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September 04 2026 09:45 pm

नेपाल बाढ़ में 9 दिन तक मौत की सुरंग में फंसा रहा शख्स: भूख-प्यास और घुप अंधेरे के बीच लगातार करता रहा 'हरे कृष्ण' महामंत्र का जाप

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प्रकृति के विनाशकारी तांडव के आगे इंसान कितना लाचार हो जाता है, इसकी एक दिल दहला देने वाली बानगी नेपाल में देखने को मिली, लेकिन उसी लाचारी के बीच से जब इंसानी जज्बा और आस्था का अलौकिक चमत्कार फूटता है, तो पूरी दुनिया नतमस्तक हो जाती है। नेपाल में मूसलाधार मानसूनी बारिश के बाद आई प्रलयंकारी बाढ़ और भूस्खलन ने जब एक निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजना की सुरंग के मुहाने को सैकड़ों टन मलबे, भारी-भरकम बोल्डर्स और गाद से पूरी तरह सील कर दिया, तो अंदर काम कर रहा एक शख्स जमीन के दर्जनों फीट नीचे जिंदा दफन हो गया। बाहर दुनिया उसे मृत मान चुकी थी और परिजनों के आंसू सूख चुके थे, लेकिन जमीन के नीचे जिंदगी और मौत के बीच 9 दिनों यानी पूरे 216 घंटे तक एक ऐसी जंग लड़ी जा रही थी, जिसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

हादसा इतनी तेजी से हुआ कि अंदर मौजूद मजदूर को बाहर भागने का एक सेकंड का भी मौका नहीं मिला। पहाड़ी का एक विशालकाय हिस्सा टूटकर सीधे टनल के प्रवेश द्वार पर आ गिरा, जिससे बिजली की लाइनें कट गईं, बैकअप जनरेटर तबाह हो गए और चारों तरफ घुप, डरावना अंधेरा छा गया। बाहर मूसलाधार बारिश का शोर था और अंदर सिर्फ मौत का साया। हवा में ऑक्सीजन का स्तर धीरे-धीरे गिरने लगा था और चट्टानों की दरारों से रिसता हुआ बर्फीला गंदा पानी सुरंग की दीवारों से बह रहा था। कोई साधारण इंसान शायद 48 घंटों में ही दम तोड़ देता या डर के मारे मानसिक संतुलन खो बैठता, लेकिन इस शख्स ने अपने मन को टूटने नहीं दिया।

भूख, प्यास और घुटन के बीच 'हरे कृष्ण' महामंत्र: जब अंधकार में जगी अध्यात्म की रोशनी

चारों तरफ पसरे सन्नाटे और हड्डियों को कंपा देने वाली ठंड के बीच जब बचने की सारी सांसारिक उम्मीदें टूटने लगीं, तो उस मजदूर ने अपना ध्यान ईश्वर की ओर मोड़ दिया। उसने तय किया कि वह निराशा और खौफ के आगे आत्मसमर्पण नहीं करेगा। उसने सुरंग के एक सूखे कोने में पत्थरों के सहारे बैठकर आंखें बंद कर लीं और मन ही मन 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।' महामंत्र का निरंतर जाप शुरू कर दिया।

मेडिकल और मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, अत्यधिक दबाव और तन्हाई के माहौल में जब मस्तिष्क भय की चरम सीमा पर होता है, तब दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं और शरीर तेजी से ऑक्सीजन खर्च करने लगता है। मंत्रोच्चार ने उसके दिलो-दिमाग को एक स्थिर ध्यान की अवस्था (Meditation) में पहुंचा दिया। इससे उसकी श्वसन दर धीमी हो गई, जिससे संकरे स्थान में उपलब्ध बची-खुची ऑक्सीजन का क्षय बहुत कम हुआ। जब भूख की तड़प बर्दाश्त से बाहर होने लगती, तो वह ईश्वर का ध्यान करता। जब हलक सूखकर कांटा हो जाता, तो वह चट्टानों से बूंद-बूंद टपकते भूमिगत पानी को अपनी हथेलियों में सहेजकर अपनी जीभ गीली कर लेता था। उसने पूरे 9 दिन बिना अन्न के दाने के सिर्फ इस अटूट विश्वास के सहारे काटे कि कन्हैया उसे इस पाताल से बाहर जरूर निकालेंगे।

बाहर मलबे को चीरती ड्रिलिंग मशीनें: नेपाल सेना और रेस्क्यू टीमों की 24 घंटे की जंग

जमीन के ऊपर हालात किसी युद्धक्षेत्र से कम नहीं थे। जैसे ही सुरंग के धंसने की खबर मिली, नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल (APF) और स्थानीय आपदा प्रबंधन दस्तों ने भारी इंजीनियरिंग मशीनों के साथ मोर्चा संभाल लिया। लेकिन राहत अभियान में सबसे बड़ी बाधा लगातार हो रही मूसलाधार बारिश और ऊपर से गिरते ताजे मलबे की थी। भारी एस्कैवेटर और पोकलेन मशीनों का जरा सा भी कंपन बची हुई सुरंग को पूरी तरह ध्वस्त कर सकता था, जिससे अंदर फंसे शख्स की जान को तुरंत खतरा पैदा हो जाता।

भू-वैज्ञानिकों और टनल इंजीनियरों ने जोखिम का सटीक आकलन करने के बाद होरिजेंटल ड्रिलिंग और केसिंग पाइप तकनीक का सहारा लिया। मेटल डिटेक्टर्स, ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार और अत्यंत संवेदनशील माइक्रोफोन्स की मदद से मलबे के आर-पार ध्वनि तरंगों को पकड़ने की कोशिश की जाने लगी। बचाव दल के जवानों ने रात-दिन एक कर दिया। लगातार 24 घंटे बिना थके ड्रिलिंग जारी रखी गई। पत्थरों के बीच बार-बार लोहे की सरिया फंस रही थी, जिसे गैस कटर से काटकर धीरे-धीरे रास्ता बनाया जा रहा था। बाहर जमा परिजनों की प्रार्थनाएं और बचाव दल की अथक मेहनत मिलकर उस दुर्गम पहाड़ को चीरने में लगी थीं।

जब संकरे छेद से अंदर पहुंची पहली रोशनी: 'कृष्णा ने सुन ली पुकार'

बचाव अभियान के आठवें दिन की शाम रेस्क्यू टीम को वो सफलता मिली जिसका सबको बेसब्री से इंतजार था। एक 4 इंच चौड़ा लाइफलाइन पाइप मलबे को भेदता हुआ सीधे उस हिस्से तक पहुंच गया जहां मजदूर फंसा हुआ था। जैसे ही पाइप के जरिए अंदर हाई-प्रेशर ऑक्सीजन छोड़ी गई और एक माइक्रो-कैमरा व वायरलेस स्पीकर अंदर डाला गया, तो दूसरी तरफ से धीमी सी आवाज आई— "हरे कृष्णा..."।

यह सुनते ही कंट्रोल रूम में मौजूद सेना के अधिकारियों और इंजीनियरों की आंखों में आंसू आ गए। 8 दिनों से मौत के जबड़े में फंसे रहने के बावजूद उस शख्स की आवाज में एक अलौकिक ठहराव था। डॉक्टरों की टीम ने तुरंत पाइप के जरिए ग्लूकोज का पानी, ओआरएस का घोल और जीवनरक्षक तरल पोषक तत्व अंदर भेजे। पाइप से बाहर आ रही आवाज ने बताया कि वह पूरी तरह होश में है और उसने इन आठ दिनों में अपने मंत्र के जाप को एक क्षण के लिए भी नहीं रोका। इस संपर्क ने बाहर खड़ी रेस्क्यू टीम के हौसले को दोगुना कर दिया और निकासी पाइप डालने के काम में दुगनी रफ्तार से जवान जुट गए।

जन्माष्टमी की सुबह हुआ अलौकिक चमत्कार: जब मलबे से बाहर आई सांसें

संयोग देखिए कि जिस दिन उसे बाहर निकालने के लिए अंतिम ऑपरेशन पूरा हुआ, उस दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व 'जन्माष्टमी' था। नौवें दिन की तड़के 800 एमएम की स्टील एस्केप पाइपलाइन को मलबे के पार सफलतापूर्वक धकेल दिया गया। सेना के दो प्रशिक्षित जवान ऑक्सीजन किट और सुरक्षा रस्सियों के साथ पाइप के जरिए रेंगते हुए अंदर पहुंचे। उन्होंने मजदूर को सुरक्षित स्ट्रेचर बेल्ट में बांधा और सावधानीपूर्वक बाहर खींचना शुरू किया।

जैसे ही जन्माष्टमी की सुबह सूरज की पहली किरण ने बादलों को चीरा, उस मजदूर को सुरंग के मुहाने से बाहर निकाला गया। बाहर आते ही वहां मौजूद सैकड़ों स्थानीय ग्रामीणों, जवानों और अधिकारियों ने एक सुर में "जय श्री कृष्णा" और "हर हर महादेव" के जयकारे लगाए। पूरे माहौल में एक असीम आध्यात्मिक ऊर्जा फैल गई। 9 दिनों तक घने अंधेरे में रहने के कारण उसकी आंखों को स्थायी नुकसान न पहुंचे, इसलिए बाहर लाते ही उसकी आंखों पर तुरंत काली पट्टी बांध दी गई। जब उसने अपने कांपते हाथों से पास खड़े सैन्य अधिकारी का हाथ थामा, तो उसने सिर्फ इतना कहा, "मेरे ठाकुर जी ने मेरी सुन ली, उन्होंने मुझे मरने नहीं दिया।"

डॉक्टरों ने माना आत्मबल का कमाल: आस्था, विज्ञान और इंसानी जज्बे का ऐतिहासिक संगम

मजदूर को तुरंत सेना के फील्ड अस्पताल और बाद में विशेष आईसीयू में स्थानांतरित किया गया, जहां डॉक्टरों के एक विशेष बोर्ड ने उसकी सघन जांच की। मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने मेडिकल बुलेटिन में बताया कि 9 दिनों तक बिना भोजन और नाममात्र पानी के रहने के कारण मरीज गंभीर रूप से डिहाइड्रेटेड था और उसकी मांसपेशियों में अत्यधिक कमजोरी आ गई थी, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उसके वाइटल पैरामीटर्स, हृदय गति और आंतरिक अंग पूरी तरह सुरक्षित थे।

डॉक्टरों ने इसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के नजरिए से भी एक असाधारण केस माना है। मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि जब कोई व्यक्ति ध्यान और मंत्रोच्चार की गहरी अवस्था में होता है, तो उसका शरीर 'हाइबरनेशन जैसी मेटाबॉलिक स्टेट' में चला जाता है, जिससे ऊर्जा की खपत न्यूनतम स्तर पर आ जाती है। यह घटना सिर्फ एक बचाव अभियान की सफलता नहीं है, बल्कि यह इस बात का जीवित प्रमाण है कि जब इंसान के सामने मौत खड़ी हो, तो विज्ञान की आधुनिक तकनीक और ईश्वर के प्रति अटूट आस्था का संगम बड़े से बड़े असंभव को भी संभव बना सकता है। नेपाल की इस खौफनाक त्रासदी के बीच से निकली यह कहानी युगों-युगों तक मानव जाति को सिखाती रहेगी कि जब तक सांस है, तब तक विश्वास कभी नहीं छोड़ना चाहिए।