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July 16 2026 03:32 am

3 साल में एक बार आती है यह महापुण्यदायी एकादशी, संतान सुख के लिए जरूर पढ़ें यह पौराणिक व्रत कथा, तभी पूरा होगा व्रत

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India News Live, Digital Desk : हिंदू धर्म में अधिकमास या मलमास का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है। इस पवित्र महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को पद्मिनी एकादशी या पुरुषोत्तमी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस साल यह दुर्लभ व्रत कल यानी 27 मई को रखा जा रहा है। चूंकि अधिकमास का संयोग हर तीन साल में एक बार बनता है, इसलिए यह एकादशी भी तीन साल में केवल एक बार ही भक्तों को पुण्य कमाने का अवसर देती है। शास्त्रों के अनुसार, पद्मिनी एकादशी का व्रत रखने से जीवन के सभी घोर संकट दूर हो जाते हैं और निसंतान दंपतियों को सर्वगुण संपन्न संतान की प्राप्ति होती है। हालांकि, सनातन परंपरा के अनुसार, इस दिन जब तक पद्मिनी एकादशी की पौराणिक व्रत कथा का पाठ न किया जाए या इसे सुना न जाए, तब तक भगवान विष्णु पूजा का पूरा फल स्वीकार नहीं करते हैं। 

जब प्रतापी राजा कृतवीर्य की एक हजार रानियों में से नहीं थी कोई संतान

पौराणिक कथा के अनुसार, त्रेतायुग में हैहय वंश के एक परम प्रतापी और न्यायप्रिय राजा कृतवीर्य महिष्मती पुरी पर राज करते थे। राजा के पास विशाल सेना, अथा वैभव, अटूट धन-दौलत और मान-सम्मान सब कुछ था; लेकिन उनके जीवन में सिर्फ एक ही सबसे बड़ा दुख था कि उनकी कोई संतान नहीं थी। राजा कृतवीर्य की एक हजार पत्नियां थीं, लेकिन किसी भी रानी की गोद सूनी ही रही। महिष्मती पुरी का शासन संभालने के लिए कोई उत्तराधिकारी न होने के कारण राजा और उनकी रानियां हमेशा गहरे अवसाद और चिंता में डूबे रहते थे। राजा ने संतान प्राप्ति के लिए हर संभव धार्मिक अनुष्ठान, औषधियां और उपाय किए, लेकिन सब निष्फल रहे।

जब राजपाठ छोड़कर गंधमादन पर्वत पर घोर तपस्या करने पहुंचे राजा और रानी

हर उपाय के फेल होने के बाद राजा कृतवीर्य ने अत्यंत दुखी होकर राजपाठ का पूरा जिम्मा अपने मंत्रियों को सौंप दिया और वन में जाकर घोर तपस्या करने का कड़ा फैसला लिया। राजा को अकेला न छोड़ने की कसम खाकर उनकी परम पतिव्रता पत्नी रानी पद्मिनी भी उनके साथ जाने को तैयार हो गईं। दोनों ने राजसी वस्त्रों का त्याग किया, योगी का वेश धारण किया और तपस्या करने के लिए गंधमादन पर्वत पर चले गए। राजा कृतवीर्य और रानी पद्मिनी ने वहां हजारों वर्षों तक अन्न-जल त्यागकर कठोर तप किया। इसके बावजूद भगवान प्रसन्न नहीं हुए और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हुई। राजा के शरीर को दुर्बल और उन्हें पूरी तरह निराश देखकर रानी पद्मिनी के सब्र का बांध टूट गया।

माता अनुसूया ने बताया तीन साल में एक बार आने वाले 'मलमास' का रहस्य

अपने पति की निराशा दूर करने के लिए रानी पद्मिनी महर्षि अत्रि की पत्नी और परम सती माता अनुसूया की शरण में पहुंचीं। रानी ने रोते हुए अपनी पूरी व्यथा सुनाई और पूछा, "हे माता! हमने हजारों वर्षों तक राजसी सुखों का त्याग कर कठिन तप किया, फिर भी हमारे त्याग में ऐसी क्या कमी रह गई कि ईश्वर हमें संतान का सुख नहीं दे रहे हैं? कृपा कर मुझे कोई ऐसा अचूक उपाय बताइए जिससे नारायण प्रसन्न हो जाएं।" रानी की करुण पुकार सुनकर माता अनुसूया ने उन्हें ढांढस बंधाया और मलमास का रहस्य खोलते हुए कहा, "हे पुत्री! हर 32 महीने के बाद एक अतिरिक्त मास आता है जिसे मलमास या अधिकमास कहते हैं। यह महीना भगवान पुरुषोत्तम (श्री हरि विष्णु) को अत्यंत प्रिय है। इस महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहते हैं। यदि तुम इस एकादशी का पूरे विधि-विधान से व्रत करोगी, तो भगवान विष्णु तुम्हें अवश्य ही एक ऐसा पुत्र देंगे जो सर्वगुण संपन्न और अजेय होगा।"

निर्जला व्रत और रात्रि जागरण से प्रकट हुए भगवान पुरुषोत्तम

माता अनुसूया के बताए मार्ग पर चलते हुए जैसे ही अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि आई, रानी पद्मिनी ने अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और कड़े नियमों के साथ व्रत का पालन किया। रानी ने पूरे दिन निर्जला (बिना पानी पिए) रहकर भगवान विष्णु की आराधना की और रात भर सोई नहीं, बल्कि प्रभु के भजनों के साथ रात्रि जागरण किया। रानी पद्मिनी के इस निश्छल, निस्वार्थ और अत्यंत कठिन व्रत को देखकर भगवान पुरुषोत्तम साक्षात रूप में प्रकट हो गए। भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे कल्याणी! मैं तुम्हारे इस अलौकिक व्रत और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूं। मांगो, तुम क्या वरदान चाहती हो?" रानी पद्मिनी ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से कहा, "हे जगत के स्वामी! यदि आप सचमुच मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरे स्थान पर मेरे स्वामी (राजा कृतवीर्य) की इच्छा पूरी कीजिए।"

भगवान के वरदान से हुआ लंकापति रावण को धूल चटाने वाले सहस्रार्जुन का जन्म

रानी की निस्वार्थ भावना देखकर भगवान विष्णु ने राजा कृतवीर्य से वरदान मांगने को कहा। राजा ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, "हे पालनहार! मुझे एक ऐसा प्रतापी पुत्र प्रदान करें जो तीनों लोकों में अजेय हो। जिसे देवता, मनुष्य, असुर या गंधर्व कोई भी पराजित न कर सके और जिसे केवल आपके ही किसी विशेष स्वरूप द्वारा जीता जा सके।" भगवान विष्णु ने 'तथास्तु' कहा और अंतर्ध्यान हो गए। पद्मिनी एकादशी व्रत के इसी महापुण्य के प्रभाव से समय आने पर रानी पद्मिनी ने एक अत्यंत ओजस्वी और महाप्रतापी पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम कार्तवीर्य अर्जुन (जिन्हें सहस्रार्जुन भी कहा जाता है) रखा गया। यह वही वीर बालक था जिसने आगे चलकर अपनी हजार भुजाओं के बल पर पूरे विश्व को जीत लिया था और जिसने लंकापति रावण को भी युद्ध में बंदी बना लिया था।