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September 03 2026 12:07 am

यूक्रेन पर भीषण हमले और ईरान को खुला समर्थन देकर पश्चिमी देशों के हर दबाव को दिखाया ठेंगा

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अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक तरफ यूक्रेन पर अपने सैन्य हमलों को और अधिक आक्रामक और भीषण बना दिया है, तो दूसरी तरफ मध्य पूर्व के संवेदनशील दौर में ईरान को खुलकर समर्थन देने की घोषणा कर दी है। इस दोतरफा रणनीतिक कदम ने अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के तमाम दावों और प्रतिबंधों को सिरे से खारिज कर दिया है। पश्चिमी देशों द्वारा लगातार डाले जा रहे कूटनीतिक और आर्थिक दबाव के बावजूद पुतिन के तेवर यह साफ दर्शाते हैं कि रूस किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं है। इस घटनाक्रम ने वैश्विक सुरक्षा समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है और आने वाले समय में इसके दुनिया भर पर दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

यूक्रेन पर ताबड़तोड़ हमले और बदलती सैन्य परिस्थितियां

यूक्रेन और रूस के बीच चल रहा संघर्ष अब एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। हालिया हफ्तों में रूसी सेना ने यूक्रेन के विभिन्न शहरों और रणनीतिक ठिकानों पर अपनी एयर स्ट्राइक और मिसाइल हमलों को कई गुना बढ़ा दिया है। कीएव से लेकर अन्य प्रमुख यूक्रेनी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। मॉस्को का यह आक्रामक रुख इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वह युद्ध के मैदान में पीछे हटने के मूड में बिल्कुल नहीं है। यूक्रेन को अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों से लगातार मिल रही भारी सैन्य सहायता और हथियारों की आपूर्ति के बावजूद रूस के हमलों की तीव्रता कम नहीं हुई है। इसके विपरीत, पुतिन प्रशासन ने अपनी घरेलू रक्षा उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ाते हुए युद्ध को लंबी अवधि के लिए टिकाऊ बना लिया है। यूक्रेनी नागरिकों और सेना के सामने यह एक विकट संकट बनता जा रहा है, क्योंकि रूसी सेना अत्याधुनिक ड्रोन और मिसाइलों के जरिए लगातार बढ़त बनाए हुए है।

ईरान के साथ खुला गठजोड़ और पश्चिमी देशों की रणनीतिक विफलता

एक तरफ जहां रूस यूक्रेन में अपनी सैन्य पकड़ मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसने ईरान के साथ अपने संबंधों को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। मध्य पूर्व में तनावपूर्ण हालातों के बीच रूस द्वारा ईरान को खुला समर्थन देना पश्चिमी देशों के लिए सबसे बड़ी सिरदर्दी बन गया है। अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों ने लंबे समय से रूस और ईरान दोनों पर ही कड़े आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध लगा रखे हैं, ताकि दोनों देश अलग-थलग पड़ जाएं और अपनी अर्थव्यवस्था या सैन्य ताकत को मजबूत न कर सकें। हालांकि, पुतिन और तेहरान के नेतृत्व ने इन प्रतिबंधों को ठेंगा दिखाते हुए आपसी सहयोग को और प्रगाढ़ कर लिया है। रक्षा, ऊर्जा, तकनीक और सामरिक मामलों में दोनों देशों की यह बढ़ती नजदीकियां वाशिंगटन और ब्रसेल्स की रणनीतिक विफलताओं को उजागर करती हैं। ईरान द्वारा रूस को सैन्य साजो-सामान और ड्रोन उपलब्ध कराने के आरोपों के बाद अब रूस का खुलकर ईरान के पक्ष में खड़ा होना इस बात की पुष्टि करता है कि मॉस्को पश्चिमी देशों के हर दबाव का तोड़ निकाल चुका है।

यूरोप और अमेरिका की कूटनीति के सामने पुतिन का कड़ा प्रतिरोध

यूरोपीय यूनियन और अमेरिका ने यूक्रेन युद्ध की शुरुआत से ही रूस को आर्थिक रूप से पंगु बनाने और वैश्विक मंच पर उसे अलग-थलग करने की तमाम कोशिशें की हैं। तरह-तरह के प्रतिबंध पैकेजेस, तेल और गैस के आयात पर रोक और वित्तीय लेन-देन पर पाबंदियों के जरिए रूस की अर्थव्यवस्था को तोड़ने का प्रयास किया गया। लेकिन पुतिन ने इन तमाम चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी नीतियों में तेजी से बदलाव किया। रूस ने अपने ऊर्जा निर्यात का रुख यूरोपीय बाजारों से हटाकर एशिया के बड़े देशों जैसे कि चीन और भारत की ओर मोड़ लिया, जिससे उसकी वित्तीय स्थिति पर शुरुआती झटकों के बाद खास असर नहीं पड़ा। इसके अलावा, ग्लोबल साउथ के कई देशों के साथ रूस के सुधरते कूटनीतिक संबंध यह साबित करते हैं कि पश्चिमी देशों का एकाधिकार अब कमजोर पड़ रहा है। पुतिन का यह आक्रामक और बेबाक रवैया अमेरिका और यूरोप के उस भ्रम को तोड़ता है, जिसमें वे खुद को वैश्विक नीतियों का एकमात्र नियंत्रक मानते थे।

भू-राजनीतिक भविष्य और विश्व शांति पर मंडराते बादल

रूस-यूक्रेन संघर्ष का यह नया चरण और रूस-ईरान की गहरी होती धुरी आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीति के दिशा-निर्देश तय करेगी। अमेरिका और नाटो (NATO) देशों के सामने अब यह गंभीर चुनौती है कि वे इस दोतरफा दबाव का मुकाबला कैसे करें। एक तरफ यूक्रेन की रक्षा और दूसरी तरफ मध्य पूर्व में ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकना पश्चिमी देशों के लिए बेहद कठिन होता जा रहा है। यदि हालात ऐसे ही बने रहे, तो शीत युद्ध के बाद का यह सबसे बड़ा भू-राजनीतिक संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था, आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा सुरक्षा को गहरी चोट पहुंचा सकता है। पुतिन के इन फैसलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि रूस अपनी शर्तों पर दुनिया के साथ पेश आएगा और पश्चिमी दबावों की अब मॉस्को के लिए कोई अहमियत नहीं बची है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि जल्द ही कोई कूटनीतिक समाधान नहीं निकाला गया, तो यह संघर्ष और अधिक व्यापक रूप ले सकता है, जिससे पूरी दुनिया की शांति खतरे में पड़ सकती है।