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September 17 2026 05:44 pm

पहले सऊदी को दिया दगा, अब हूतियों को गीदड़भभकी; मक्का पैक्ट पर पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का नया पैंतरा क्या है?

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पश्चिम एशिया में सऊदी अरब पर यमन के हूती विद्रोहियों के ताबड़तोड़ हमलों के बाद पाकिस्तान का दोहरा चरित्र और कूटनीतिक दोगलापन एक बार फिर दुनिया के सामने बेनकाब हो गया है। एक तरफ जहां महज दो दिन पहले पाकिस्तानी सेना (DG ISPR) और विदेश मंत्रालय ने सऊदी अरब की मदद के लिए सेना भेजने से साफ हाथ खींच लिए थे और ऐतिहासिक 'मक्का डिफेंस पैक्ट' को केवल कागजी व 'रक्षात्मक' करार दिया था, वहीं अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी थू-थू होते देख पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक नया पैंतरा चल दिया है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने टेलीविजन पर आकर हूतियों को खुली गीदड़भभकी देते हुए दावा किया है कि यदि सऊदी अरब की संप्रभुता पर आंच आई तो 'मक्का रक्षा समझौता' स्वतः लागू हो जाएगा और पाकिस्तान पूरी ताकत से सऊदी के साथ खड़ा होगा। हालांकि, रक्षा और कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि असलियत में एक भी सिपाही न भेजने वाले पाकिस्तान की यह बयानबाजी केवल सऊदी अरब के गुस्से को शांत करने और अपनी साख बचाने की खोखली चाल भर है।

पहले सेना ने खींचे हाथ, अब रक्षा मंत्री बोले- 'घड़ी आ चुकी है'

पाकिस्तान के भीतर सरकारी और सैन्य बयानों में ऐसा विरोधाभास शायद ही पहले कभी देखा गया हो। जब हूती विद्रोहियों के ड्रोन मक्का के निषिद्ध एयरस्पेस के करीब पहुंचे, तो पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ कहा था कि समझौते के तहत किसी भी सैन्य कार्रवाई पर विचार नहीं हो रहा है। सेना के मीडिया विंग (ISPR) ने भी इसे गैर-आक्रामक बताया था।

लेकिन इसके तुरंत बाद पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने 'जियो न्यूज' के कार्यक्रम में अपनी ही सेना और विदेश मंत्रालय के रुख से 180 डिग्री उलट बयान दे दिया। ख्वाजा आसिफ ने बड़े बोल बोलते हुए कहा, "मक्का पैक्ट हम पर पूरी तरह लागू होता है और हम अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे। समझौते के तहत किसी एक देश पर हमला तीनों देशों (सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की) पर हमला माना जाएगा। अगर किसी देश की क्षेत्रीय अखंडता पर खतरा आता है, तो समझौता सक्रिय हो जाएगा और वह स्थिति अब आ चुकी है।"

'पवित्र स्थलों की रक्षा के लिए समझौते की जरूरत नहीं': धार्मिक कार्ड खेलने की कोशिश

अपनी पिछली वादाखिलाफियों पर पर्दा डालने के लिए ख्वाजा आसिफ ने एक बार फिर मजहबी भावनाओं को भड़काने वाला कार्ड खेल दिया। उन्होंने कहा कि मक्का और मदीना जैसे मुकद्दस मुकामों की हिफाजत के लिए दुनिया के किसी समझौते या कागजी दस्तखत की जरूरत नहीं है, बल्कि यह हर मुसलमान का 'रूहानी और शाश्वत फर्ज' है।

उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान कूटनीतिक और व्यावहारिक दोनों तरह से सऊदी अरब के साथ खड़ा रहेगा। लेकिन जब उनसे सीधा सवाल पूछा गया कि क्या पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ जमीनी सेना या वायुसेना तैनात करने जा रहा है, तो ख्वाजा आसिफ तुरंत बगले झांकने लगे। उन्होंने यह कहकर बात टाल दी कि 'सैन्य रणनीतियों का खुलासा सार्वजनिक रूप से नहीं किया जा सकता।'

2015 की दगाबाजी और ईरान का डर: बयानों के पीछे की असली लाचारी

कूटनीतिक विश्लेषक ख्वाजा आसिफ के इस बयान को केवल 'गीदड़भभकी' और 'बड़बोलापन' करार दे रहे हैं। इसके पीछे पाकिस्तान की वे मजबूरियां हैं जिन्हें छिपाना अब मुमकिन नहीं रहा:

2015 में भी दिया था धोखा: साल 2015 में जब सऊदी अरब ने यमन संकट के दौरान पाकिस्तान से मदद मांगी थी, तब भी नवाज शरीफ सरकार और पाकिस्तानी संसद ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर सऊदी की मदद के लिए सेना भेजने से इनकार कर दिया था।

ईरान से सीधी दुश्मनी का खौफ: ख्वाजा आसिफ ने अपने बयान में खुद स्वीकार किया कि पाकिस्तान ने सऊदी का संदेश तेहरान तक पहुंचाया है। पाकिस्तान अच्छी तरह जानता है कि अगर उसने हूतियों पर हमला किया, तो 900 किलोमीटर की साझा सीमा पर ईरान के साथ तनाव भड़क जाएगा।

आर्थिक बदहाली और सेना की लाचारी: पाकिस्तान का कुल रक्षा बजट 8-9 अरब डॉलर के बीच सिमटा हुआ है और देश आईएमएफ की खैरात पर चल रहा है। ऐसे में हजारों मील दूर यमन के पहाड़ों में छापामार युद्ध लड़ रहे 3.5 लाख हूतियों के सामने अपनी सेना झोंकना पाकिस्तान के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।

सऊदी अरब में भारी नाराजगी, पाकिस्तान के दोहरे रुख से टूटा भरोसा

सऊदी अरब के सामरिक हलकों में ख्वाजा आसिफ के इन बयानों को कोई गंभीरता से नहीं ले रहा है। सऊदी नीति-निर्माताओं का मानना है कि अरबों डॉलर की आर्थिक मदद और मुफ्त तेल सहायता लेने वाला पाकिस्तान जरूरत पड़ने पर केवल बयान जारी करता है, जबकि जमीन पर उसका योगदान शून्य रहता है।

हाल ही में जब अमेरिका ने ओमान में हूतियों के साथ अलग से सीक्रेट बातचीत कर अपने जहाजों को सुरक्षित कर लिया और सऊदी को अकेला छोड़ दिया, तब सऊदी अरब को उम्मीद थी कि मक्का पैक्ट के साझेदार उसका साथ देंगे। लेकिन पाकिस्तान के इस दोमुंहे रवैये ने रियाद को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कागजी संधियों के दम पर अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की गारंटी नहीं खरीदी जा सकती।