केवल किस्मत वालों को ही मिलता है हाथी के मस्तक से निकला यह 'चमत्कारी मोती'
सनातन धर्म के प्राचीन शास्त्रों और वैदिक ज्योतिष में रत्नों व मणियों का एक बेहद रहस्यमयी और प्रभावशाली संसार वर्णित है। सामान्यतः जनमानस में यही धारणा है कि मोती केवल समुद्र की गहराइयों में सीप से ही प्राप्त होता है। परंतु, हिंदू धर्मग्रंथों में कुल 8 प्रकार के दिव्य मोतियों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। इन सभी में सबसे अधिक दुर्लभ, मूल्यवान और अलौकिक शक्तियों से संपन्न 'गजमुक्ता' (Gajmukta Pearl) को माना गया है, जिसे आम बोलचाल में 'गजमणि' भी कहा जाता है। मान्यता है कि यह चमत्कारी मोती सीधे गजराज (हाथी) के मस्तक या दांतों से प्राप्त होता है। जिस भाग्यशाली व्यक्ति के पास यह मणि होती है, उसके जीवन में कभी भी धन, सकारात्मक ऊर्जा और राजसी ऐश्वर्य की कमी नहीं होती है।
हर हाथी में नहीं मिलती यह दिव्य मणि: जानिए किन विशेष नक्षत्रों में बनता है गजमुक्ता का योग
पौराणिक विज्ञान के अनुसार, गजमुक्ता कोई साधारण पथरीला अवशेष नहीं है और न ही यह हर ऐरे-गैरे हाथी के भीतर पाया जाता है। ज्योतिषीय गणनाओं के मुताबिक, जो हाथी विशेष रूप से पुष्य या श्रवण नक्षत्र के दौरान, रविवार अथवा सोमवार के दिन और सूर्य के उत्तरायण काल (Sun's Uttarayan Phase) में जन्म लेता है, केवल उसी दिव्य गजराज के मस्तक या मुख्य दांतों में इस विशिष्ट मणि का निर्माण होता है। शास्त्रों में उल्लेख है कि किसी एक हाथी के मस्तक के भीतर इस चमत्कारी मोती को पूरी तरह से विकसित होने में लगभग 70 से 80 वर्ष तक का एक लंबा समय लग जाता है। यही कारण है कि यह लाखों हाथियों में से किसी एक अत्यंत दुर्लभ गजराज में ही पाया जाता है।
देवराज इंद्र के ऐरावत से जुड़ा है इतिहास: चरक संहिता में भी मिलता है इस रत्न का वैज्ञानिक औषधीय उल्लेख
धार्मिक और ऐतिहासिक कथाओं के अनुसार, यह दिव्य गजमणि स्वर्ग के राजा देवराज इंद्र के वाहन 'ऐरावत हाथी' के मस्तक की शोभा बढ़ाती थी। आधुनिक युग में भी हाथियों के भीतर इसका पाया जाना एक ईश्वरीय चमत्कार माना जाता है। भारत के सबसे प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथ 'चरक संहिता' (Charak Samhita) में भी महर्षि चरक ने गजमणि के विशिष्ट औषधीय गुणों का उल्लेख किया है, जहां इसे कई असाध्य रोगों को ठीक करने वाली एक अचूक औषधि के रूप में इस्तेमाल करने का तरीका बताया गया है। दुर्लभता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार और रत्न शास्त्र में इस अनमोल मोती की कीमत लाखों-करोड़ों रुपये तक आंकी जा सकती है।
पहनने के बजाय घर के मंदिर में रखने का है विधान: पलक झपकते ही दूर होती है सात पीढ़ियों की दरिद्रता
रत्न शास्त्र के कड़े नियमों के अनुसार, गजमुक्ता एक अत्यंत संवेदनशील और उच्च ऊर्जा वाली मणि है, इसलिए इसे आम रत्नों की तरह अंगूठी या लॉकेट के रूप में शरीर पर धारण करने की सख्त मनाही है। यदि किसी भाग्यशाली जातक को यह दुर्लभ मोती प्राप्त हो जाता है, तो उसे पूर्ण विधि-विधान से अपने घर के पवित्र पूजा स्थल या तिजोरी में स्थापित करना चाहिए। मान्यता है कि जिस स्थान पर गजमणि साक्षात विराजमान होती है, वहां से हर प्रकार की नकारात्मक शक्तियां और दरिद्रता हमेशा के लिए नष्ट हो जाती हैं। घर की आर्थिक स्थिति को कुबेर के खजाने जैसा मजबूत बनाने और सुख-समृद्धि के स्थायी वास के लिए पूजा स्थान पर गजमणि की नियमित आराधना को अचूक माना गया है।