जेब पर भारी पड़ेगा थलाइवा का जलवा? ‘जेलर 2’ के लिए थिएटर्स और मल्टीप्लेक्स बढ़ा सकते हैं टिकटों के दाम
भारतीय सिनेमा के 'थलाइवा' यानी सुपरस्टार रजनीकांत की ब्लॉकबस्टर एक्शन थ्रिलर के सीक्वल 'जेलर 2' (Jailer 2: Hukoom) को लेकर दर्शकों और ट्रेड गलियारों में जबरदस्त हलचल मची हुई है। साल 2023 में पहले भाग ने जिस तरह से 650 करोड़ रुपये से अधिक की ऐतिहासिक कमाई कर दुनिया भर के सिनेमाघरों को हिला दिया था, उसी को देखते हुए दूसरे भाग के लिए उम्मीदें आसमान छू रही हैं। जैसे-जैसे फिल्म के प्री-प्रोडक्शन और रिलीज की योजनाएं सामने आ रही हैं, वैसे ही फिल्म प्रेमियों के लिए एक चौंकाने वाली खबर भी सामने आई है। इंडस्ट्री और डिस्ट्रीब्यूशन सूत्रों के अनुसार, 'जेलर 2' की रिलीज के दौरान मल्टीप्लेक्स चेन्स और सिंगल-स्क्रीन थिएटर्स टिकटों की कीमतों में भारी इजाफा (Ticket Price Hike) करने की तैयारी कर रहे हैं। भारी मांग और सीमित शुरुआती शोज का फायदा उठाने के लिए डायनेमिक प्राइसिंग मॉडल को लागू करने पर विचार किया जा रहा है, जिसका सीधा असर आम सिनेमा प्रेमियों की जेब पर पड़ेगा।
डायनेमिक प्राइसिंग और ब्लॉकबस्टर सर्ज: 20 से 40 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं दाम
फिल्म कारोबार से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण भारत के प्रमुख राज्यों—तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल के साथ-साथ उत्तर भारत के मेट्रो शहरों में 'जेलर 2' की टिकट दरों में 20 से लेकर 40 प्रतिशत तक की अस्थायी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। पिछले कुछ वर्षों में बड़े बजट की पैन-इंडिया फिल्मों (जैसे 'आरआरआर', 'जवान', 'कल्कि 2898 एडी' और 'पुष्पा 2') के पहले वीकेंड के दौरान मल्टीप्लेक्स कंपनियां सरकारी नियमों के दायरे में रहते हुए विशेष टिकट दरें तय करती रही हैं। तमिलनाडु सरकार से भी विशेष शुरुआती दिनों के लिए सुबह के 4 बजे और 9 बजे के शोज के वास्ते अस्थायी मूल्य वृद्धि की अनुमति मांगी जा सकती है। यदि इन प्रस्तावों को हरी झंडी मिलती है, तो शुरुआती 4 से 5 दिनों में पीवीआर-आईनॉक्स और सिनेपोलिस जैसे बड़े मल्टीप्लेक्सों में प्रीमियम रिक्लाइनर और आईमैक्स सीट्स की कीमतें 800 से 1500 रुपये तक और सामान्य टिकटें 350 से 500 रुपये के दायरे में पहुंच सकती हैं।
थिएटर मालिकों का तर्क: भारी लागत, डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स और बुनियादी ढांचा
सिनेमाघर मालिकों और एग्जिबिटर्स का इस संभावित मूल्य वृद्धि के पीछे अपना व्यावसायिक तर्क है। 'जेलर' के पहले भाग की बंपर सफलता के बाद सन पिक्चर्स द्वारा निर्मित 'जेलर 2' के थिएट्रिकल डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स रिकॉर्ड तोड़ कीमतों पर बेचे जा रहे हैं। डिस्ट्रीब्यूटर्स ने भारी-भरकम अग्रिम राशि देकर अधिकार हासिल किए हैं, जिसकी भरपाई के लिए शुरुआती वीकेंड में अधिकतम बॉक्स ऑफिस कलेक्शन निकालना उनकी मजबूरी बन जाता है। इसके अलावा, सिंगल-स्क्रीन और मल्टीप्लेक्स एसोसिएशनों का कहना है कि थिएटरों के आधुनिक लेजर प्रोजेक्शन, डॉल्बी एटमॉस साउंड सिस्टम के रखरखाव और बिजली की बढ़ती लागत को संतुलित करने के लिए ऐसी मेगा-इवेंट फिल्मों पर टिकट दरों को थोड़ा बढ़ाना बिजनेस मॉडल का स्वाभाविक हिस्सा बन चुका है। थलाइवा की फिल्मों का ओपनिंग वीकेंड हमेशा त्योहार जैसा होता है, जहां प्रशंसक हर हाल में पहला शो देखने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं।
आम दर्शकों और फैंस के बीच नाराजगी की आशंका: क्या ओटीटी पर शिफ्ट होगी ऑडियंस?
टिकटों के संभावित महंगे होने की खबरों ने आम दर्शकों और मध्यमवर्गीय परिवारों के बीच चिंता बढ़ा दी है। सोशल मीडिया पर सिनेमा प्रेमियों का एक बड़ा वर्ग लगातार इस बात की शिकायत करता रहा है कि सिनेमा देखना अब एक बेहद महंगा शौक बन चुका है, जहां टिकटों के साथ-साथ पॉपकॉर्न और कोल्ड ड्रिंक के दाम भी बजट बिगाड़ देते हैं। यदि 'जेलर 2' के लिए कीमतें अत्यधिक बढ़ाई जाती हैं, तो कई सामान्य दर्शक पहले वीकेंड पर सिनेमाघर जाने के बजाय टिकटों के सामान्य होने या कुछ हफ्तों बाद ओटीटी (OTT) पर फिल्म के आने का इंतजार करना पसंद कर सकते हैं। हालांकि, रजनीकांत के कट्टर डाई-हार्ड फैंस के लिए टिकट का दाम कभी रुकावट नहीं बनता, लेकिन पारिवारिक दर्शकों (Family Audience) की संख्या पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
नेल्सन दिलीपकुमार का मेगा विजन और अनिरुद्ध का संगीत: क्या कीमत वसूल होगी?
इन तमाम चर्चाओं के बीच यह भी तय है कि 'जेलर 2' केवल एक साधारण फिल्म नहीं, बल्कि एक विशालकाय सिनेमैटिक इवेंट होने जा रही है। निर्देशक नेल्सन दिलीपकुमार ने दावा किया है कि इस बार मुथुवेल पांडियन की दुनिया पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक, डार्क और जबर्दस्त एक्शन से भरपूर होगी। संगीतकार अनिरुद्ध रविचंदर के बैकग्राउंड स्कोर और थलाइवा के विंटेज स्वैग को बड़े पर्दे और गूंजते साउंड सिस्टम पर अनुभव करने के लिए सिनेमाघर ही सबसे मुफीद जगह है। अब देखना यह होगा कि राज्य सरकारें टिकट दरों में कितनी बढ़ोतरी की औपचारिक मंजूरी देती हैं और मेकर्स आम दर्शकों व डाई-हार्ड फैंस के बीच संतुलन साधने के लिए क्या रणनीति अपनाते हैं।