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November 05 2026 09:47 pm

ममता बनाम ऋतब्रत: किसे मिलेगा TMC का नाम और 'जोड़ा घास-फूल' निशान? चुनाव आयोग आज ले सकता है बड़ा अंतरिम फैसला

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पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अस्तित्व, संगठन और पहचान को लेकर छिड़ी कानूनी जंग अब अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। पार्टी के नाम और उसके ऐतिहासिक चुनाव चिह्न 'जोड़ा घास-फूल' (Twin Grass Flowers) पर मालिकाना हक को लेकर पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी और बागी खेमे के अगुवा व पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee) के गुट आमने-सामने हैं। नई दिल्ली स्थित निर्वाचन सदन में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की पूर्ण पीठ के समक्ष दोनों पक्षों ने अलग-अलग पेश होकर अपनी दलीलें और साक्ष्य रखे हैं। 6 अक्टूबर को राज्य की दो हाई-प्रोफाइल विधानसभा सीटों—नंदीग्राम और रेजीनगर पर होने वाले उपचुनाव के मद्देनजर आयोग किसी भी वक्त अपना अंतरिम आदेश सुना सकता है।

चुनाव आयोग के सामने क्या हैं 3 बड़े विकल्प?

चुनाव आयोग (सिंबल ऑर्डर, 1968 के पैरा 15) के तहत राजनीतिक दलों के आंतरिक विवादों का निपटारा करता है। कानूनी जानकारों और सूत्रों के अनुसार, उपचुनाव के नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद आयोग के पास ये प्रमुख रास्ते हैं:

सिंबल को अस्थायी रूप से फ्रीज (Freeze) करना:

महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी विवाद की तर्ज पर आयोग फिलहाल पार्टी के मूल नाम 'तृणमूल कांग्रेस' और 'जोड़ा घास-फूल' चुनाव चिह्न को कुछ समय के लिए फ्रीज कर सकता है। ऐसी स्थिति में दोनों गुटों को उपचुनाव के लिए अलग-अलग अंतरिम नाम और नए चुनाव चिह्न आवंटित किए जा सकते हैं।

किसी एक गुट को अंतरिम मान्यता:

यदि आयोग किसी एक पक्ष के संख्याबल या पार्टी संविधान के तर्कों से पूरी तरह संतुष्ट होता है, तो वह उपचुनाव के लिए उसे मूल सिंबल इस्तेमाल करने की अनुमति दे सकता है, जबकि दूसरे गुट को अलग दल या निर्दलीय के रूप में लड़ना होगा।

निर्दलीय के तौर पर चुनाव:

यदि आयोग दोनों पक्षों के विस्तृत दस्तावेजों की स्क्रूटनी के लिए अतिरिक्त समय लेता है और कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं करता, तो दोनों गुटों के उम्मीदवारों को मैदान में स्वतंत्र (निर्दलीय) प्रत्याशी के तौर पर उतरना पड़ सकता है।

दोनों पक्षों ने आयोग के सामने क्या दिए तर्क?

चुनाव आयोग के सामने पेश दोनों खेमों ने पार्टी पर अपने-अपने नियंत्रण के समर्थन में मजबूत कानूनी दलीलें पेश की हैं:

ममता बनर्जी गुट की दलीलें (डेरेक ओ'ब्रायन और कल्याण बनर्जी की टीम):

पार्टी संविधान और कार्यकाल: ममता गुट के 5 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने दलील दी कि पार्टी में हर 5 साल पर संगठनात्मक चुनाव होते हैं। 2022 में ममता बनर्जी सर्वसम्मति से चेयरपर्सन चुनी गई थीं, लिहाजा 2027 तक उनका और राष्ट्रीय कार्यसमिति (NWC) का कार्यकाल पूरी तरह वैध है।

गद्दारी का आरोप: ममता गुट ने कहा कि यह कोई वैध विवाद नहीं है। जो विधायक आज बगावत कर रहे हैं, उन्होंने पांच महीने पहले ममता बनर्जी के हस्ताक्षर वाले सिंबल पर ही चुनाव लड़ा था और पार्टी फंड से चुनाव प्रचार के लिए ₹25-25 लाख लिए थे। इस आधार पर उन्होंने किसी भी अंतरिम आदेश का विरोध किया।

ऋतब्रत बनर्जी गुट की दलीलें (बागी खेमा):

विधायी बहुमत का दावा: ऋतब्रत गुट का दावा है कि विधानसभा में टीएमसी के 80 में से करीब 58 से 60 विधायकों और लोकसभा के 28 में से 20 सांसदों का समर्थन उनके साथ है, जिससे उनके पास दो-तिहाई से अधिक का विधायी बहुमत बनता है।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हवाला: ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि टीएमसी किसी एक परिवार की निजी जागीर नहीं है। उन्होंने 22 जून को बागी नेताओं की बैठक में गठित नई राष्ट्रीय कार्यसमिति और संगठनात्मक बदलावों के दस्तावेज आयोग को सौंपकर खुद को असली टीएमसी घोषित करने की मांग की है।

नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव बने नाक की लड़ाई

इस कानूनी लड़ाई का तात्कालिक असर 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव पर पड़ना तय है। विशेषकर नंदीग्राम, जहां से कभी ममता बनर्जी ने ऐतिहासिक भूमि अधिग्रहण आंदोलन कर वाममोर्चे की नींव हिला दी थी और टीएमसी को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाया था, अब दोनों गुटों के लिए पहली अग्निपरीक्षा बन चुका है। दोनों ही पक्षों ने इन सीटों पर अपने-अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। अब चुनाव आयोग के फैसले पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं कि क्या ममता बनर्जी अपनी बनाई पार्टी के सिंबल पर काबिज रह पाएंगी या फिर चुनाव आयोग इस ऐतिहासिक चिह्न को फ्रीज करने का आदेश देगा।