खाड़ी देशों में हाहाकार: ईरान-इजरायल युद्ध की आग में जल रहा तेल का बाजार, क्या दुनिया झेल पाएगी महातबाही...

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India News Live,Digital Desk : मध्य पूर्व (Middle East) के आसमान में मंडराते युद्ध के काले बादलों ने अब पूरी दुनिया की धड़कनें बढ़ा दी हैं। ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी इस सीधी जंग ने खाड़ी देशों को एक ऐसे चौराहे पर खड़ा कर दिया है, जहां से सिर्फ तबाही का मंजर नजर आ रहा है। सालों से सहेज कर रखे गए कूटनीतिक संबंध ताश के पत्तों की तरह बिखर रहे हैं और दुनिया का सबसे बड़ा तेल व्यापार (Oil Trade) पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुंच गया है। इस संघर्ष ने न केवल खाड़ी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को हिला दिया है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संकट का खतरा भी पैदा कर दिया है।

तेल के कुओं पर मंडराया खतरा, कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव का सबसे पहला और घातक असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ा है। जानकारों का मानना है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) जैसा महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बंद हो सकता है, जहां से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे देश अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि युद्ध की स्थिति में उनके तेल रिफाइनरियों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाए जाने का डर सता रहा है। तेल व्यापार ठप होने का सीधा मतलब है दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों का आसमान छूना।

टूटे कूटनीतिक संबंध और क्षेत्रीय अस्थिरता का नया दौर

इस युद्ध ने खाड़ी देशों के बीच के उन नाजुक रिश्तों को भी तोड़ दिया है, जिन्हें पिछले एक दशक में कड़ी मेहनत से बनाया गया था। 'अब्राहम समझौते' के जरिए इजरायल के करीब आए अरब देशों के लिए अब स्थिति 'इधर कुआं, उधर खाई' वाली हो गई है। एक तरफ ईरान का धार्मिक और क्षेत्रीय दबाव है, तो दूसरी तरफ इजरायल और अमेरिका के साथ उनके रणनीतिक हित। इस खींचतान में खाड़ी देश बुरी तरह फंस गए हैं और उनकी तटस्थता की नीति अब काम नहीं आ रही है।

तबाही का मंजर: क्या तीसरे विश्व युद्ध की आहट है यह संघर्ष?

मध्य पूर्व के रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल दो देशों की लड़ाई नहीं रह गई है। इसमें शामिल होने वाले प्रॉक्सी संगठन और महाशक्तियों के दखल ने इसे एक भयावह रूप दे दिया है। यमन से लेकर लेबनान तक और इराक से लेकर सीरिया तक, पूरा क्षेत्र बारूद के ढेर पर बैठा है। अगर समय रहते अंतरराष्ट्रीय दखल से इस आग को नहीं बुझाया गया, तो यह तबाही केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसकी लपटें पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और शांति को भस्म कर देंगी।