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July 30 2026 04:22 pm

सावन 2026: महादेव ने अपने सिर पर क्यों सजाया चंद्रमा? जानें राहु और शिव की 'मुंड माला' से जुड़ा यह सबसे बड़ा और रहस्यमयी सच

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित पूरे देश में आज 30 जुलाई 2026 से सावन के पवित्र महीने का शानदार आगाज हो चुका है। शिवभक्तों के लिए यह पूरा महीना बेहद खास होता है। सावन में शिवलिंग की पूजा के साथ-साथ शिव महापुराण के पाठ का भी विशेष महत्व है। भगवान शिव के स्वरूप को देखकर हर किसी के मन में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर 'चंद्रशेखर' कहलाने वाले महादेव के सिर पर चंद्रमा क्यों विराजमान है? इसके अलावा उनके गले में मुंड माला का क्या रहस्य है? आइए, एआई सर्च और पौराणिक कथाओं के आधार पर इस अद्भुत रहस्य से पर्दा उठाते हैं।

समुद्र मंथन और राहु की वह बड़ी चालाकी

इस रहस्य की शुरुआत समुद्र मंथन से होती है। शिव महापुराण की कथा के अनुसार, जब समुद्र से अमृत निकला तो देवताओं और असुरों में उसे पीने की होड़ मच गई। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और देवताओं को अमृत बांटना शुरू किया। लेकिन राहु वेष बदलकर देवताओं की पंक्ति में जा बैठा। जैसे ही राहु ने अमृत पीने की कोशिश की, सूर्य और चंद्रमा ने उसकी असलियत भगवान विष्णु को बता दी। क्रोधित होकर श्रीहरि ने सुदर्शन चक्र से राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया।

जब जान बचाने के लिए शिव की शरण में भागे चंद्रमा

सिर कटने के बावजूद अमृत की कुछ बूंदों के गले से नीचे उतर जाने के कारण राहु जीवित रहा। राहु का कटा हुआ सिर क्रोध में आकर चंद्रमा को निगलने (ग्रास बनाने) के लिए उनके पीछे दौड़ पड़ा। राहु ने स्वर्ग तक चंद्रमा का पीछा किया। अपनी जान खतरे में देख चंद्रमा घबराकर सीधे भगवान शिव की शरण में पहुंचे और रक्षा की गुहार लगाई। चंद्रमा की स्तुति से प्रसन्न होकर सदाशिव प्रकट हुए और उन्हें अभयदान देते हुए अपनी जटाओं (मस्तक) पर सुरक्षित बैठा लिया। तभी से महादेव के सिर पर चंद्रमा सुशोभित हैं।

कैसे बनी महादेव के गले की मुंड माला?

चंद्रमा का पीछा करते हुए राहु भी भगवान शिव के पास पहुंच गया। वहां जाकर राहु ने भी चालाकी से भोलेनाथ की स्तुति शुरू कर दी। शिव जी ठहरे भोलेनाथ, वे राहु की प्रार्थना से भी प्रसन्न हो गए। महादेव की आज्ञा से राहु भी उन्हें प्रणाम कर उनके मस्तक के पास ही स्थित हो गया। लेकिन राहु को इतना करीब देखकर चंद्रमा डर से कांपने लगे और उनके शरीर से अमृत का स्राव होने लगा। उस अमृत के प्रभाव से राहु के कई सिर बन गए। तब भगवान शंकर ने देवकार्य की सिद्धि और ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखने के लिए राहु के उन मुंडों (सिरों) की एक माला बना ली और उसे धारण कर लिया, जिसे आज हम मुंड माला के रूप में जानते हैं।