Public health under threat: कैसे नकली दवाओं का कारोबार बढ़ा राजधानी में

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India News Live,Digital Desk : लखनऊ में नकली दवाओं का कारोबार अब सिर्फ एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि गंभीर जनस्वास्थ्य संकट बन गया है। शहर के मेडिकल स्टोर और अस्पतालों में दवाओं की सप्लाई पर नजर रखने के लिए केवल दो ड्रग इंस्पेक्टर जिम्मेदार हैं। सोचिए, इतने कम अधिकारी के भरोसे पूरे शहर के 10 हजार से अधिक मेडिकल स्टोर, 12 बड़े अस्पताल, 52 अर्बन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 62 पंजीकृत ब्लड बैंक और 25 दवा निर्माण कंपनियों की निगरानी हो रही है।

दोनों इंस्पेक्टरों पर न केवल निगरानी का काम है, बल्कि लाइसेंस जारी करने का भी भारी दबाव है। ऐसे में दवाओं की नियमित जांच करना लगभग असंभव हो जाता है। यह समस्या नई नहीं है, बल्कि पिछले दशक से लगातार बनी हुई है।

हालत यह है कि जब कभी कोई सैंपल जांच के लिए भेजा जाता है, तो रिपोर्ट आने में एक से दो महीने तक का समय लग जाता है। उदाहरण के लिए, मध्यप्रदेश और राजस्थान में कफ सीरप से बच्चों की मौत के बाद सरकार ने जांच के आदेश दिए। लखनऊ में खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने आस-पास के जिलों से ड्रग इंस्पेक्टर बुलाकर अभियान चलाया।

इस साल 18 फरवरी को पांच सेक्सोलॉजिस्ट क्लीनिकों पर छापेमारी हुई, जहाँ आयुर्वेदिक दवाओं में स्टेरॉइड मिलाने का आरोप लगा। टीम ने 10 संदिग्ध दवाओं के सैंपल लेकर मेरठ की राज्य प्रयोगशाला भेजे, लेकिन रिपोर्ट आने में डेढ़ माह का समय लग गया।

एक अधिकारी के अनुसार, लखनऊ में कम से कम छह ड्रग इंस्पेक्टर होने चाहिए, लेकिन काम सिर्फ दो के भरोसे चल रहा है। उनका कहना है कि दवाओं की नियमित और प्रभावी जांच तभी संभव है जब लाइसेंस से जुड़ा काम कम किया जाए।

सच्चाई यही है कि कमजोर निगरानी और संसाधनों की कमी ने नकली दवा कारोबारियों को हौसला दिया है, और आम जनता का स्वास्थ्य लगातार खतरे में है।