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September 07 2026 07:06 pm

'अगर राजनीतिक ताकत ही सब कुछ होती तो अमेठी कभी नहीं जाती': चुनाव हारने के बाद राज्यसभा न जाने पर स्मृति ईरानी ने तोड़ी चुप्पी

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2019 में कांग्रेस के अभेद्य दुर्ग अमेठी को भेदकर राष्ट्रीय स्तर पर इतिहास रचने वाली और 2024 के लोकसभा चुनाव में सियासी उलटफेर का सामना करने वाली पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को लेकर राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह सवाल गूंज रहा था कि हार के बाद भाजपा आलाकमान ने उन्हें तुरंत राज्यसभा के रास्ते संसद क्यों नहीं भेजा? हाल ही में पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त की गईं स्मृति ईरानी ने एक विस्तृत पॉडकास्ट साक्षात्कार में इस सवाल पर खुलकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारतीय जनता पार्टी में संगठन की सेवा और कार्यकर्ता का दायित्व किसी भी संवैधानिक या विधायी पद से कहीं बड़ा होता है। इसके साथ ही उन्होंने दो टूक कहा कि यदि उनके लिए केवल 'राजनीतिक ताकत' ही सब कुछ होती, तो वे कभी अमेठी जैसी जोखिम भरी सीट पर पैर ही नहीं रखतीं।

'अगर ताकत ही मकसद होती, तो अमेठी कभी नहीं जाती': स्मृति ईरानी

स्मृति ईरानी से जब सीधा सवाल पूछा गया कि 2011 से 2019 तक राज्यसभा सांसद रहने के बाद, जब 2024 के चुनाव में उन्हें पराजय मिली तो पार्टी ने उन्हें ऊपरी सदन में क्यों नहीं भेजा?

इस पर जवाब देते हुए स्मृति ईरानी ने कहा:

ऐतिहासिक रूप से 'लूजिंग सीट' थी अमेठी: "यदि मेरे लिए केवल राजनीतिक रसूख, कुर्सी और ताकत ही सबसे महत्वपूर्ण होती, तो मैं कभी भी अमेठी चुनाव लड़ने नहीं जाती। अमेठी ऐतिहासिक रूप से भारतीय जनता पार्टी के लिए एक हारी हुई सीट (Losing Seat) मानी जाती थी। वहां जाकर मैंने सबसे बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाया था।"

चुनौतियों से भागने की आदत नहीं: उन्होंने स्पष्ट किया कि वे सुरक्षित रास्तों से संसद पहुंचने की राजनीति नहीं करतीं। उन्होंने अपने जीवन के दस साल अमेठी की जमीन पर संगठन खड़ा करने और जनता की सेवा करने में दिए। चुनाव में जीत और हार लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हर हार के तुरंत बाद पिछले दरवाजे से पद हासिल करने की होड़ लगाई जाए।

'भाजपा में पद से बड़ा होता है संगठन का काम'

स्मृति ईरानी ने अपने राजनीतिक सफर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि वे एक विशुद्ध और पक्की भाजपा कार्यकर्ता हैं। उन्होंने समझाया कि आरएसएस और भाजपा की सांगठनिक कार्यशैली में किसी पद को निजी हैसियत का पैमाना नहीं माना जाता, बल्कि उसे सिर्फ काम का एक जरिया समझा जाता है।

देवेंद्र फडणवीस के साथ युवा मोर्चा के दिन: उन्होंने याद किया कि वर्ष 2003 में वे महाराष्ट्र भाजपा युवा मोर्चा में पदाधिकारी बनी थीं और उस समय उनके साथ संगठन में देवेंद्र फडणवीस भी काम कर रहे थे।

उन्होंने कहा, "उस समय हम प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे जैसे दिग्गजों को देखकर सीखते थे। आज जब मैं और देवेंद्र फडणवीस मिलते हैं, तो उन पुराने दिनों को याद करके हंसते हैं कि हमने कभी नहीं सोचा था कि हम राजनीति में इस मुकाम तक पहुंचेंगे। वह एक साधारण कार्यकर्ता का सफर था।"

'घर से पेट्रोल और पानी के पैसे मांगते थे': स्मृति ईरानी ने बताया कि संगठन के शुरुआती दौर में वे अपने साथियों की मदद के लिए घर से पेट्रोल और पानी का खर्च लेकर निकलती थीं। तब के संगठन मंत्री वी. सतीश जी उन्हें सिखाते थे कि अंतिम पंक्ति में खड़े गरीब कार्यकर्ता की मदद कैसे करनी है और उसे साथ लेकर कैसे चलना है।

उन्होंने रेखांकित किया कि जब कोई नेता ऐसे जमीनी और कड़े सांगठनिक बैकग्राउंड से निकलकर आता है, तो उसके लिए राज्यसभा की सीट या कोई औपचारिक पद कोई खास मायने नहीं रखता।

मोदी की तारीफ ही सबसे बड़ी उपलब्धि

स्मृति ईरानी ने कहा कि एक सामान्य परिवार और गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि से आकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना ही अपने आप में एक लंबी यात्रा रही है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से सार्वजनिक रूप से उनके काम की सराहना मिलना ही उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी पूंजी और उपलब्धि है।

विपक्ष द्वारा समय-समय पर उठाए जाने वाले इन सवालों पर कि 'भाजपा ने उन्हें दरकिनार कर दिया', ईरानी ने साफ कर दिया कि वे पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के हर फैसले के साथ पूरी निष्ठा से खड़ी हैं। संगठन ने जब उन्हें सांसद बनाया तब भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाई, और जब पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय संगठन में महासचिव की अहम भूमिका सौंपी है, तब भी वे पूरी ऊर्जा के साथ जमीनी स्तर पर कैडर को मजबूत करने में जुटी हैं।

बंगाल के वायरल वीडियो पर भी दी सफाई

इसी बातचीत के दौरान स्मृति ईरानी ने बंगाल के एक मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कथित रूप से 'इग्नोर' किए जाने वाले विपक्ष के पुराने वायरल वीडियो पर भी खुलकर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि वीडियो में केवल पीएम मोदी की पीठ नजर आ रही थी और विपक्ष ने उस पर अपनी मर्जी से कहानियां गढ़ीं। उन्होंने बताया कि मंच पर बंगाल के पुराने और पीड़ित कार्यकर्ता मौजूद थे, जिन्होंने भारी राजनीतिक हिंसा झेली थी। पीएम मोदी उन निष्ठावान कार्यकर्ताओं का अभिवादन कर रहे थे, जो कि उस समय सबसे ज्यादा जरूरी था। ऐसे भावुक पलों में व्यक्तिगत मान-सम्मान के बजाय पार्टी के सिपाही को न्याय और सम्मान मिलना अधिक महत्वपूर्ण होता है।