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September 04 2026 04:09 pm

मध्यरात्रि में नहीं कर पा रहे हैं लड्डू गोपाल की पूजा? जानिए पंडित जी से क्या करें अचूक उपाय और सभी शुभ मुहूर्त

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सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव यानी श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के पावन संयोग पर इस महाउत्सव का आयोजन किया जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में इस पर्व को गोकुल अष्टमी के रूप में भी पूरी भव्यता के साथ मनाया जाता है। यह पावन पर्व भगवान विष्णु के आठवें पूर्ण अवतार श्री कृष्ण के धरा धाम पर अवतरण का प्रतीक है। द्रिक पंचांग और पौराणिक गणनाओं के अनुसार, इस वर्ष भगवान श्रीकृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव मनाया जा रहा है, जो सनातन प्रेमियों के लिए एक बेहद दुर्लभ और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध अवसर है। इस दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की विधिवत मध्यरात्रि में पूजा-अर्चना करते हैं, व्रत रखते हैं और अपने घरों व मंदिरों को भव्य रूप से सजाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्माष्टमी की पूजा के लिए मध्यरात्रि में अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र का विद्यमान होना सबसे अधिक कल्याणकारी और फलदायी माना जाता है, क्योंकि इसी दिव्य संयोग में द्वापर युग में कान्हा ने कारागार में जन्म लिया था। इस बार कई वर्षों के लंबे अंतराल के बाद यह विशेष और दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे भक्तों में अभूतपूर्व उत्साह देखा जा रहा है। हालांकि, आधुनिक जीवनशैली, व्यस्तताओं या किसी अन्य विपरीत परिस्थिति के कारण कई बार ऐसा भी होता है कि भक्तगण जन्माष्टमी की मध्यरात्रि में ठीक 12 बजे पूजा संपन्न नहीं कर पाते हैं। ऐसे में मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि रात के समय पूजन न हो सके, तो इस स्थिति में क्या करना चाहिए और भगवान की कृपा कैसे प्राप्त की जा सकती है।

प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य और पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, इस वर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 4 सितंबर को तड़के सुबह 02 बजकर 25 मिनट पर हो चुका था। इस तिथि का समापन 4 सितंबर की मध्यरात्रि यानी 5 सितंबर की शुरुआत में ठीक 12 बजकर 13 मिनट पर हुआ। इसके साथ ही, यदि रोहिणी नक्षत्र की बात की जाए, तो रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर को देर रात 12:29 बजे से आरंभ हुआ था और इसका समापन 4 सितंबर की रात 11 बजकर 04 मिनट पर हुआ। शास्त्रों के अनुसार अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का यह अनूठा संगम पूजा-पाठ और अनुष्ठानों के लिए अत्यंत शक्तिशाली फल प्रदान करने वाला माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का यह समय भक्तों को आत्मिक शुद्धि और मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। इस दौरान किए गए जप, तप, व्रत और दान का कई गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है, जो मनुष्य के जीवन के सभी कष्टों और पापों का नाश कर देता है।

पंडित नरेंद्र उपाध्याय का मार्गदर्शन है कि यूं तो जन्माष्टमी की पूजा के लिए सबसे उपयुक्त और श्रेष्ठ समय मध्यरात्रि यानी रात 12 बजे के बाद का ही होता है, क्योंकि शास्त्रों और पुराणों में यही वर्णित है कि इसी विशिष्ट समय पर भगवान कान्हा का प्राकट्य हुआ था। परंतु यदि किसी कारणवश विपरीत परिस्थितियों के चलते निशिता काल या मध्यरात्रि में पूजन कर पाना पूरी तरह से असंभव हो जाता है, तो भक्तों को घबराने या निराश होने की आवश्यकता नहीं है। इस स्थिति में जन्माष्टमी का पूजन दिन के समय, सायं काल या रात के किसी भी अन्य शुभ मुहूर्त में पूरी श्रद्धा के साथ किया जा सकता है। सनातन धर्म में भाव और भक्ति को सबसे बड़ा आधार माना गया है, इसलिए समय की बाध्यता से अधिक आपकी सच्ची निष्ठा मायने रखती है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में भद्रा, पंचक और राहुकाल का विचार करना अनिवार्य माना जाता है। इस पावन अवसर पर भद्रा और पंचक का कोई भी अशुभ प्रभाव पूजा में बाधा उत्पन्न नहीं करेगा, हालांकि दिन के समय राहुकाल अपनी अवधि में विद्यमान रहेगा। राहत की बात यह है कि मध्यरात्रि यानी निशिताकाल के समय राहुकाल किसी भी प्रकार की बाधा नहीं बनता है। यदि आप किसी कारणवश निशिताकाल में पूजा करने से चूक जाते हैं, तो उस निश्चित समय पर भगवान श्रीकृष्ण का मानसिक स्मरण करें और मन ही मन उन्हें साष्टांग प्रणाम अवश्य करें। सच्ची भावना से किया गया स्मरण भी प्रत्यक्ष पूजा के समान ही फलदायी होता है।

पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, जन्माष्टमी की मुख्य पूजा के लिए निशिताकाल मुहूर्त बहुत ही संक्षिप्त लेकिन अत्यधिक प्रभावशाली होता है। इस वर्ष निशिताकाल मुहूर्त रात 11 बजकर 57 मिनट से शुरू होकर रात 12 बजकर 23 मिनट तक रहेगा। यह चंद मिनटों की अवधि जन्माष्टमी की मुख्य पूजा और जन्मोत्सव मनाने के लिए अति उत्तम और सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। इसके अलावा, यदि कोई भक्त इस निशिताकाल में पूजा न कर पाए, तो दिन के अन्य शुभ मुहूर्तों का लाभ उठाया जा सकता है। पंचांग के अनुसार अभिजित मुहूर्त दोपहर 01:23 बजे से दोपहर 02:16 बजे तक रहेगा। इसके साथ ही विजय मुहूर्त शाम 04:02 बजे से शाम 04:55 बजे तक, गोधूलि मुहूर्त रात 08:27 बजे से रात 08:48 बजे तक, सायाह्न सन्ध्या रात 08:27 बजे से रात 09:31 बजे तक और अमृत काल शाम 04:33 बजे से शाम 06:03 बजे तक उपलब्ध रहेगा। इन सभी मुहूर्तों में भक्त अपनी सुविधा के अनुसार बाल गोपाल का अभिषेक और श्रृंगार कर सकते हैं।

धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से राहुकाल को किसी भी शुभ कार्य या नई शुरुआत के लिए अनुकूल नहीं माना जाता है। इस अवधि में किए गए कार्यों का सकारात्मक परिणाम मिलने में बाधा आती है। इस वर्ष जन्माष्टमी के दिन राहुकाल दोपहर 12 बजकर 10 मिनट से शुरू होकर दोपहर 01 बजकर 49 मिनट तक रहेगा। इसलिए सभी श्रद्धालुओं को सलाह दी जाती है कि वे राहुकाल की इस अवधि के दौरान कोई भी नया या मांगलिक कार्य अथवा मुख्य पूजा करने से बचें। यदि आप दिन के समय पूजा करना चाहते हैं, तो राहुकाल के समय को छोड़कर अन्य अभिजित या अमृत काल जैसे शुभ मुहूर्तों का चयन करें। भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का एक पावन माध्यम है। यदि आप विधि-विधान का पूरा पालन करते हुए भी किसी बाधा के कारण रात में पूजा नहीं कर पाए हैं, तो प्रेम भाव से भगवान को भोग लगाएं और क्षमा प्रार्थना करते हुए उनका आशीर्वाद प्राप्त करें, क्योंकि कान्हा अपने भक्तों के भाव के भूखे होते हैं, आडंबर के नहीं।