श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के तुरंत बाद आ रही है बेहद खास अजा एकादशी, जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त
देशभर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व बेहद धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। द्वापर युग में भगवान श्रीहरि विष्णु के पूर्ण अवतार माने जाने वाले श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव हर भक्त के जीवन में एक नई ऊर्जा और भक्ति का संचार करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने इस अवतार के दौरान कंस समेत कई कुख्यात राक्षसों और अधर्मियों का संहार कर धरती पर धर्म की स्थापना की थी। जन्माष्टमी के इस आनंद और उल्लास के माहौल के बीच अब सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और श्रीहरि को प्रिय व्रत आने वाला है। हिंदू पौराणिक मान्यताओं और धर्मग्रंथों के अनुसार, जो भी मनुष्य विधि-विधान के साथ एकादशी का व्रत पूर्ण निष्ठा से करता है, वह भगवान श्रीहरि का अतिप्रिय बन जाता है। पुराणों में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि समस्त मासों में कार्तिक मास और सभी व्रतों में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को सबसे अधिक प्रिय है। यही कारण है कि प्रत्येक मास में आने वाली एकादशी तिथियों का सनातन संस्कृति में विशेष स्थान है। एक वर्ष में कुल 12 मुख्य एकादशियां होती हैं, और अब भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की प्रसिद्ध 'अजा एकादशी' का आगमन होने जा रहा है। इस लेख में हम आपको अजा एकादशी की सही तिथि, मुहूर्त, नक्षत्र योग, पारण का समय और इसके धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं।
हिंदू पंचांग और गणना के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 6 सितंबर की शाम 07:29 बजे से हो जाएगा। यह तिथि अगले दिन यानी 7 सितंबर की शाम 05:03 बजे तक प्रभावी रहेगी, जिसके तुरंत बाद द्वादशी तिथि का आरंभ हो जाएगा। चूंकि उदया तिथि और द्वादशी युक्त तिथि का संयोग 7 सितंबर को प्राप्त हो रहा है, इसलिए व्रत रखने की मुख्य तिथि 7 सितंबर ही निर्धारित की गई है। इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को सूर्योदय के बाद उदया तिथि के नियमों का पालन करते हुए श्रीहरि विष्णु की आराधना करनी चाहिए। पंचांगीय गणना के अनुसार इस दिन कई दुर्लभ और शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जो इस व्रत के पुण्य फल को कई गुना बढ़ा देते हैं।
इस वर्ष अजा एकादशी के दिन कई पावन नक्षत्रों और योगों का अद्भुत संयोग बन रहा है, जो इसे ज्योतिषीय और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है। 7 सितंबर को पड़ने वाली इस एकादशी पर पुनर्वसु नक्षत्र के साथ-साथ अत्यंत शुभ पुष्य नक्षत्र का योग भी रहेगा। पुष्य नक्षत्र को सभी नक्षत्रों में राजा और अत्यंत पवित्र माना गया है, जिसमें किया गया पूजन और अनुष्ठान अक्षय फल प्रदान करता है। इसके साथ ही, इस दिन सुबह 06:40 बजे तक व्यातीपात योग रहेगा, जिसके पश्चात अत्यंत मंगलकारी वरीयान योग का आरंभ हो जाएगा। इन सभी शुभ योगों और नक्षत्रों की उपस्थिति के कारण इस बार की अजा एकादशी का प्रभाव कई गुना अधिक शक्तिशाली माना जा रहा है, जिससे साधक को मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और भगवान विष्णु की असीम कृपा की प्राप्ति होती है।
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को ही 'अजा एकादशी' के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने अपने जीवन में तमाम विकट परिस्थितियों और संकटों का सामना करने के बावजूद कभी भी सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा। वे अपने वचनों पर अडिग रहे, जिसके फलस्वरूप उन्हें अपने राजपाट और वैभव का त्याग तक करना पड़ा था। कथाओं में उल्लेख मिलता है कि राजा हरिश्चंद्र का कल्याण और उनके समस्त संकटों का निवारण इसी अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से संभव हो सका था। भाद्रपद मास में मुख्य रूप से दो एकादशियां आती हैं—एक अजा एकादशी और दूसरी पद्मा एकादशी। ये दोनों ही व्रत सनातन धर्म में भक्तों के समस्त पापों का नाश करने वाले और मोक्ष प्रदान करने वाले बताए गए हैं। इस दिन जो भी मनुष्य पूरी श्रद्धा, नियम और संयम के साथ भगवान विष्णु का पूजन और व्रत संपन्न करता है, उसके पूर्व जन्म के और वर्तमान जीवन के सभी ज्ञात-अज्ञात पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के उपरांत उसे विष्णु लोक में स्थान प्राप्त होता है।
किसी भी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण सही समय और नियमों के अनुसार किया जाए। अजा एकादशी व्रत का पारण अगले दिन यानी 8 सितंबर को किया जाएगा। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले सुबह के समय स्नान-ध्यान के बाद ब्राह्मण को भोजन या दान देकर तथा सात्विक आहार ग्रहण करके अपने व्रत का पारण करना चाहिए। एकादशी के दिन अन्न का सेवन वर्जित माना जाता है और इस दिन केवल फलाहार या निर्जल/जलीय उपवास रखते हुए भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करना चाहिए। श्रीहरि की कृपा पाने के लिए इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी के पत्तों का विशेष महत्व होता है, इसलिए पूजा के दौरान प्रसाद में तुलसी दल अवश्य शामिल करें। भाद्रपद मास की यह अजा एकादशी हर भक्त के जीवन में सकारात्मकता, संयम और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास जगाने का एक बेहतरीन अवसर लेकर आती है।