अतिथि का स्वागत देवताओं को आहुतियां देने के समान; जानें वेदों और शास्त्रों का मत

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India News Live,Digital Desk : भारतीय संस्कृति में 'अतिथि देवो भव' की परंपरा केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। हमारे वेदों, पुराणों और प्राचीन ग्रंथों में अतिथि को साक्षात ईश्वर का रूप माना गया है। अतिथि के सत्कार को यज्ञ के समान पुण्यकारी बताया गया है। आज के सुविचार में आइए जानते हैं कि अतिथि के लक्षण क्या हैं और उनका अपमान करने से किस तरह के पुण्य का नाश होता है।

कौन होता है 'अतिथि'?

महर्षि शातातप के अनुसार, अतिथि वह है जिसके आने की कोई पूर्व सूचना न हो। उन्होंने कहा है— "जो बिना किसी प्रयोजन के, बिना बुलाए, किसी भी समय और किसी भी स्थान से घर में उपस्थित हो जाए, उसे ही अतिथि रूपी देवता समझना चाहिए।" जिस व्यक्ति के आने की जानकारी पहले से हो, वह शास्त्रानुसार अतिथि नहीं कहलाता।

वेदों में अतिथि का महत्व: देवताओं की आहुति के समान

अथर्ववेद (9/6(1)/3) में स्पष्ट उल्लेख है:

"यद्वा अतिथि पतिरतिंथीन् प्रतिपश्यंति देवयजंनं प्रेक्षंते।" इसका अर्थ है कि द्वार पर आए हुए अतिथि का स्वागत और सत्कार करना देवताओं को आहुतियां देने के समान है। यानी जिस प्रकार यज्ञ में आहुति देने से देवता प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार अतिथि की सेवा से दैवीय आशीर्वाद प्राप्त होता है।

महाभारत: यमलोक से मुक्ति दिलाता है आतिथ्य

महाभारत के वनपर्व में कहा गया है कि जो व्यक्ति अतिथि को चरण धोने के लिए जल, विश्राम के लिए स्थान, प्रकाश के लिए दीपक और भोजन के लिए अन्न देता है, उसे कभी यमराज के द्वार (यमलोक) नहीं देखना पड़ता। शास्त्रों की मान्यता है कि:

अतिथि को आसन देने से ब्रह्मा प्रसन्न होते हैं।

हाथ धुलाने से भगवान शिव संतुष्ट होते हैं।

पैर धुलाने से इंद्र आदि देवता तृप्त होते हैं।

भोजन कराने से साक्षात भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है।

अतिथि का अपमान: संचित पुण्यों का विनाश

महाभारत के शांतिपर्व के अनुसार, अतिथि को निराश करना सबसे बड़ा पाप है। यदि कोई अतिथि किसी घर से भूखा, प्यासा या निराश होकर लौटता है, तो वह उस गृहस्थ के परिवार का नाश कर देता है। मान्यता है कि निराश अतिथि अपना 'पाप' उस गृहस्थ को देकर, उसके जीवन भर का 'संचित पुण्य' अपने साथ ले जाता है।

गृहस्थों के लिए मनुस्मृति की सीख

मनुस्मृति (3/106) में कहा गया है कि एक गृहस्थ को स्वयं जैसा भोजन करना चाहिए, वैसा ही श्रेष्ठ भोजन अतिथि को भी कराना चाहिए। अतिथि सत्कार से न केवल यश और सौभाग्य बढ़ता है, बल्कि आयु और सुख में भी वृद्धि होती है। श्री विष्णुपुराण में भी अतिथि की सेवा को अनिवार्य कर्तव्य बताया गया है, क्योंकि भगवान स्वयं किसी भी रूप में अतिथि बनकर आपके द्वार पर आ सकते हैं।