त्रेता युग से चली आ रही है हरतालिका तीज व्रत की पावन परंपरा: जानें किन 5 विशेष चीजों के दान से मिलेगा अखंड सौभाग्य
सनातन परंपरा में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर मनाया जाने वाला हरतालिका तीज का महापर्व केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि युगों-युगों से चली आ रही कठोर साधना, संकल्प और निष्ठा का आध्यात्मिक प्रतीक है। आज 14 सितंबर 2026, सोमवार के पावन दिन सुहागिन महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य की कामना से निर्जला व्रत रख रही हैं। धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, यह व्रत आज से नहीं बल्कि त्रेता युग से चला आ रहा है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि जब तक किसी महान अनुष्ठान में अपनी सामर्थ्य अनुसार दान-पुण्य न किया जाए, तब तक उस व्रत की पूर्ण फलश्रुति प्राप्त नहीं होती।
त्रेता युग से जुड़ा है हरतालिका तीज व्रत का इतिहास
पौराणिक मान्यताओं और शिवपुराण के प्रसंगों के अनुसार, हरतालिका तीज व्रत की परंपरा का आरंभ सतयुग और त्रेता युग के संधिकाल से माना जाता है। देवी सती के भस्म होने के पश्चात जब उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में दूसरा जन्म लिया, तब उन्होंने भगवान शिव को पुनः पति के रूप में प्राप्त करने के लिए बाल्यावस्था से ही मौन और कठिन तप प्रारंभ किया था।
त्रेता युग में भगवान श्रीराम के अवतरण काल में भी माता जानकी (सीता जी) द्वारा गिरिजा पूजन (माता पार्वती की आराधना) का उल्लेख मिलता है, जिसमें मनचाहा और सर्वगुण संपन्न वर पाने के लिए माता गौरी की वंदना की गई थी। माता पार्वती ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन घने बीहड़ वन में हस्त नक्षत्र के दौरान नदी की पवित्र बालू से पार्थिव शिवलिंग बनाकर निराहार और निर्जला तप किया था। इस कठोर तप की ऊर्जा से देवाधिदेव महादेव का कैलाशी सिंहासन डोल उठा था और उन्होंने प्रकट होकर माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया था। उसी काल से इस दिन मिट्टी के शिव परिवार की पूजा और परोपकारार्थ दान की शास्त्रीय परंपरा अखंड रूप से चली आ रही है।
हरतालिका तीज पर दान का शास्त्रीय महत्व
सनातन धर्म में किसी भी निर्जला व्रत की पूर्णता उसके अगले दिन किए जाने वाले पारण और दान से ही सिद्ध होती है। 'दानं दुर्गतिनाशनम्' अर्थात् दान मनुष्य की दुर्गति और दरिद्रता का नाश करता है। हरतालिका तीज के दिन सुहाग की वस्तुएं और जीवनोपयोगी सामग्री दान करने से माता पार्वती और भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे दांपत्य जीवन के कलह समाप्त होते हैं और परिवार में सुख, शांति तथा आर्थिक संपन्नता का वास होता है।
सुहाग सामग्री (सुहाग पिटारी) का दान
हरतालिका तीज पर सबसे प्रमुख और फलदायी दान सुहाग की सामग्रियों का माना गया है। माता पार्वती को सोलह श्रृंगार अर्पित करने के बाद यह सामग्री किसी सुयोग्य ब्राह्मणी, सास, जेठानी या किसी जरूरतमंद सुहागिन महिला को ससम्मान भेंट की जाती है।
सुहाग पिटारी में मुख्य रूप से लाल चुनरी, सिंदूर, हरी कांच की चूड़ियां, बिंदी, आलता, मेंहदी, काजल, कुमकुम, शीशा, कंघी और बिछिया रखी जाती है। मान्यता है कि सौभाग्य सामग्री का दान करने से पति की अकाल मृत्यु का भय टलता है और दांपत्य जीवन में आजीवन प्रेम बना रहता है।
वस्त्र और परिधान का दान
हरतालिका तीज के पावन अवसर पर वस्त्र दान करने से जातक के जीवन में भौतिक सुख-समृद्धि और मान-सम्मान की वृद्धि होती है। इस दिन किसी सुहागिन महिला को लाल, पीली या हरे रंग की नई साड़ी अथवा पारंपरिक वस्त्र दान करना अति उत्तम माना गया है। इसके साथ ही भगवान शिव के निमित्त किसी ब्राह्मण को धोती, कुर्ता या उत्तरीय (अंगवस्त्र) दान किया जा सकता है। विशेष रूप से ध्यान रखें कि दान में कभी भी काले, नीले या कटे-फटे वस्त्र न दें।
अन्न और अनाज का दान
अन्नदान को महादान कहा गया है। हरतालिका तीज के व्रत के समापन पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार सात प्रकार के अनाज (सप्तधान्य) या गेहूं, चावल, दाल और आटे का दान करना चाहिए। विशेषकर कच्चे चावल और सफेद दाल का दान चंद्र और शुक्र ग्रह के दोषों को शांत करता है। मान्यता है कि तीज के दिन भूखे और जरूरतमंद लोगों को अन्न या भोजन कराने से घर के अन्नपूर्णा भंडार सदैव भरे रहते हैं और आर्थिक तंगी दूर होती है।
मौसमी फल, मिठाई और दही का दान
पूजा के पश्चात ऋतुफल जैसे केला, सेब, नाशपाती, अनार और शरीफा (सीताफल) का दान करना बेहद शुभकारी माना गया है। इसके अतिरिक्त शुद्ध घी से बने मिष्ठान्न, गुझिया, ठेकुआ और खीर का भोग लगाकर ब्राह्मणों व निर्धनों में वितरित करने से घर में मधुरता और खुशहाली आती है। सोमवार के दिन तीज होने के कारण दही या दूध का दान करने से शीतलता, मानसिक शांति और वैवाहिक जीवन में स्थिरता प्राप्त होती है।
यथाशक्ति दक्षिणा और धातु का दान
दान की गई किसी भी सामग्री की पूर्णता दक्षिणा के बिना नहीं मानी जाती। अतः अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार सुहाग पिटारी या वस्त्रों के साथ कुछ नकद दक्षिणा अवश्य रखें। जो जातक आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे चांदी की बिछिया, पायल या कांसे के बर्तन का दान भी कर सकते हैं। दान देते समय मन में किसी प्रकार का अहंकार या दिखावे का भाव नहीं होना चाहिए, बल्कि केवल श्रद्धा, समर्पण और सेवा का भाव ही सर्वोपरि माना गया है।