BREAKING:
November 05 2026 09:47 pm

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसले पर उठाए गंभीर सवाल; कहा- दोनों अपनी ताकत पर लड़ते, बालासाहेब के नाम पर नहीं

Post

महाराष्ट्र के चर्चित शिवसेना विवाद में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा एकनाथ शिंदे गुट को 'असली' शिवसेना मानकर पार्टी का नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न आवंटित किए जाने के फैसले पर देश की शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की विशेष पीठ ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के फैसले की निष्पक्षता और विकल्पों पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया। अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए पूछा कि जब पार्टी संगठन, संविधान और विचारधारा के सभी स्थापित परीक्षणों (Tests) में खामियां दिख रही थीं, तो चुनाव आयोग ने मूल चुनाव चिह्न को फ्रीज क्यों नहीं किया? आयोग दोनों गुटों को नए व निष्पक्ष चुनाव चिह्न देकर मैदान में क्यों नहीं उतार सका, ताकि दोनों अपनी-अपनी ताकत पर चुनाव लड़ते, न कि बालासाहेब ठाकरे के नाम और विरासत के सहारे?

'दोनों अपनी ताकत पर लड़ते, बालासाहेब के नाम पर नहीं': सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ के समक्ष उद्धव ठाकरे गुट बनाम एकनाथ शिंदे गुट मामले की अंतिम सुनवाई चल रही थी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने चुनाव आयोग के निर्णय लेने के तरीके पर गंभीर कानूनी सवाल दागे:

चौथा विकल्प क्यों नहीं चुना? जस्टिस बागची ने कहा कि किसी पार्टी के असली दावेदार को तय करने के लिए आमतौर पर तीन परीक्षण होते हैं—उद्देश्य और नीतियां (Aims and Objectives), संगठनात्मक ढांचा (Organizational Test) और विधायी बहुमत (Legislative Majority)। जब आयोग ने खुद पाया कि पहले दो टेस्ट इस मामले में बेअसर हैं, तो उसके पास एक चौथा विकल्प भी खुला था कि वह किसी भी गुट को फायदा न दे।

चिह्न फ्रीज करने का निष्पक्ष रास्ता: कोर्ट ने पूछा, "आयोग ने दोनों गुटों के लिए निष्पक्ष रास्ता क्यों नहीं अपनाया? चुनाव चिह्न को पूरी तरह फ्रीज कर दिया जाता और दोनों से कहा जाता कि वे नए चुनाव चिह्न चुनकर अपनी ताकत और जनता के बीच अपने काम के दम पर लड़ें, बालासाहेब के नाम और प्रतीक के आधार पर नहीं। आयोग ने यह विकल्प क्यों नहीं तलाशा?"

विधायकों की संख्या को अंतिम आधार मानना कितना सुरक्षित? शीर्ष अदालत ने यह भी पूछा कि जब विधायकों और सांसदों की अयोग्यता (Disqualification) की याचिकाएं खुद विधानसभा अध्यक्ष और अदालतों में लंबित थीं, तब केवल विधायी संख्या बल (Legislative Strength) को ही निर्णय का अंतिम और निर्णायक आधार कैसे माना जा सकता है?

शिंदे गुट की दलील: 'विधायी बहुमत ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प था'

शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के फैसले का पुरजोर बचाव किया:

अलोकतांत्रिक संगठन का तर्क: कौल ने दलील दी कि 2018 में शिवसेना के संविधान में किए गए बदलावों के चलते संगठन का ढांचा अलोकतांत्रिक हो चुका था। पार्टी अध्यक्ष के पास असीमित अधिकार थे और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के अधिकांश सदस्य निर्वाचित न होकर अध्यक्ष द्वारा मनोनीत थे, इसलिए संगठनात्मक परीक्षण से जमीनी कार्यकर्ताओं की राय का पता लगाना असंभव था।

मजबूरी में लिया गया फैसला: शिंदे गुट के वकील ने कहा कि जब दोनों गुट बालासाहेब की विचारधारा पर चलने का दावा कर रहे थे और संगठनात्मक टेस्ट काम नहीं कर रहा था, तो चुनाव आयोग के पास केवल विधायी बहुमत (सदन में चुने गए प्रतिनिधियों की संख्या) का ही व्यावहारिक विकल्प बचा था, जिसमें शिंदे गुट स्पष्ट रूप से आगे था।

ठाकरे गुट की आपत्ति: 'सिंबल देकर चुनाव में दिया गया अनुचित लाभ'

उद्धव ठाकरे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों (कपिल सिब्बल व अन्य) ने तर्क दिया कि पार्टी केवल चुने हुए विधायकों के आंकड़ों से नहीं बनती।

पार्टी के लाखों प्राथमिक कार्यकर्ता, पदाधिकारी और मूल कैडर ही दल की असली रीढ़ होते हैं।

ठाकरे गुट ने कहा कि यदि चुनाव आयोग को कोई फैसला लेना ही था, तो वह चुनाव चिह्न 'धनुष-बाण' को फ्रीज रखता। किसी एक बागी गुट को मूल पार्टी और सिंबल सौंप देने से उन्हें चुनावी मैदान में अनुचित बढ़त (Advantage) मिली, जो चुनावी लोकतंत्र की निष्पक्षता के खिलाफ है।

अदालत ने स्पष्ट किया: हम आयोग का काम नहीं छीन रहे, प्रक्रिया परख रहे हैं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के तहत अदालत चुनाव आयोग की जगह बैठकर फैसला नहीं सुना रही है, बल्कि यह देख रही है कि कानून के तहत उपलब्ध सभी निष्पक्ष विकल्पों पर आयोग ने विचार किया था या नहीं।

सर्वोच्च अदालत की इस तल्ख टिप्पणी के बाद अब यह सवाल फिर चर्चा में आ गया है कि क्या भविष्य में राजनीतिक दलों के विभाजन और सिंबल विवादों में चुनाव आयोग को केवल विधायकों के सिर गिनने के बजाय चुनाव चिह्न को स्थायी रूप से फ्रीज कर नए सिंबल देने की परंपरा को कानूनी प्राथमिकता देनी चाहिए।