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September 06 2026 06:02 pm

जंतर-मंतर पर युवाओं पर लाठीचार्ज को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने जताई गहरी निराशा

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लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों और युवाओं पर पुलिसिया बल प्रयोग को लेकर न्यायपालिका ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुए लाठीचार्ज की घटना पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने गहरा दुख और चिंता व्यक्त की है। उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा कि अपने अधिकारों की आवाज उठा रहे निहत्थे छात्रों पर इस प्रकार का अत्याचार बेहद निराशाजनक है और पुलिस बल से जिस बुनियादी निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है, वह आज तेजी से गायब होती नजर आ रही है।

जस्टिस उज्जल भुइयां राजधानी के वायसराय हॉल में पूर्व सचिव (सुरक्षा) यशोवर्धन आजाद द्वारा लिखित एक पुस्तक के विमोचन समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने कानून के शासन, लोकतांत्रिक अधिकारों और पुलिस की बदलती कार्यशैली पर गंभीर चिंताएं जाहिर कीं।

'अगर अधिकारी ही कानून तोड़ने लगें तो फैलेगी अराजकता'

जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में पुलिस प्रशासन को कर्तव्य और मर्यादा का पाठ पढ़ाते हुए कहा:

निष्पक्षता का गुण गायब होना चिंताजनक: उन्होंने कहा, "पुलिस अधिकारियों से जिस तटस्थता और निष्पक्षता की समाज उम्मीद करता है, वह पूरी तरह से गायब नजर आ रही है, जो कि हमारे लोकतंत्र के लिए बेहद गंभीर चिंता का विषय है। पुलिस का पहला धर्म कानून के दायरे में रहकर निष्पक्ष काम करना है। प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज की घटना अत्यंत परेशान करने वाली थी। प्रदर्शनकारियों के साथ इस प्रकार का बर्ताव किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहराया जा सकता।""

अराजकता को बढ़ावा मिलेगा: सुप्रीम कोर्ट के जज ने आगाह किया कि यदि सरकार के अधिकारी और कानून लागू करने वाली एजेंसियां ही स्वयं नियमों व मर्यादाओं को तोड़ने लगेंगी, तो इससे आम जनता के मन में कानून के प्रति अनादर की भावना पैदा होगी। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति समाज को अराजकता की ओर धकेलती है और कोई भी सभ्य देश इसे स्वीकार नहीं कर सकता।

सीजेआई सूर्यकांत भी जता चुके हैं विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर सहमति

छात्रों और युवाओं के विरोध प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकारों को लेकर न्यायपालिका का रुख लगातार स्पष्ट रहा है:

विरोध का लोकतांत्रिक अधिकार: इससे पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने भी छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन के अधिकार का समर्थन करते हुए साफ किया था कि लोकतांत्रिक देश में युवाओं को अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताने का पूरा संवैधानिक अधिकार है।

'आंदोलन का मतलब लाठीचार्ज नहीं': शीर्ष अदालत ने एक सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी में भी कहा था कि केवल आंदोलन या विरोध करने भर से पुलिस को लाठीचार्ज करने का अधिकार नहीं मिल जाता।

छात्रों के भविष्य की सुरक्षा: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए प्रदर्शनकारी छात्रों के भविष्य को देखते हुए दर्ज मुकदमों और एफआईआर को लेकर भी राहत भरी दिशा-निर्देश जारी किए थे।

जस्टिस उज्जल भुइयां का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश के विभिन्न हिस्सों में छात्र आंदोलनों और पुलिस के बल प्रयोग के बीच के संतुलन पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ी हुई है। न्यायपालिका की इस दो-टूक नसीहत ने यह साफ संदेश दिया है कि वर्दी की ताकत कानून और संविधान के मूल सिद्धांतों से ऊपर कभी नहीं हो सकती।