Trump's Iran War U-Turn: क्यों अचानक नरम पड़े राष्ट्रपति ट्रंप के तेवर? भारी खर्च, वैश्विक तेल संकट और 'अंतहीन युद्ध' के डर ने बदला फैसला
India News Live,Digital Desk : केवल 36 घंटे पहले ईरान को "पूरी तरह तबाह" करने की धमकी देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सुर अचानक बदल गए हैं। मंगलवार (24 मार्च 2026) को ट्रंप ने न केवल हमलों को 5 दिनों के लिए टाला, बल्कि सार्थक बातचीत और शांति समझौते की ओर झुकाव दिखाया। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप अपनी ही आक्रामक रणनीति के जाल में फंस गए हैं। भारी सैन्य खर्च, वैश्विक ऊर्जा संकट और घरेलू स्तर पर गिरती लोकप्रियता ने उन्हें 'यू-टर्न' लेने पर मजबूर कर दिया है।
1. युद्ध का भारी आर्थिक बोझ: $1.38 अरब प्रतिदिन
अमेरिका के लिए यह युद्ध आर्थिक रूप से आत्मघाती साबित हो रहा है:
दैनिक खर्च: पेंटागन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका को इस युद्ध में रोजाना करीब 1.38 अरब डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं।
संसद की चुनौती: शुरुआती 18 दिनों में ही करीब 28 अरब डॉलर स्वाहा हो चुके हैं। पेंटागन ने 200 अरब डॉलर की अतिरिक्त राशि मांगी है, जिसे अमेरिकी कांग्रेस (संसद) से मंजूरी मिलना लगभग नामुमकिन लग रहा है।
2. आधुनिक इतिहास का सबसे भीषण ऊर्जा संकट
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इसे 1970 के दशक से भी गंभीर संकट बताया है:
तेल की कमी: वैश्विक तेल आपूर्ति में रोजाना 11 मिलियन बैरल की गिरावट आई है। युद्ध के कारण 9 देशों के 40 बड़े ऊर्जा भंडार क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।
गैस की कीमतें: यूरोप में गैस की कीमतें 35% तक बढ़ गई हैं, जबकि कतर से एलएनजी (LNG) की आपूर्ति बाधित होने से जापान को अपना रणनीतिक भंडार निकालना पड़ा है।
3. टेक जगत और सेमीकंडक्टर पर संकट
युद्ध का असर केवल तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपकी जेब में रखे स्मार्टफोन और एआई (AI) तकनीक तक पहुंच गया है:
हीलियम का संकट: कतर दुनिया की एक तिहाई हीलियम की आपूर्ति करता है, जो सेमीकंडक्टर चिप बनाने के लिए अनिवार्य है। यह सप्लाई 'होर्मुज जलडमरूमध्य' के बंद होने से ठप है।
एपल और एनवीडिया पर खतरा: ताइवान अपनी 97% ऊर्जा आयात करता है। ऊर्जा संकट के कारण ताइवान स्थित चिप निर्माण संयंत्र (Hsinchu) ठप होने की कगार पर हैं, जिससे एपल और एनवीडिया जैसी कंपनियों को अरबों का नुकसान हो रहा है।
4. नाटो और सहयोगियों का साथ न मिलना
ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति यहाँ कमजोर पड़ती दिखी:
अकेला पड़ा अमेरिका: ट्रंप के "कागजी शेर" जैसे कड़े संबोधनों के बावजूद नाटो (NATO) देशों ने इस युद्ध में अपने युद्धपोत भेजने से इनकार कर दिया।
खाड़ी देशों का दबाव: सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे एक पूर्ण युद्ध (Full-scale War) नहीं चाहते क्योंकि उनके अपने तेल क्षेत्र और बुनियादी ढांचे असुरक्षित हैं।
5. घरेलू लोकप्रियता में गिरावट
आमतौर पर युद्ध के समय अमेरिकी राष्ट्रपतियों की लोकप्रियता बढ़ती है, लेकिन ट्रंप के साथ उल्टा हो रहा है:
जनता का विरोध: अमेरिका में पेट्रोल के दाम 93 सेंट प्रति गैलन बढ़ गए हैं।
सर्वे के नतीजे: 66% अमेरिकी इसे ट्रंप की "अपनी मर्जी का युद्ध" मान रहे हैं और 60% लोग इसके सख्त खिलाफ हैं। ट्रंप की लोकप्रियता में युद्ध से कोई वृद्धि नहीं हुई है, जिससे उनकी राजनीतिक छवि को खतरा पैदा हो गया है।