारंटीन' शब्द को आपने कुछ साल पहले कोरोना महामारी के समय बहुत सुना होगा. दुनिया के अधिकांश लोगों ने शायद इस शब्द का मतलब भी पहली बार तभी जाना था. लेकिन हमारे भारत में इस परंपरा का पालन सदियों से होता चला आ रहा है. खुद भगवान जगन्नाथ हर साल पूरे एक पखवाड़े यानी 15 दिनों के लिए क्वारंटीन होते हैं.
ज्येष्ठ पूर्णिमा के शाही स्नान के बाद आता है बुखार
अब सवाल यह उठता है कि आखिर भगवान को इस सब की क्या जरूरत है. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान हमेशा अपने भक्तों के भावों के अधीन रहते हैं. यही अटूट भाव भक्तों को भगवान के करीब ले जाते हैं. दुनिया भर में प्रसिद्ध जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा आगामी 16 जुलाई को आयोजित होने वाली है. पुरी के साथ साथ देश भर में अलग अलग जगहों पर भव्य रथयात्राएं निकाली जाएंगी. पुरी की तर्ज पर ही मध्य प्रदेश के दमोह में भी इन सभी प्राचीन मान्यताओं और परंपराओं का पूरा पालन किया जा रहा है. दमोह में भी भगवान इस समय 15 दिनों के लिए अस्वस्थ हैं और उनका इलाज चल रहा है.
लू लगने और 108 कलशों के जल से बीमार होने की कथा
भगवान जगन्नाथ के बीमार होने के पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. पहली मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन महाप्रभु जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को 108 कलशों के पवित्र जल से भव्य स्नान कराया जाता है. इस भारी स्नान के बाद महाप्रभु को तेज बुखार आ जाता है. इसके बाद वे 15 दिनों तक आराम करते हैं, जिसे 'अणसर' या 'अनावसर' काल कहा जाता है. वहीं दूसरी कथा के अनुसार, भगवान प्रसिद्ध चंदन तलैया में स्नान के लिए जाते हैं. ज्येष्ठ महीने की भीषण तपन और गर्मी के बीच जब वे जल से बाहर निकलते हैं, तो आम इंसानों की तरह उन्हें लू लग जाती है. लू का शिकार होने के बाद वैद्य उन्हें आराम की सलाह देते हैं. उन्हें रोजाना दवा के रूप में विशेष काढ़ा और औषधियां पिलाई जाती हैं.
56 भोग बंद, बीमार इंसान की तरह मिल रहा साधारण भोजन
भक्त और भगवान एक दूसरे के पूरक माने जाते हैं. कई ऐसी किंवदंतियां हैं जो बताती हैं कि भगवान अपने भक्तों की तरह ही जीवन जीने लगते हैं. रथयात्रा से 15 दिन पहले उनका बीमार होना उनके मनुष्य रूपी व्यवहार का सबसे बड़ा उदाहरण है. अब जब भगवान अस्वस्थ हैं, तो दमोह सहित देश के उन सभी स्थानों पर यह पूरी प्रक्रिया निभाई जा रही है जहां रथयात्रा निकलनी है. इस बीमारी के समय भगवान को उनका पसंदीदा 56 भोग नहीं चढ़ाया जाता. बल्कि उन्हें वो साधारण भोजन और दलिया खिलाया जा रहा है, जो एक बीमार आदमी को दिया जाता है.
स्वस्थ होकर भक्तों के घर रहने जाते हैं महाप्रभु
मान्यता है कि 15 दिनों तक क्वारंटीन में रहने के बाद भगवान आषाढ़ महीने की प्रथमा को पूरी तरह स्वस्थ होते हैं. इसके बाद द्वितीया (दूज) के दिन वे रथ पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं. एक पखवाड़े तक बीमार रहने की वजह से भगवान को मंदिर का एकांत अच्छा नहीं लगता. इसलिए नगर भ्रमण के बाद वे सीधे मुख्य मंदिर वापस नहीं आते. वे अपने एक एक भक्त को दर्शन देकर यह अहसास कराते हैं कि उनके बीमार होने से कोई भक्त दुखी तो नहीं था. इसके बाद वे कुछ दिन अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) निवास करते हैं और भक्तों के भावों का भोग पाते हैं. शास्त्रों के अनुसार इस रथयात्रा का रथ खींचना बेहद कल्याणकारी है और इससे सभी पापों का नाश होता है.
भले ही आज दुनिया आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल है, लेकिन भारत आज भी अपने धर्म और संस्कृति से मजबूती से जुड़ा हुआ है. इसका सबसे बड़ा गवाह हर साल होने वाली यह रथयात्रा है, जहां महाप्रभु की एक झलक पाने के लिए लाखों भक्त उमड़ पड़ते हैं. दमोह में भी 16 जुलाई को भगवान शहर भ्रमण पर निकलेंगे, जिसके लिए भव्य रथ तैयार किए जा रहे हैं. भक्त भजन कीर्तन कर भगवान के जल्द स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं.