BREAKING:
September 17 2026 05:00 pm

8.1 की धांसू IMDb रेटिंग, 16 सितंबर को ही OTT पर रिलीज हुई है यह सीरीज; बिंज वॉच करने से पहले पढ़ें पूरा रिव्यू

Post

भारतीय डिजिटल स्पेस में इन दिनों क्राइम-थ्रिलर के साथ सामाजिक और व्यावहारिक मुद्दों को जोड़ने वाली कहानियों का दौर चल रहा है। इसी कड़ी में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर 16 सितंबर को एक ऐसी वेब सीरीज ने दस्तक दी है, जिसने रिलीज होते ही दर्शकों के दिलों पर कब्जा जमा लिया है। हम बात कर रहे हैं प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हुई क्राइम-कॉमेडी थ्रिलर सीरीज 'वेटिंग है' (Waiting Hai) की। देश के हर आम नागरिक से सीधे तौर पर जुड़े मुद्दे यानी रेलवे की तत्काल टिकट बुकिंग और उसके पीछे चलने वाले अरबों रुपये के अंडरग्राउंड सिंडिकेट पर बनी इस सीरीज को दर्शकों और समीक्षकों से जबर्दस्त रिस्पॉन्स मिला है। रिलीज के चौबीस घंटों के भीतर ही इसे आईएमडीबी (IMDb) पर 8.1 की शानदार रेटिंग मिल चुकी है। अगर आप भी इस वीकेंड कुछ नया, हल्का-फुल्का और सस्पेंस से भरपूर देखने का मन बना रहे हैं, तो इसे शुरू करने से पहले जानिए इसका पूरा रिव्यू।

क्या है 7 एपिसोड्स की इस सीरीज की दिलचस्प कहानी?

सीरीज की कहानी बिहार की राजधानी पटना की तंग गलियों और वहां के एक शर्मीले, लेकिन कंप्यूटर कोडिंग में माहिर जीनियस स्टूडेंट अफरोज हमजा (भुवन अरोड़ा) के इर्द-गिर्द घूमती है। अफरोज हर आम भारतीय की तरह आईआरसीटीसी (IRCTC) की स्लो वेबसाइट, सर्वर क्रैश और तत्काल टिकट की मारामारी से तंग आ चुका होता है।

अपनी असाधारण कोडिंग स्किल का इस्तेमाल करके अफरोज एक ऐसा हाई-टेक सॉफ्टवेयर 'बॉट' (Bot) तैयार कर लेता है, जो सुबह 10 बजते ही इंसानी पलक झपकने से पहले (चंद सेकंडों में) सैकड़ों कन्फर्म तत्काल टिकट बुक कर देता है। अफरोज के इस गुप्त टूल की भनक उसके चतुर और अवसरवादी मामा (विजय मौर्य) को लग जाती है। मामा इस कोडिंग टूल को एक विशाल ब्लैक-मार्केटिंग रैकेट में बदल देते हैं, जहां जरूरतमंद यात्रियों से मनमाना कमीशन लेकर टिकट बेचे जाने लगते हैं। कहानी में असली और रोमांचक मोड़ तब आता है जब रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के सख्त, तेजतर्रार और ईमानदार ऑफिसर सुगम मिश्रा (दिव्येंदु शर्मा) की नजर इस डिजिटल फर्जीवाड़े पर पड़ती है। इसके बाद शुरू होता है आरपीएफ अफसर और कोडर के बीच बिल्ली-चूहे का ऐसा हाई-टेक खेल जो हर एपिसोड में हैरान कर देता है।

दिव्येंदु शर्मा और भुवन अरोड़ा की जुगलबंदी ने जीता दिल

सीरीज की सबसे बड़ी जान इसकी मुख्य स्टारकास्ट की केमिस्ट्री और उनकी स्वाभाविक अदाकारी है। 'मिर्जापुर' के मुन्ना भैया के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ चुके दिव्येंदु शर्मा ने इस बार खाकी वर्दी में एक अलग ही रंग दिखाया है। आरपीएफ अधिकारी सुगम मिश्रा के रूप में उनका अनुशासन, देसी लहजा और व्यंग्यात्मक कॉमिक टाइमिंग बेहद असरदार है।

वहीं, वेब सीरीज 'फर्जी' में फिरोज के किरदार से दिल जीतने वाले भुवन अरोड़ा ने अफरोज के रोल में एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे छोटे शहरों के मध्यमवर्गीय युवाओं के द्वंद्व को पर्दे पर जीवंत करने में माहिर हैं। दोनों अभिनेताओं का आमना-सामना स्क्रीन पर जबरदस्त रोमांच और हंसी दोनों एक साथ पैदा करता है। इसके अलावा विजय मौर्य और कुमुद मिश्रा ने अपने-अपने सह-किरदारों में जान फूंक दी है।

आम जनता के सबसे बड़े दर्द को छूती है सीरीज

सीरीज की सबसे बड़ी यूएसपी इसका बिल्कुल अनूठा और रिलेटेबल विषय है। भारत में शायद ही कोई ऐसा मध्यमवर्गीय परिवार होगा जिसने कभी सुबह 10 या 11 बजे तत्काल टिकट बुक करने के लिए लैपटॉप या मोबाइल की स्क्रीन पर सर्वर डाउन होने का तनाव न झेला हो।

10:01 बजे ही टिकट का 'वेटिंग' में चले जाना और टिकट दलालों द्वारा दोगुने-तीन गुने दाम पर कन्फर्म टिकट थमा देना—इस काले कारोबार की कार्यप्रणाली को निर्देशक समीर विद्वांस ने बहुत ही प्रामाणिक और रोचक ढंग से उजागर किया है। दर्शक स्क्रीन पर खुद को अफरोज और उन बेबस यात्रियों से सीधे कनेक्ट कर पाते हैं।

तेज रफ्तार स्क्रीनप्ले और क्रिस्प एडिटिंग

सीरीज में 30-30 मिनट के कुल 7 एपिसोड्स हैं। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि कहानी कहीं भी बेवजह खिंचती नहीं है। न तो कोई गैर-जरूरी मेलोड्रामा डाला गया है और न ही कहानी को जटिल बनाने के लिए फालतू के सब-प्लॉट्स जोड़े गए हैं। हर एपिसोड एक ऐसे सस्पेंस या मोड़ पर खत्म होता है जो दर्शक को तुरंत अगला एपिसोड प्ले करने पर मजबूर कर देता है। साउंड डिजाइन और बैकग्राउंड स्कोर देसी माहौल को बेहतरीन तरीके से उभारते हैं।

देखें या छोड़ें?

'वेटिंग है' उन दर्शकों के लिए बिल्कुल सटीक कंटेंट है जो भारी-भरकम खून-खराबे वाली क्राइम सीरीज से ऊब चुके हैं और कुछ ऐसा देखना चाहते हैं जो रियलिस्टिक होने के साथ-साथ चेहरे पर मुस्कान भी लाए। अगर आपको प्रतीक गांधी की 'स्कैम 1992' या शाहिद कपूर की 'फर्जी' जैसी फाइनेंशियल और सिस्टम-हैक वाली थ्रिलर कहानियां पसंद आई थीं, तो 8.1 रेटिंग वाली यह सीरीज आपकी वीकेंड बिंज-वॉच लिस्ट के लिए पैसा वसूल चॉइस साबित होगी।