सीएम पद छोड़ने के बाद भी सिद्धारमैया का दबदबा; 'कोऑर्डिनेशन कमेटी' का प्रस्ताव हाईकमान ने किया खारिज
India News Live,Digital Desk : कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने सीएम की कुर्सी छोड़ने के बाद भी प्रदेश की राजनीति में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए एक बड़ा 'पावर प्ले' किया है। दिल्ली में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ हुई बैठकों के दौरान सिद्धारमैया द्वारा दिए गए एक विशेष प्रस्ताव ने कांग्रेस आलाकमान को भी विचार में डाल दिया था, जिसे अब चर्चाओं के अनुसार खारिज कर दिया गया है।
सिद्धारमैया का 'कोऑर्डिनेशन कमेटी' वाला प्रस्ताव:
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सिद्धारमैया सरकार और संगठन के बीच तालमेल बिठाने के नाम पर एक 'कोऑर्डिनेशन कमेटी' (समन्वय समिति) बनाना चाहते थे।
उद्देश्य: इस समिति के जरिए वे राज्य की राजनीति में एक 'वैकल्पिक शक्ति केंद्र' के रूप में बने रहना चाहते थे।
सोनिया गांधी मॉडल की चाहत: जानकार इसे यूपीए शासनकाल में सोनिया गांधी की भूमिका (UPA अध्यक्ष और NAC प्रमुख) से जोड़कर देख रहे हैं, जहाँ सरकार के फैसलों पर उनकी अंतिम मुहर होती थी। सिद्धारमैया भी आगामी सरकार के निर्णयों पर इसी तरह का नियंत्रण बनाए रखने के इच्छुक थे।
आलाकमान का रुख: मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व ने उनके इस प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि सरकार और संगठन के बीच किसी समानांतर शक्ति केंद्र की आवश्यकता नहीं है।
डीके शिवकुमार बनाम सिद्धारमैया:
डीके शिवकुमार की संभावित ताजपोशी की पृष्ठभूमि में सिद्धारमैया का यह कदम उनके राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
शर्तों की फेहरिस्त: सिद्धारमैया ने केवल कॉर्डिनेशन कमेटी का प्रस्ताव ही नहीं रखा, बल्कि ऐसी भी खबरें हैं कि उन्होंने अपने पुत्र यतींद्र और अपने वफादारों के लिए नए मंत्रिमंडल में जगह और उप-मुख्यमंत्री (Deputy CM) पद जैसी शर्तें भी आलाकमान के सामने रखी हैं।
राज्यसभा से इनकार: पार्टी ने उन्हें राज्यसभा जाने का प्रस्ताव दिया था, जिसे उन्होंने स्पष्ट रूप से ठुकरा दिया है। इससे साफ है कि वे दिल्ली की राजनीति के बजाय कर्नाटक की सक्रिय राजनीति में ही अपनी धाक जमाए रखना चाहते हैं।
आगे की राह:
सिद्धारमैया न केवल एक दिग्गज नेता हैं, बल्कि सामाजिक न्याय की राजनीति के बड़े चेहरा भी हैं। कर्नाटक में देवेगौड़ा और येदियुरप्पा के बाद उन्हें तीसरी बड़ी सियासी हस्ती माना जाता है। ऐसे में आलाकमान के लिए चुनौती यह है कि सिद्धारमैया को दरकिनार किए बिना और डीके शिवकुमार को कमान सौंपते हुए पार्टी के भीतर कैसे संतुलन बनाया जाए।
आगामी कैबिनेट गठन और शनिवार की विधायक दल (CLP) की बैठक इस बात का फैसला करेगी कि कर्नाटक की नई सरकार में किसके प्रभाव का पलड़ा भारी रहता है।